Sunday, July 5, 2026

विजयादशमी

   


आज विजय का पर्व है. भारतीय राष्ट्र की अगणित महान विजयों का राष्ट्रीय पर्व. हमारा राष्ट्र-जीवन केवल उन्नीस सौ पचास वर्ष पुराना नहीं है. सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक जीवन-संग्राम में सतत रत रहकर हमने अपने गौरवपूर्ण राष्ट्र-जीवन के उज्ज्वल इतिहास में विजय के अनेक कालखंड निर्माण किए हैं. निराशा की अमावस सी गहन निशा के अंधकार में हम तनिक अपना मस्तक आत्मगौरव के साथ ऊंचा उठाकर देखें, विश्व के गगन-मंडल पर हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं. संसुति के गौरवपूर्ण इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर असंख्य युगों के वज्र कठोर हृदय पर, हमारी विजय के स्तंभ अंकित हैं. अनादि भूतकाल हमारी दिव्य विभा से आलोकित है. भावी की अनंत घड़ियां हमारी विजय-मालिका की लड़ियां बनने की प्रतीक्षा में मौन रुकी पड़ी हैं. आज का दिन हमारी संपूर्ण विजयों का दिन है. इस राष्ट्रीय पर्व को हमने सदैव ही अपनी विजिगीषु क्षात्रवृत्ति का प्रदर्शन करके मनाया है. आज के शुभ मुहूर्त पर ही हमने देश, धर्म और संस्कृति को नष्ट करने वाली आसुरी शक्तियों को ललकारा है और उनका मान-मर्दन कर विजयलक्ष्मी को वरण किया है. इन विजयों ने विजया नाम को सार्थक किया है, पवित्र परंपरा को पुष्ट किया है. 

आज का दिन हमारी विजयों का ही दिन नहीं, अराष्ट्रीय तथा आसुरी शक्तियों की पराजय का भी दिन है. विजय के उज्ज्वल इतिहास के पीछे क्षणिक पराजय की धूमिल छाया भी छिपी हुई है. कौन जानता था कि शुम्भ और निशुम्भ की निरंकुश सत्ता तथा अत्याचारी प्रवृत्ति से पीड़ित राष्ट्र को बचाने के लिए दुर्गा के रूप में समाज की संघटित शक्ति प्रकट होगी ? किसको विश्वास हो सकता था कि रावण जैसे शक्ति संपन्न तथा वैभवशाली सम्राट के स्वर्णसिंहासन को टुकड़े-टुकड़े करने में वनवासी राम सफलता पा लेंगे ? किसने कल्पना की थी कि सह्याद्रि की गिरिमाला में मुट्ठी-भर मावलों के बल पर स्वधर्म-संरक्षण तथा स्वराज्य-संस्थापन की महान साधना में रत श्री शिवाजी ’दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ की सारी शान को मिट्टी में मिलाने में समर्थ होंगे ?  किसने सोचा था, आत्मविस्मृत, गौरव-शून्य, निराश, आकांक्षाविहीन, व्यक्तिगत स्वार्थ के पंक में फंसा हुआ पददलित राष्ट्र परतंत्रता की बेड़ियां काटकर स्वतंत्रता के स्वच्छ वातावरण में विचरण करेगा ? पर जब समाज की सारी शक्तियों का केंद्रीकरण होता है, तो विजय चरण चूमने के लिए तत्काल तत्पर हो जाती है.

राष्ट्र पुरुष राम के रूप में जब समाज का क्षात्रतेज ब्रह्मतेज का योग पाकर राष्ट्र की अपहृत लज्जा को लौटा लाने के लिए लंका की ओर अग्रसर हुआ, तो आततायी रावण का अंत विधि का विधान बन गया. छोटे-छोटे कपियों और भालुओं की सहायता से राम ने विश्वविजयी के गौरव-सिंहासन और गर्व-मुकुट को पैरों की धूल में परिवर्तित कर दिया. रावण के पास शक्ति थी, किंतु शील नहीं था. बल था, न्याय नहीं था. रावण के प्रत्येक अनुयायी के हृदय में जलने वाली सर्वस्वार्पण की वृत्ति नहीं थी, स्वयंस्फूर्ति से उत्पन्न होने वाला अनुशासन नहीं था, ध्येय की वेदी पर जीवन-पुष्प को अर्पित करने में समाधान मानने वाली पवित्र आकांक्षा नहीं थी और उससे बढ़कर यह विश्वास नहीं था कि अपना मार्ग सत्य और न्याय का मार्ग है. फलत: राम की विजय हुई और रावण पराजित हुआ. राष्ट्र शक्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दसों शीशों के रूप में सब्याज चुकाना पड़ा. दशानन का वध हुआ, इसलिए दशहरा हुआ. असुरों की लंका भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कुंदकली की भांति सुशोभित हुई. धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ. विजय का आनंद सुजनों में सुवर्ण वितरित कर प्रदर्शित किया गया. 

दुर्गा का अवतार, राम की विजय और पांडवों का अज्ञातवास समाप्त कर पुन: शस्त्र धारण आज भी हमारे निश्चेष्ट जीवन में चैतन्य का संचार कर रहे हैं. आज का दिन राष्ट्र-जीवन की महत्वाकांक्षाओं को जगाने और उन्हें पूर्ण करने के लिए प्राणपण से जुट जाने का दिन है. आज हमें शस्त्र पूजन कर सीमोल्लंघन करना है. कृषक अपना हल सम्हाले, मजदूर अपने चक्के को गति दे, व्यवसायी अपनी तुला पर राष्ट्र का हित-अनहित तौले, लेखक अपनी लेखनी की लौ को प्रज्वलित करे और सब अपने-अपने शस्त्रों का पूजन करते हुए विजयश्री से मंडित करने में अपना योग दें. जो समय पर काम आ जाए, वही शस्त्र है. यदि हम सीमोल्लंघन के इच्छुक हैं, तो रूढ़िपालन से ही शांत न बैठें. हमें उन सब मनोभावों को तिलांजलि देनी चाहिए, जिन्होंने हमारे मानसिक जगत को सीमित बना रखा है. 

