Wednesday, July 15, 2026

जनप्रतिनिधि शासन का प्रशिक्षण लें

   


महाराष्ट्र के मुंबई के समीप  7 जनवरी, 2003 को केशव सृष्टि म्हालगी प्रबोधिनी के प्रशिक्षण केंद्र के लोकार्पण समारोह को  संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बात पर बल दिया कि जनप्रतिनिधियों को शासन चलाने से संबंधित प्रशिक्षण लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि रामभाऊ म्हालगी के संबंध में एक प्रसंग याद आ रहा है. उन्होंने जब लोकसभा में पंचवर्षीय योजना के संबंध में भाषण दिया, उस पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री यशवंत चव्हाण ने बहस का उत्तर देते हुए एक वाक्य में सारी चर्चा को समाप्त करने का प्रयास किया था. तब उन्होंने रामभाऊ के भाषण की ओर संकेत करते हुए कहा था- उनके वे शब्द मुझे अभी तक याद हैं, मैं दोहराता हूं कि ’नियोजन ह्या मंडलींचा विषय नाहीं.’ नियोजन से जनसंघ वालों का कोई संबंध नहीं है. उस दिन मुझे लगा और रामभाऊ ने भी अनुरोध किया, हम राजनीति में आ गए हैं, राष्ट्र की सेवा हमारा लक्ष्य है, अगर हम चुनाव लड़ेंगे, सत्ता में आने का प्रयास करेंगे, इसके लिए हमें सभी विषयों की जानकारी प्राप्त करनी होगी, शासन चलाने का एक तरह से प्रशिक्षण लेना होगा. 

राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन चलाने वाली सरकारी यंत्रणा, जिसे आप ’ब्यूरोक्रेसी’ कह सकते हैं, उसमें खाई बढ़ती जा रही है. लोकप्रियता एकमात्र निष्कर्ष है. मतदाता किसका समर्थन करेंगे, यह कह नहीं सकते. लेकिन जो भी चुनकर आएगा, वह अगर शासन चलाने के मामले में, राजकाज चलाने के मामले में बिल्कुल अनभिज्ञ होगा, तो लोकतंत्र, जड़ शासनतंत्र में बदल जाएगा. शासन चलाने की जो पद्धति है, उसमें अगर परिवर्तन किया जाए, तो बात अलग है, लेकिन बड़ी मात्रा में आज चुने हुए राजनीतिक नेताओं को ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर रहना पड़ता है. ब्यूरोक्रेसी का काम है कि वह सहायक हो, जानकारी दे, अपनी सलाह भी दे, लेकिन उस सलाह को नाप तौलकर व्यवहार में लाने की जिम्मेदारी राजनीतिक नेताओं की है. मैं देखता हूं कि यह जिम्मेदारी घट रही है. जो लोग राजनीति में जाना चाहते हैं या जो उसके लिए तैयार हो रहे हैं, वे बौद्धिक दृष्टि से अपने को समृद्ध कर रहे हैं, तैयार कर रहे हैं, ऐसा दृश्य हमें दिखाई नहीं देता. शायद ’प्रबोधिनी’ ये पहला प्रयास है अपने ढंग का. और इसलिए मैं इसका स्वागत करता हूं. प्रशिक्षण का रूप क्या हो, उसका विवरण क्या हो, ये प्रबोधिनी तय करेगी. ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. शासन भी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. 

लोकतंत्र में सत्ता का विभाजन होगा. एक्जक्यूटिव हैं, लेजिस्लेचर हैं और ज्यूडिशियरी की एक अलग भूमिका है. अब जिन्होंने अपने को उसके लिए तैयार नहीं किया है, उनसे यह आशा तो की ही जाती है कि राजनीतिज्ञ सत्ता में आने के बाद जल्दी से जल्दी अपने को तैयार करें. लेकिन तैयारी की कोई पृष्ठभूमि चाहिए. यही कठिनाई होती है. शासन जीवन के सभी क्षेत्रों में फैल रहा है. और भले ही हम कहें कि शासन में विकार कम होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है, संकुचित होती जा रही है. और आख़िर में वह थोड़े से चोटी के लोगों पर निर्भर करती है. उसमें जिन्होंने ट्रेनिंग ली है, इस अर्थ में उन्होंने नौकरी करने के लिए वह रास्ता चुना, उनमें और जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में आमना-सामना होता है, तो फिर ये अनुभव होता है कि जनप्रतिनिधि जितने तैयार होने चाहिए, उतने नहीं हैं. अभी तक ऐसा प्रयास नहीं हुआ था, वह हो रहा है और बड़ी अच्छी बात है. 