हमारी अगणित विजयों का इतिहास साक्षी है. विजय प्राप्ति के लिए विजयी कार्यशक्ति चाहिए. महिषासुर के आतंक से जब मेदिनी थर्रा उठी, धर्म का श्वास रुद्ध होने लगा, अन्यायों ने सर्वत्र सरोष सिर उठा लिया, अत्याचारों की झड़ी लग गई, तो अराष्ट्रीय शक्ति के आतंक और उपद्रव को सदा-सर्वदा के लिए समाप्त करने की दृष्टि से राष्ट्र की सर्व शक्तियों का केंद्रीकरण किया गया. ब्रह्मा की सृजन, विष्णु की सिंचन और शंकर की प्रलयंकर शक्ति ने सम्मिलित होकर देवों के शरीरों से प्रकटित पुण्य प्रकोप द्वारा आदिशक्ति का निर्माण किया. समस्त देवताओं ने अपने प्रखर आयुध, संपूर्ण गुण और अपनी सारी शक्ति दुर्गा के अधीन की.  समाज की संपूर्ण शक्ति से समन्वित होकर राष्ट्र शक्ति ने अराष्ट्रीय शक्ति को ललकारा. आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दशमी पर्यंत वह विकट संग्राम चला. अंत में दुर्गा की जीत हुई और महिषासुर का मान-मर्दन कर दिया गया. हम राष्ट्र की विजय के उपलक्ष्य में नवरात्र का उत्सव मनाते हैं. दुर्गा समाज की संघटित शक्ति का प्रतीक है. व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वार्थ साधना को एक ओर रखकर हमें राष्ट्र की आकांक्षा प्रदीप्त करनी होगी, दलगत स्वार्थों की सीमा छोड़कर विशाल राष्ट्र की हितचिंता में अपना जीवन लगाना होगा. हमारी विजिगीषु वृत्ति हमारे अंदर अनंत गतिमय कर्मचेतना उत्पन्न करे. राष्ट्र के वैभव के लिए हम रावण की आसुरी, तामसी वृत्ति का नाश कर राम की वृत्ति की विजय के लिए प्रबलशील हों. जन-जन के मन में नव चैतन्य निर्माण कर राष्ट्र की विजय तथा वैभव का पथ प्रशस्त करें. दीपावली हमारे स्वागत के लिए तैयार खड़ी है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

विश्व का तेजोवलय

   


प्रश्न यह है कि मैं हिंदू क्यों हूं. वास्तव में मैं हिंदू क्यों हूं, क्योंकि मैंने हिंदू के रूप में जन्म लिया है. मैं एक हिंदू हूं, जिसे हिंदू होने में सुख का अनुभव होता है. स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ’ मैं हिंदू हूं, जिसे अपने हिन्दुत्व पर गर्व है.’

एक बात मुझे स्पष्ट कर देनी चाहिए कि साधारण तौर पर धर्म का जो अर्थ लिया जाता है, वह हिंदू धर्म के लिए लागू नहीं होता है. यह धर्म है जीवन की एक पद्धति, जो संपूर्ण जीवन को दृष्टिगत रखता है.

हिंदू धर्म के प्रति मेरे आकर्षण का सबसे मुख्य कारण है कि यह मानव का सर्वोत्कृष्ट धर्म है. हिंदू धर्म न तो किसी पुस्तक से जुड़ा है और न किसी एक धर्म प्रवर्तक से, जो कालगति के साथ असंगत हो सकते हैं. हिंदू धर्म का स्वरूप हिंदू समाज द्वारा निर्मित होता है. और यही कारण है कि यह धर्म युग-युगांतर में सर्वधित और पुष्पित होता आ रहा है. यद्यपि हिंदू धर्म सर्वाधिक प्राचीन है, फिर भी इसमें समय-समय पर देवताओं और धर्मशास्त्रों का उदय होता रहा है. वैदिक देवताओं का स्थान पौराणिक देवों ने प्राचीन काल में ही ले लिया था. वेदों का उपवृंहण पुराणों ने किया है. इस प्रकार हिंदू धर्म ऐसा जीवन  धर्म है, जो धार्मिक अनुभवों की वृद्धि और उसके आचरण की चेतना के साथ निरंतर विकास करता रहता है.

हिंदू धर्म की इस लोकप्रिय प्रकृति का ही एक परिणाम है कि यह सभी प्रकार की रुचियों और आध्यात्मिकता के सभी स्तरों की तुष्टि में सक्षम है. कोई भी व्यक्ति चाहे, वह एक ईश्वर में विश्वास करता हो, सहस्रों देवताओं को मानता हो या ईश्वर में उसकी आस्था ही न हो, उसे हिंदू धर्म में आध्यात्मिक समर्थन और अनुपोषण प्राप्त होता रहता है.

हिंदू धर्म कोई मतवादी धर्म नहीं है, जिसमें कुछ बातों पर, भले ही वे अविश्वसनीय हों, आस्था रखना अनिवार्य हो अन्यथा धर्म छोड़ना पड़े. हिंदू धर्म में कोई धर्म विद्रोही नहीं होते. नये मंत्रदृष्टा या गुरु हो सकते हैं.

मुझे प्रभावित करने वाले इस धर्म की दूसरी विशेषता है इसकी वैज्ञानिक प्रकृति. अन्यान्य धर्मों की तुलना में हिंदू धर्म आधुनिक विज्ञान की चुनौती पर अधिक सक्षमता से खरा उतरा है. इसका सीधा कारण यह है कि यदि कोई बात तथ्यों के विपरीत पाई जाती है, तो उसे बिना विवाद किए ही त्याग दिया जाता है. इस प्रकार हिंदू धर्म निरंतर ताजा और अद्यावधि बना रहता है. पश्चिम में 500 वर्ष पूर्व एक बार धर्म-सुधार हुआ था, किंतु हमारे यहां तो नित्य सुधार होता है.  
हिंदू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ होता है और न अंत ही.  यह एक आनंद चक्र है. हिंदू धर्म मानव को आश्वस्त करता है कि मृत्यु के बाद भी जीवन रहता है. और व्यक्ति जब तक पूर्णता प्राप्त नहीं कर लेता, उसे विकास का अवसर मिलना असंभव है.

हिंदू धर्म को सनातन धर्म कहा गया है. शब्दश: यह वास्तविक है, क्योंकि यह प्राकृतिक धर्म है. यह प्रकृति के अनुकूल है और सूर्य, चंद्र, जल, पृथ्वी, पर्वत, नक्षत्र, अंतरिक्ष और वस्तुत: उन सबके पीछे विद्यमान उनकी आत्मा और शक्ति पर उसका दर्शन और व्यवहार आश्रित है. इसी कारण हिंदू धर्म प्रकृति और मानव अस्तित्व के साथ समसामयिक बना रहता आया है.  यह विकास करता हुआ और समय के साथ सामंजस्य स्थापित करता हुआ, बिना धूमिल हुए आगे बढ़ता रह सकेगा. 

इस सबसे भी महत्व की बात यह है कि हिंदू धर्म सौंदर्यनुभूति और भावनात्मक दोनों ही दृष्टि से अत्यंत संतोषप्रद है. इसका कर्मकांड बहुरंगी है, जो हृदय को त्वरित शुद्ध बनाता है और उसे उच्चतर स्तर पर पहुंचा देता है. इसका धार्मिक प्राचीन साहित्य उतना ही समुद्ध है, जितना कि वह ज्ञानप्रद और आनंददायी है. वास्तव में, हिंदू धर्म भगवतप्राप्ति की मानव-आकांक्षा हेतु एक परमानंददायक दीर्घ संगीत है.  ऐसा यह धर्म विश्व के लिए गौरवमय तेजोवलय है. यही कारण है कि हिंदुस्तान की वर्तमान दुखद स्थिति में भी हिंदू धर्म विश्व के सर्वाधिक बुद्धिमान लोगों में से अनेक को आकर्षित करता है.

धार्मिक चीनवासियों का यह विश्वास अकारण ही नहीं है कि उनमें से जो अच्छी तरह जीवन बिताएंगे, वे मरने के बाद निर्वाण प्राप्त होने तक भारत में बार-बार जन्म लेते रहेंगे.
हिंदू होकर जन्म लेना संतोषप्रद भी है और एक चुनौती भी.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

हिंदी की दयनीय स्थिति

   


हिंदी भारत की राज-काज, शिक्षा-दीक्षा तथा न्यायदान की भाषा बनने की लड़ाई उसी दिन हार गई, जिस दिन संविधान के निर्माताओं ने 1950 में एक विदेशी भाषा को आगामी 15 वर्षों के लिए स्वतंत्र भारत की राजभाषा बनाए रखने का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय ले लिया. यदि हिंदी को नई दिल्ली में आना था, तो वह कलम की एक ही नोक से आ सकती थी, उसे किस्तों में लाने के फैसले का विफल होना निश्चित था और वह विफलता उजागर हो गई.

अंग्रेजी को क्रमश:  हटाने और हिंदी को उत्तरोत्तर बढ़ाने के फेर में अंग्रेजी सम्राज्ञी बन बैठी है हिंदी को चिरदासी का पद प्राप्त हो गया दिखता है. राजभाषा कानून के अंतर्गत, यद्यपि हिंदी प्रमुख भाषा है और अंग्रेजी इसकी सहायक भाषा, किंतु केंद्रीय कार्यालयों में सर्वत्र अंग्रेजी का बोलबाला है. यहां तक कि हिंदी क्षेत्रों में स्थित केंद्रीय कार्यालयों में भी, जिनका संबंध वहां की हिंदी भाषी जनता से है, अंग्रेजी में काम होता है और हिंदी का प्रयोग करने वाले कर्मचारी न केवल निरुत्साहित किए जाते हैं वरन उन्हें किसी बहाने दंडित भी किया जाता है.

केंद्रीय कर्मचारियों को हिंदी में प्रशिक्षण देने का काम बड़े जोर-शोर से जारी है. कागज पर ऐसे प्रशिक्षित कर्मचारियों के आंकड़ें भी प्रभावशाली दिखाई देते हैं. किंतु वस्तुस्थिति यह है कि न केवल प्रशिक्षित कर्मचारी अपितु हिंदी भाषा-भाषी कर्मचारी भी हिंदी भूलते जा रहे हैं. उन्हें हिंदी में काम करने का अवसर ही उपलब्ध नहीं होता. भाषा अभ्यास से आती है. अभ्यास के अभाव में शिक्षण और प्रशिक्षण पर भी पानी फिर जाता है.

हिंदी की कितनी दयनीय स्थिति है, यह उस दिन भली भांति पता लग गया, जब भारत-पाक समझौते की हिंदी प्रति न तो संसद सदस्यों को और न हिंदी पत्रकारों को उपलब्ध कराई गई. भारत-पाकिस्तान में कितना ही बुनियादी अंतर क्यों न हो, किंतु जहां तक अंग्रेजी की गुलामी का सवाल है, दोनों देश उसका गौरव अनुभव करने में संकोच नहीं करते. जिस उर्दू का परचम फहराकर पाकिस्तान बना था और जिस उर्दू को बढ़ावा देने का नारा बुलंद करके भारत का सत्ताधीश उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव को अपने पक्ष में प्रभावित करना चाहते हैं, उसके प्रतिनिधि हाल की वार्ता में न तो उर्दू में बातचीत कर सके और न समझौता ही कर सके.