लोकसभा की आप डिबेट कभी सुनें जाकर. सदस्यों को समय नहीं मिलता, ये शिकायत होती रहती है, लेकिन उन्हें जब समय मिलता है तब वे क्या बोलते हैं मालूम नहीं. वे इसकी तरफ ध्यान नहीं देते, तैयारी नहीं करते. अब काम, कमीटियों में होता है, कमीटियों में उपस्थिति नहीं होती. तैयार होकर सदस्य नहीं आते. उनकी रुचि भी नहीं होती. जब तैयार होने की पृष्ठभूमि नहीं होती, इसलिए ऐसी ट्रेनिंग के लिए जनप्रतिनिधियों में रुचि पैदा होना भी जरूरी है. उनमें विषय को समझने की तैयारी हो, और फिर उसके अनुसार काम लेने की तैयारी हो. मैं समझता हूं कि प्रबोधिनी इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है. यहीं कहीं केशव सृष्टि है. मुझे इस नई सृष्टि को देखकर बड़ा आनंद हुआ है. यहां आने तक मुझे यह कल्पना नहीं थी कि इस सृष्टि का रूप क्या है ? जो कुछ आज मैंने देखा, मुझे आश्चर्य है, सुखद आश्चर्य है. अब कोई यह नहीं कहेगा कि नियोजन या मंडलींचा विषय नाही. उस विश्वास के अनुरूप  हम शासन के हर एक अंग को किस तरह से चला सकते हैं, किस तरह से सही परिणाम पा सकते हैं, इस दृष्टि से विचार करने की जरूरत है. और मैं समझ रहा हूं कि जो भी इस दिशा में प्रयास हुआ है, वह प्रशंसनीय है. बड़ी संख्या में हमारे कार्यकर्ता इसका लाभ उठाएं, प्रशिक्षित हों. पहले शिक्षित हों, फिर प्रशिक्षित हों, परंतु अभी तो ’शिक्षा’ ही शुरू नहीं हुई है. ये शिक्षा मराठी वाली शिक्षा नहीं है. ’शिक्षण’ अभी तो शिक्षण ही शुरू नहीं हुआ है. इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई है. लेकिन अब आवश्यकता का अनुभव हो रहा है. यह अभाव था. जो खल रहा है. और जो सत्ता में बैठे हैं, उनको तो ये अभाव ज्यादा खलेगा.

जो सत्ता में हैं, जो बाद में सत्ता में जाएंगे, उन्हें यह अभाव न खले, इसके लिए उन्हें अपने आप को अभी से तैयार करने की जरूरत है. यही प्रयास हो रहा है, बड़ी प्रसन्नता है. मैं सफलता की कामना करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए

   


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 20 फरवरी, 1999 को बस से लाहौर की यात्रा प्रारंभ की थी. वे 22 सदस्यों वाला एक प्रतिनिधिमंडल भी अपने साथ लेकर गए थे, जिनमें देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हस्तियां सम्मिलित थीं. लाहौर के ऐतिहासिक किले में अटलजी के सम्मान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भोज दिया था. इस अवसर पर उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कल आए थे, आज जा रहे हैं, दुनिया का यही तरीका है. लेकिन मैं अकेला नहीं जा रहा हूं. आया भी अकेला नहीं था. मेरे साथ एक प्रतिनिधिमंडल आया है, एक डेलीगेशन आया है. भारत के चुने हुए लोग. अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कमाने वाले मेरे साथ आए हैं. मुझे 24 घंटे मिले. लेकिन इन 24 घंटों में मुझे ऐसा लगता है कि दिल्ली और लाहौर  की दूरी कुछ कम हो गई है. हम कुछ नजदीक आ गए हैं. कुछ भरोसा बढ़ गया है. साथ मिलकर चलने के लिए कदम में कुछ तेजी आ गई है.