स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री ने जनरल अयूब को उर्दू या हिंदुस्तानी में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया था, किंतु अब केवल शास्त्री जी की याद ही बाकी रह गई है. 

हिंदी वालों को चाहिए कि हिंदी प्रदेशों में हिंदी को पूरी तरह जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठित करें, केंद्र पर दबाव डालें, जो छात्र अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा नहीं पाते हैं, उन्हें भी केंद्रीय सेवाओं में प्रविष्ट होने का समान अवसर और अधिकार मिलना चाहिए. हिंदी प्रदेशों को हिंदी की समान शब्दावली का प्रयोग करने का भी समन्वित प्रयोग करना चाहिए.

’रामचरितमानस’ की चारसौवीं वर्षगांठ के महान अवसर पर सभी हिंदी भाषा-भाषी राज्य, संस्थाएं तथा व्यक्ति समूचे देश में एक ऐसी लहर फैला सकते थे,  जो न केवल केंद्र को प्रभावित करती, अपितु हर भारतीय के मानस को छू लेती. किंतु यह समारोह हिंदी मठाधीशों की मुट्ठी तक सीमित रह गया. 

प्रतिवर्ष एक कर्मकांड की तरह हिंदी दिवस का आयोजन और उस पर हिंदी के पक्ष में पांडित्यपूर्ण प्रवचन के स्थान पर, हिंदी साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, पत्रकारों तथा समर्थकों को व्यवहार की भाषा बनाने के लिए एक प्रचंड राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प लेना होगा. मुगलों और अंग्रेजों के राज्य में जब हिंदी सिंहासन से कोसों दूर थी, तब भी वह पनपी, फूली-फली और न केवल समाज के लिए संजीवनी के रूप में सामने आई, अपितु राष्ट्रीय एकता का बल माध्यम भी सिद्ध हुई. भारत के चारों कोनों में स्थित चारों धामों की यात्रा करने वाले, फिर वे केरल के हों या कश्मीर के, जिस भाषा में अपने को व्यक्त करते थे और भी करते हैं, वह हिंदी ही है, अन्य कोई भाषा नहीं है.

जब विदेशी राज्य में हिंदी पनपी, तो अपने कहलाने वाले राज्यों में वह उपेक्षित और तिरस्कृत रहे, यह केवल हिंदी वालों के लिए भी गंभीर चुनौती है. हमें इस चुनौती को स्वीकार करना होगा और सभी भारतीय भाषाओं को शासन तथा जनता की भाषा बनाकर दिखाना होगा.
 -डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

भाषाएं सांस्कृतिक समृद्धि की परिचायक है

   


नई दिल्ली में 14 सितंबर, 1999 को राजभाषा की स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत की विभिन्न भाषाओं के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पचास साल पहले आज ही के दिन संविधान परिषद ने हिंदी को केंद्र की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया था. यह भाषाई स्वराज्य की ओर एक ठोस और प्रभावी कदम था. सबके सहयोग से सारे देश के समर्थन  से हिंदी राष्ट्रभाषा बनी, राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार की गई और बाद में इसे राजभाषा का पद प्राप्त हुआ.
 भारत एक बहुभाषी देश है. अनेक भाषाएं हैं. भाषाओं की अनेकता या बहुलता हमारे लिए कठिनाई पैदा नहीं करती, हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का परिचय देती है. कठिनाइयां तो हल हो जाती हैं, लेकिन संस्कृति की विरासत को बचाए रखना, बढ़ाना, यह बहुत आवश्यक है. बहुभाषी देश में आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में भाषा की उपयोगिता हम सभी जानते हैं. हमारे यहां यह बड़ा सुखद संयोग है और आज के अवसर पर उसका उल्लेख करना जरूरी है कि हिंदी को सबसे पहले और सबसे अधिक समर्थन मिला, वह अहिंदी भाषी क्षेत्रों से मिला. तमिलनाडु से सुब्रमण्यम भारती, गुजरात से स्वामी दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी, बंगाल से आचार्य केशव चंद्र सेन, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, इन सबने सारे देश की भाषा के रूप में हिंदी के पक्ष में अपनी आवाज उठाई. उस समय भाषा का प्रश्न नौकरियों से जुड़ा नहीं था. भाषा का प्रश्न राष्ट्र की पहचान से, अस्मिता से, राष्ट्रीयता से संलग्न था और इसलिए सबकी सहमति से, सबके सहयोग से हिंदी आगे बढ़ी.

हिंदी केंद्र की राजभाषा होने के अलावा कुछ प्रदेशों की राजभाषा भी है. वहां राज-काज, शिक्षा-दीक्षा, न्यायदान आदि के लिए माध्यम के रूप में हिंदी का प्रयोग हो रहा है. केवल हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाएं भी अपने-अपने प्रदेशों में  फल-फूल रही है, माध्यम के रूप में विकसित हो रही हैं. लोकतंत्र में, लोकराज में शासन चलाना होता है. और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमारी भाषाएं बहुत अच्छी तरह से काम कर रही हैं. आज इस अवसर पर मैं हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं का अभिनंदन करता हूं.

आज लंदन में विश्व हिंदी सम्मेलन प्रारंभ हो रहा है. उसमें भाग लेने के लिए सारी दुनिया के प्रतिनिधि आए हैं. मैं यहां से उनके लिए भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं. 
हिंदी भाषियों से मुझे एक बात कहनी है, केंद्र में हिंदी की मंद गति देखकर उन्हें जरूर शिकायत होगी, लेकिन इस रास्ते में जो कठिनाइयां हैं, उनको समझने की आवश्यकता है. भाषा जोड़ने वाली होनी चाहिए, तोड़ने वाली नहीं. भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होनी चाहिए, उत्तेजना को जगाने का साधन नहीं. आज सारे देश में भाषा को लेकर कोई विवाद नहीं है. जो विवाद हैं, वे हल कर लिए गए हैं. हिंदी भाषी मित्रों से मैं कहना चाहता हूं कि जिन्हें हिंदी सीखनी पड़ती है, उनकी कठिनाई पर भी थोड़ा विचार करें. केंद्र की राजभाषा के नाते संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का उपयोग बढ़ रहा है. हिंदी फैल रही है, हिंदी पसंद की जा रही है. हिंदी नये-नये समर्थक तैयार कर रही है. थोड़े धैर्य की आवश्यकता है, थोड़ा दूसरे की भावनाओं को ध्यान में रखकर नीति निर्धारण करने की जरूरत है.

अपनी मातृभाषा से कितना प्यार करते हैं, उसका कितना अभिमान करते हैं, यह दक्षिण के अपने दौरे में देखता रहता हूं. चाहे वह तमिलनाडु हो या कर्नाटक या आंध्र या केरल, इन क्षेत्रों की भाषाएं समृद्ध भाषाएं हैं. इनका साहित्य प्राचीन है, हिंदी अपेक्षाकृत नई भाषा है, हिंदी खड़ी बोली का रूप है या मैं कहूं यह खड़ी बोली है तो कोई आपत्ति नही होनी चाहिए. इससे पहले अनेक बोलियां थीं, वे भी संपन्न थीं, वे समृद्ध थीं और आज भी हैं. उनके प्रयोग की फिर से प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह एक अच्छी प्रवृत्ति है.लेकिन दक्षिण में मैं जाता हूं, और अब दक्षिण में हिंदी बोलना कठिनाई का कारण नहीं है. थोड़ा सा यह ध्यान रखना पड़ता है कि जो पहला वाक्य है, वह उनकी मातृभाषा में होना चाहिए. वह तेलुगू में होना चाहिए, तमिल में होना चाहिए. ’सोदर-सोदरी मनुरा’- यह कहने के बाद आप हिंदी पर पहुंच जाएं, तो कोई आपत्ति नहीं करेगा, कोई बाधा पैदा नहीं करेगा. तमिलनाडु में ’वणक्कम’- यह मानो सारे दरवाजे खोल देता है.  हृदय के भी दरवाजे खोल देता है. भाषा में इतनी शक्ति है, एक शब्द में इतना प्रभाव है.

हमारी भाषाएं विज्ञान का, टेक्नोलॊजी का माध्यम बनें, अनुसंधान की भाषा बनें, और फिर पराई भाषा यह दायित्व पूरा नहीं कर सकती. उसके लिए अपनेपन की भाषा चाहिए. अन्य भाषाओं का भी हम अध्ययन करें, उनसे ज्ञान प्राप्त करें. लेकिन अनुसंधान के लिए, खोज के लिए और वर्तमान को अतीत से जोड़ने के लिए और वर्तमान को भविष्य से संबंधित करने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी भाषाओं का विकास करें. उन्हें आधुनिक ज्ञान विज्ञान का माध्यम बनाएं और उनके द्वारा आम आदमी तक पहुंचने की आवश्यकता को भी पूरा करें और उनके द्वारा राष्ट्र की संस्कृति, सभ्यता, इनको भी बलशाली रूप में प्रस्तुत करने का अभियान करें.

मुझे एक सुझाव मिला है. मैं उसका उल्लेख कर देना चाहता हूं. कुछ विद्वानों को एक प्रस्ताव भेजा है. अब समय आ गया है कि हम भारतीय भाषाओं की वर्तमान स्थिति पर विचार करने के लिए, उनकी आवश्यकताओं के बारे में पता लगाने के लिए, आदान-प्रदान के बारे में जानकारियां एकत्रित करने के लिए, एक भारतीय भाषा आयोग का गठन करें. भारतीय भाषा आयोग के गठन का प्रस्ताव बहुत अच्छा है. अगर मेरी सरकार कामचलाऊ सरकार न होती, तो मैं शायद उसे स्वीकार करके उसकी स्वीकृति का ऐलान कर देता. लेकिन अभी तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि बहुत अच्छा प्रस्ताव है, एक व्यावसायिक प्रस्ताव है. हमें सब भाषाओं के बारे में विचार करना चाहिए. इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना हमारी भाषाएं कैसे करें, इसके बारे में चिंतन करना चाहिए और चिंतन के लिए अगर एक मंच प्रस्तुत किया जा सके, तो मैं समझता हूं कि यह बहुत अच्छा होगा. चुनाव के बाद इस संबंध में अंतिम निर्णय लिया गया.   
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

सरदार अली जाफ़री शांति के कवि हैं

   


5 जून, 1998 को मशहूर शायर सरदार अली जाफ़री को 33वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करते समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी काव्य विशेषताओं पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि सबसे पहले मैं सरदार अली जाफ़री को बधाई देता हूं, ज्ञानपीठ पुरस्कार इस वर्ष उन्हें प्राप्त हुआ है. वे हम सबके अभिनंदन के अधिकारी है. मैं ज्ञानपीठ परिवार को भी बधाई देता हूं कि उन्होंने मुझे यहां आने का सुअवसर दिया. आजकल राजनीति की जो दशा हो रही है, उसमें यह अच्छा ही है कि कम से कम थोड़ी देर के लिए साहित्य के वातावरण का लाभ उठाया जाए. गर्म लू के झोंकों से त्रस्त होकर अगर कोई व्यक्ति पेड़ों की शीतल छाया में पहुंच जाए, तो उसे अपने लिए यह सौभाग्य की बात ही समझनी चाहिए.

जनाब अली सरदार जाफ़री साहब से मेरा बहुत पुराना परिचय है. सचमुच में हमारा जन्म स्थान एक है. उनका जन्म बलरामपुर में हुआ था और मेरा राजनीतिक जन्म बलरामपुर में हुआ था. 1957 में मैं पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए बलरामपुर गया था. लखनऊ से गाड़ी पकड़नी होती थी. छोटी लाइन थी. उससे पहले मैं बलरामपुर कभी नहीं गया था. लेकिन फ़ैसला हुआ, लड़ना है तो लड़ना है. मुझे शाम को गाड़ी में बिठाकर मित्र लोग चले गए. मैं अकेला था. जाते-जाते वो कह गए कि सवेरा जब आएगा तब बलरामपुर पहुंचोगे, सोते मत रहना. सवेरा होते-होते मेरी आंख खुल गई. मैंने सुना कि बाहर कौवों का बड़ा शोर हो रहा है. गाड़ी की खिड़की खोली, बाहर झांका, कुछ धुंधलका था, मगर हजारों कौवे वहां इकट्ठे थे, कांव-कांव कर रहे थे. मैंने पूछा, यह कौन-सा स्टेशन है ? कहा, यह कौवापुर है. इसके आगे बलरामपुर था. अभी भी बलरामपुर कौवापुर और इंटियालोक के बीच में है. 

बलरामपुर एक छोटी-सी जागीर थी. वहां के राजा महाराजा कहलाते थे. अली सरदार जाफ़री की कविता में उत्पीड़न और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का जो सबल स्वर उभरा है और जो हरेक हृदय को स्पर्श करता है, मुझे कभी-कभी लगता है कि बलरामपुर में बचपन में उन्होंने जो दृश्य देखे थे, उनकी छाया का एक अंग है. वे संघर्ष के कवि हैं, इंसानियत के कवि हैं, शांति के कवि हैं. यद्यपि कभी-कभी जंग का आह्वान भी उनकी कविता में सुनाई पड़ता है. जंग भी शांति के लिए. उत्पीड़न की समाप्ति के लिए. साम्राज्यवाद से लड़ने में उन्होंने इसी वृत्ति का परिचय दिया था.

जाफ़री साहब केवल कवि नहीं हैं, आलोचक हैं, कहानीकार हैं. जैसा डॊ. कर्णसिंह ने बताया, साहित्य के भंडार को उन्होंने भरा है. वे प्रगतिशील परंपरा के प्रमुख लेखक हैं. उनके विचारों से किसी का मतभेद हो सकता है, लेकिन उनकी पारदर्शी प्रामाणिकता सबको प्रभावित करती है और सब उसके सामने नत-मस्तक होते हैं. उर्दू और हिंदी को जोड़ने में इस समय अली सरदार जाफ़री एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी का साहित्य और अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य उर्दू में प्रकाशित हो और उर्दू का साहित्य भारतीय भाषाओं में स्थान पाए.

अली सरदार जाफ़री ने ’कुमारसंभव’ का उर्दू अनुवाद किया है. एक अलग रंग, एक अलग रस है. कबीर के बारे में लिखा है, मीरा पर लिखा है, रूपांतरित किया है. रैदास पर उनकी लेखनी चली है और इस प्रकार एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य साहित्य की दृष्टि से, संस्कृतिक दृष्टि से उन्होंने अपने हाथ में लिया है. यह दिल्ली है. 15 अगस्त को जब भारत स्वाधीन हो रहा था, तब उन्होंने जो कुछ लिखा था और जो उसी समय पढ़ा गया था, आज पुनरावृत्ति की प्रतीक्षा करता है.

मेरी दिल्ली मेरी महबूब दिल्ली
ग़ालिब और मीर की सरज़मीं 
अब तू कासिम शहंशाहों की दास ना
और खुतकाम की जागीरदारों की लौंडी नहीं है
ग़ैर मुल्कों के सरमायदारों की मंडी नहीं है
तू हमारी उम्मीदों का मरकज़ है
ख़्वाबों की ताबीर है, आरज़ुओं की तस्वीर है

कवि की आंखों में क्या सपने थे, हम हमारी दिल्ली के बारे में, क्या उन्होंने सोचा था, शब्दों की सीमित शक्ति में भी उसे बड़े प्रभावशाली ढंग से उन्होंने प्रकट किया है. फिर उन्होंने भविष्य की तस्वीर खींची है कि बच्चे किस तरह से खिलखिलाकर हंसेंगे, माताएं किस तरह से भीगे हुए आंचलों को सुखाएंगी, देवियां किस तरह से मांग में सिंदूर भरेंगी, बीवियां किस तरह से माथे पर हबशा लगाएंगी, अजंता की शहज़ादियां किस तरह से नाचेंगी, एलोरा की परियां अपनी सदियों की खामोशी को तोड़कर किस तरह से गीत गाएंगी, केतकी और चम्पा की कलियां अपनी खुशबू बिखेरेंगी और हिमालय की झोली में हंसते हुए सुर्ख दिलकश कमल नाजुक हथेली पर रंगीन शामें जलाएंगे.

अली सरदार जाफ़री साहब को कमल पहले से आकर्षित करता रहा है, कोई नया आकर्षण नहीं है. कीचड़ में रहकर भी जो निष्कलंक कमल है और ऐसे कमल की आवश्यकता कदम-कदम पर हमारे जीवन में दिखाई देती है. लेकिन बाद में जो तस्वीर उभरी, देश की जो स्थिति बनी, कवि का मन खट्टा हो गया. पाठक के नाते सबके मन पर चोट करेगा. जाफ़री साहब ने लिखा है-

गरीब सीता के घर पर कब तक रहेगी रावण की हुक्मरानी
द्रौपदी का लिबास उसके बदन से कब तक छिना रहेगा
शकुंतला कब तक अंधी तक़दीर के भंवर में फंसी रहेगी
ये लखनऊ की शगुफ्तगी मक़बरों में कब तक दबी रहेगी
सरों के ऊपर मुसीबतों के पहाड़ कब तक गिरा करेंगे

आने वाले काल की एक झलक उन्होंने इस कविता के द्वारा प्रस्तुत की थी और इसीलिए उन्होंने कहा कि शायरी, शायरी नहीं है, नफ़्स की आवाज़, बादलों की गरज है, तूफ़ान की सदा है. नफ़्स की आवाज़ यानी युद्ध का आह्वान. किसके खिलाफ युद्ध का आह्वान ? गरीबी के खिलाफ, बेकारी के खिलाफ, भुखमरी के खिलाफ, सांस्कृतिक दरिद्रता के खिलाफ, विघटन के खिलाफ, विभाजन के खिलाफ आज भी उनकी आवाज़ बुलंद है.

मैं उन्हें आश्वासन देना चाहता हूं कि हम कभी जंग की शुरुआत नहीं करेंगे. हम आत्मरक्षा में विश्वास करते हैं. 24 साल तक भारत संयम से बैठा रहा, तब कोई प्रतिबंध नहीं था, किसी तरह की रुकावट नहीं थी, जगह-जगह अणु परीक्षण हो रहे थे. लेकिन हमने कहा, यह रास्ता हमारा रास्ता नहीं है. लेकिन हमने एक बात और कही कि जिन्होंने एटमी हथियार इकट्ठे कर रखे हैं, वो उन हथियारों को खत्म करने के लिए कदम उठाएं. किसी ने सुना नहीं. हमारे चारों ओर असुरक्षा के बादल घिरते रहे. फिर वैज्ञानिकों से विचार-विनिमय करके एक फैसला हुआ. हमने स्पष्ट किया है कि हम अब आगे अणु-परीक्षण नहीं करेंगे. हमने जो जानकारी प्राप्त की करनी थी, कर ली, वो आत्मरक्षा के लिए है, बचाव के लिए है, आक्रमण के लिए नहीं है, हमले के लिए नहीं है. लेकिन जिस तरह से तालियां बजाने के लिए दोनों हाथ चाहिए, हाथ मिलाने के लिए भी दो हाथ चाहिए. मुझे विश्वास है कि बुद्धिजीवियों की आवाज, संवेदनशील हृदयों का स्वर, विवेकशील नागरिक इस स्थिति को समझेंगे और इसके साथ अपने को जोड़ेंगे.

मेरा और जाफ़री साहब का केवल बलरामपुर का संबंध नहीं है, लखनऊ का भी है. अभी वो याद दिला रहे थे कि आगरे में भी हम इकट्ठे थे. आज उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. ऐसा करके हमने सचमुच में जनाब अली सरदार जाफ़री को सम्मानित नहीं किया है, बल्कि उनका सम्मान करके स्वयं को सम्मानित किया है. अपने को सम्मनित किया है. जीवन-भर की उनकी साधना, उनका संघर्ष, उनकी देशभक्ति और सामाजिक न्याय के प्रति उनका समर्पण, ये सब अभिनंदन के अधिकारी हैं.

ज्ञानपीठ को मैं बधाई देता हूं, प्रवर समिति के अध्यक्ष डॊ. कर्णसिंह और उनके साथियों को बधाई देता हूं कि उन्होंने सही चुनाव किया. डाक-तार विभाग भी धन्यवाद का पात्र है, जिसने इस अवसर पर एक टिकट निकाला. भविष्य में वो ध्यान रखें कि अगर वो टिकट निकालते हैं, तो केवल पति का टिकट नहीं होना चाहिए, उसमें पत्नी का भी समावेश किया जाना चाहिए और सुष्मा जी को तो इसमें कठिनाई नहीं होनी चाहिए.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Saturday, July 4, 2026

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 भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री Nitin Nabin जी का दौरा लखनऊ, चर्चा राजनीतिक दृष्टिकोण.

Wednesday, July 1, 2026

ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के महान कवि हैं

   


उर्दू और फ़ारसी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब पर 13 दिसंबर, 1998 को आयोजित समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उर्दू के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में हूं. मुझे बोलने के लिए सिर्फ़ दस मिनट दिए गए हैं. ’उम्रे-दराज मांग कर लाए थे.’ कुल दस मिनट हैं. हम राजनेता बोलते हैं तो फिर रुकने का नाम नहीं लेते. फिर मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में बोलना. मैं उर्दूदां नहीं हूं. लेकिन मिर्ज़ा साहब को मैंने पढ़ा है. वे विश्व के महाकवियों में से एक हैं. उर्दू और फ़ारसी में उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह विश्व साहित्य की एक धरोहर है. मैं उनके बारे में क्या कहूं ? जब मैं तकरीर की तैयारी कर रहा था और किताबें इधर-उधर फैली थीं, तो उनके एक शेर पर मेरी नजर पड़ी. 
पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या ?

मैं नहीं जानता कि यह शेर किस संदर्भ में कहा गया. लेकिन यह उन्हीं का शेर है. ग़ालिब कौन ? इसके जवाब में लंबी-चौड़ी तकरीरें की जा सकती हैं. किताबें लिखी गई हैं, शोध हुए हैं. और यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा. 

मिर्ज़ा ग़ालिब एक बड़े योद्धा वंश के वंशधर थे. फ़ारसी के अप्रतिम विद्वान. मुगल साम्राज्य के इतिहास मंल अपने समय के प्रतिष्ठित स्वाभिमानी नागरिक. फ़ारसी और उर्दू के महान कवि या फिर मध्यकाल और आधुनिक काल की युग-संधि पर खड़े हुए एक संवेदनशील व्यक्ति. दो सौ साल पुरानी बात है. मुगल साम्राज्य खत्म हो रहा था, मगर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. अंग्रेज हमारे मुल्क में पांव जमाने में लगे थे, मगर पूरी तरह पांव जमे नहीं थे. एक संक्रमण का काल था. अब उस संक्रमण के काल में मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा- उन्होंने अपनी पीड़ा के बारे में लिखा. लेकिन सार्वजनिक पीड़ा भी उनकी वाणी में अभिव्यक्त हुई. खुद अपने बारे में उन्होंने लिखा था-
होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वह बहुत अच्छा है, मगर बदनाम बहुत है

किस बांकपन से अपने को बदनाम करने वालों को निरुत्तर करते हुए उन्होंने अच्छे शायर के रूप में सर्वविदित होने का दावा किया है. इसी क्रम को बढ़ाया जाए, तो उन्हीं के शब्दों में कहा जा सकता है कि उनकी खास विशेषता अंदाजे-बयां या वर्णन का उनका अदभुत तेवर है-
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और

इस शेर में उन्होंने अपने को बहुत अच्छा सुखनवर कहते हुए, सुखनवर कवि और काव्यमर्मज्ञ दोनों का समावेश किया है.  अपनी खासियत अंदाजे-बयां को बताया है, जो और शायरों से बहुत भिन्न है. मरने के बाद उनके किस गुण को याद करके उनके मित्र सिर धुनेंगे. इस सवाल का जवाब भी ग़ालिब खुद दे गए हैं-  
क्या बयां करके रोएंगे मेरे यार
मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी

साफ है कि ग़ालिब को दूसरों को विकल बनाने की अपनी जो क्षमता थी, उस पर भरोसा था. उस समय काव्य के विषय सीमित थे. ग़ालिब बड़ी पृष्ठभूमि में लिखना चाहते थे. व्यापक और विस्तृत उनका परिवेश था. लेकिन सबमें बात कहने की उनकी जो वक्रता है, वो उनको सब शायरों से अलग कर देती है. उनकी कविता से यह बात साफ झलकती है कि मध्य युग से जुड़े होते हुए भी वे आधुनिकता की ओर मुड़ना चाहते थे-
बकद्रे-शौक नहीं दर से तंग ना एक गजल
कुछ और चाहिए बुसत मेरे बयां के भी हैं

कुछ और चाहिए. यह स्पष्ट है कि ग़ालिब जिन भावों को अपने काव्यों में लाना चाहते थे, वे तत्कालीन काव्य के दायरे में नहीं समा पा रहे थे. अतत: वे काव्य के क्षेत्र के और विस्तार के पक्ष में थे.

ग़ालिब मुख्यत: इंसानी रिश्तों के कवि थे.  अपने जीवन की सार्थकता और विफलता, दोनों के लिए ही वे इश्क को जिम्मेदार मानते थे. उनका सुप्रसिद्ध शेर है-
इश्क से तबीयत से जिस्त मजा पाया
दर्द की दवा पाई और दर्द बेदवा पाया

उन्हें जीवन का आनंद प्रेम से ही मिला था, जो एक ही साथ उनके सभी दर्दों की दवा भी था और ऐसा दर्द भी था, जिसकी कोई दवा नहीं थी. कोई पूछ सकता है कि अगर यह दर्द बेदवा है, तो फिर इसे पालने की जरूरत क्या है ? ग़ालिब का मासूम उत्तर है-
इश्क पर जोर नहीं है, ये वो आतिश है ग़ालिब
कि लगाए न लगे, बुझाए न बुझे

मगर उन्होंने आगे यह भी कहा-
इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना वो (हम) भी आदमी थे काम के

मैंने थोड़ा-सा बदल दिया है. हम की जगह वो. लेकिन मैं इतना कहना चाहूंगा कि उस युग के बहुत से काम के आदमी न जाने किधर बिला गए. पर प्रेम प्रकाश में प्रदीप्त ग़ालिब आज भी असंख्य लोगों के हृदय के हार बने हुए हैं. उन लोगों को लगता है कि ग़ालिब ने उन लोगों के दिल की बात कितने अच्छे ढंग से कितनी खूबसूरती से पेश की है. दुख में, सुख में, प्रेम के उल्लास में, प्रेमी की हताशा में, निराशा में ग़ालिब की पंक्तियों को दोहराकर लोग सुकून पाते हैं. ग़ालिब अपनी संभावना को समझ गए थे और उन्होंने इस बात को कहा भी था.
कवि की सबसे बड़ी सार्थकता यह है कि आम आदमी उसके साथ अपने को जोड़ सके और यह समझ सके कि उसके दिल का दर्द कहीं आवाज पा रहा है. किसी और के हृदय को झनझना रहा है. ग़ालिब की प्रेमानुभूति, इश्कमिजाजी और इश्क हकीकी के दोनों छोरों से जुड़ी हुई है, लेकिन मानवता को समर्पित है. उस युग के कवियों का एक तीसरा पहलू बड़ी मुश्किल से मिलता है.
इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत मेरी शोहरत ही सही
कता कीजे न ताल्लुक हमसे
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

यह सियासत पर बहुत फिट बैठता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

विजयादशमी

    आज विजय का पर्व है. भारतीय राष्ट्र की अगणित महान विजयों का राष्ट्रीय पर्व. हमारा राष्ट्र-जीवन केवल उन्नीस सौ पचास वर्ष पुराना नहीं है. स...