जैसा मैंने कल कहा था, मैं जानबूझ कर बस से आना चाहता था. पहले इरादा बाघा की सीमा से मियां साहब से मिलकर वापस जाने का था. उन्होंने कहा ऐसा नहीं हो सकता, दरवाजे से लौट जाएं ये भी कोई बात हुई. घर के भीतर तक आना चाहिए. लाहौर की कई यादें मेरे दिमाग में हैं. मैं पहली बार नहीं आया हूं और आखिरी बार भी नहीं आया हूं. पहली दफा जब मैं आया. अंग्रेजों का राज था. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. हाई स्कूल का विद्यार्थी था. उस समय अनारकली देखी थी. बाद में जब वजीरे-खारजा बनने के बाद आया, तो रात में पंजाब के गवर्नर साहब से मैंने कहा था कि मेरा जो ऒफिशियल प्रोग्राम है, उसमें अनारकली जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती. मगर अनारकली जाए बिना मैं कैसे दिल्ली वापस जा सकता हूं. रात में मेरे लिए अनारकली जाने का खास इंतजाम किया गया था. इस बार मैं नहीं गया, क्योंकि और नई कलियां खिल गई हैं. 

24 घंटे के भीतर हमने कुछ फैसले किए हैं, अच्छे फैसले किए हैं. मुझे भरोसा है आपको पसंद आएंगे. दुनिया हैरान है और हम भी कभी-कभी सोच-सोच कर संकोच में पड़ जाते हैं कि आखिर हम दौड़ क्यों रहे हैं ? कल मियां साहब ने भी यह सवाल उठाया था. यह सवाल हम सबको कुरेदता है. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है. साम्राज्यवाद समाप्त हो गया. कहते हैं वह ऐसा राज था, जिसमें सूरज नहीं डूबता था. मगर सूरज के देखते-देखते वह राज डूब गया. बेड़ियां टूट गईं. हथकड़ियां छूट गईं. जब तक हम पराधीन थे, गुलाम थे, यह कहकर अपना मन बहला लिया करते थे कि जब हम आजाद हो जाएंगे, तो ये करेंगे वो करेंगे. हर बात के लिए हम कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते थे. 

आज दुनिया कोई बहाना सुनने को तैयार नहीं है. आज हमारा मन भी नया बहाना गढ़ने को तैयार नहीं है. भगवान का दिया सबकुछ है. प्रकृति ने दौलत लुटाई है यहां. इतनी बड़ी आबादी है, जनबल है. मेहनती किसान है. पसीना बहाने वाला मजदूर है. थोड़ी-सी आमदनी में घर को कुशलता से चलाने वाली गृहणी है. विज्ञान और टेक्नोलॊजी पर प्रभुत्व जमाने वाले नौजवान हैं. फिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं ? कल प्रधानमंत्री जी ने मेरी कविता की कुछ पंक्तियां, कुछ लाइनें उद्धृत कीं. ’जंग न होने देंगे.’ यह कविता वजीर बनने के बाद नहीं लिखी गई है, पहले लिखी गई थी.
भारत-पाकिस्तान पड़ौसी साथ-साथ रहना है
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा है
रूसी बम हो या अमरीकी, खून एक बहना है
जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे
जंग न होने देंगे

मगर इसके पहले एक छंद मैं आपके सामने रखना चाहता हूं.

क्यों हमें जंग रोकना है ?
क्यों हमें ऐसे हालात पैदा करने हैं
जिनमें जंग न हो, अमन हो
शांति बने रहे, हथियारों पर भी खर्चा न हो
जितनी जरूरत का है, उतना ही हो

उस समय मैंने लिखा था-
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी

इस दुनिया में जिंदगी से बढ़कर क्या नियामत हो सकती है, जिंदगी से बढ़कर और क्या वरदान हो सकता है. कभी-कभी हम जिंदा हैं, तो शायद यह नहीं समझते कि जिंदगी कितनी कीमती है. जिंदगी कितनी अनमोल है.

हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
सृजन माइने निर्माण
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से

ऐसा नहीं कि हम निठल्ले बैठे हैं. निठल्ला बैठना भी नहीं चाहिए. हम जूझेंगे, लेकिन किससे जूझेंगे. पड़ौसी से नहीं, आपस में नहीं.
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी

हम दुनिया को दावत दे रहे हैं आइए, हमारी मदद करिए, साथ मिलकर चलिए. हम जानते हैं कि हमें अपना विकास करना होगा. अपने पैरों पर आप खड़े रहना पड़ेगा. मगर दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि हम अपने को टापू नहीं बना सकते. एक-दूसरे की मदद लेनी चाहिए. एक-दूसरे की सहायता से आगे बढ़ने की कोशिश होनी चाहिए. हम दुनिया को दावत दे रहे हैं कि आइए.

हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी
हरी भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे
जंग न होने देंगे

आप में से कोई पूछ सकता है जब आपने ऐसी कविता लिखी, जंग न होने देंगे, यह ऐलान कर दिया, तो फिर पोखरण विस्फोट करने की क्या जरूरत थी. यह सवाल उठ सकता है, उठना चाहिए. इस पर खुले दिल से बातें होनी चाहिए. हमने पोखरण विस्फोट हमले के लिए नहीं किया, बचाव के लिए किया है. हम तीन बार लड़ाइयों में फंस चुके हैं. हम हमेशा के लिए लड़ाई रोकना चाहते हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने में परमाणु विस्फोट हुआ था. उसके बाद भारत इंतजार करता रहा. हम उम्मीद कर रहे थे कि यह हथियार दुनिया में समाप्त कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दुनिया न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट की ओर नहीं बढ़ी. हथियार और संगीन होते गए. धारें और पैनी होती गईं. कुछ लोग इस काम में लगे रहे. हमारे वैज्ञानिकों ने कहा कि कुछ सोचने की जरूरत है. अणु शक्ति का शांति के लिए उपयोग हो यह बहुत जरूरी है. लेकिन विनाश के लिए इसका कोई उपयोग न कर पाए इसकी रोकथाम भी जरूरी है.

हमने विस्फोट करने के बाद ऐलान कर दिया कि अब हम विस्फोट नहीं करेंगे. हमने यह भी ऐलान कर दिया कि हम एटमी हथियारों का उपयोग करने वाले पहले देश नहीं होंगे. खुद उपयोग नहीं करेंगे, शुरुआत नहीं करेंगे. हमने यह भी कहा कि जिनके पास एटमी हथियार नहीं हैं, उनके खिलाफ हम एटमी हथियार काम में नहीं लाएंगे. नैम (NAM) के सदस्य के नाते, जिसकी अभी दक्षिण अफ्रीका में बैठक हुई थी, हमने फिर इस बात को दोहराया है कि एक वक्त का ढांचा बनाकर सारी एटमी हथियारों को खत्म करने का काम शुरू होना चाहिए. जरूरत क्या है एटमी हथियारों की. किसी जमाने में इन हथियारों ने, एटमी हथियारों ने एक रोल अदा किया होगा. बैलेंस ऒफ टेरर का. अब इसकी कोई जरूरत नहीं है. कितना खर्चा हो रहा है. होड़ लगी है. आज इस सवाल पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से भी बात हुई है. हमने तय किया है कि हम अपने ख्यालात का तबादला करते रहेंगे. भारत क्या कर रहा है, पाकिस्तान क्या कर रहा है. यह आपस में पता नहीं है. अगर पता लग रहा है, तो दूसरों से लग रहा है. दूसरे पूछते हैं कि क्या आपको मालूम नहीं है कि आपका पड़ौसी क्या कर रहा है. इस हालत को बदलने की जरूरत है.

विश्व में जनमत बनाना पड़ेगा. यह जरूरी है कि इस संबंध में भारत और पाकिस्तान मिलकर काम करें. दोनों की जिम्मेदारी बढ़ गई है. अब अमन के सिवा कोई रास्ता नहीं है. अब चिंगारी का खेल नहीं चलेगा. छोटी सी चिंगारी आग में बदल सकती है. आग सब कुछ जलाकर खाक कर सकती है. चिंगारी को रोकना होगा. ध्यान, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, इनके निराकरण की ओर लगाना पड़ेगा. किस तरह से हम पिछड़ रहे हैं ? किस तरह से ? लोग, जिस तरह की जिंदगी जीना चाहिए, उस तरह की जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं. इसके लिए शांति चाहिए. शांति के लिए जो मसले हैं, उनको हल करने की जरूरत है. मसले हल करने के लिए भरोसे की हवा पैदा करने की जरूरत है, विश्वास का वातावरण बनाने की जरूरत है.

सवेरे यह सवाल उठा कि मुझे मिनारे-पाकिस्तान जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए. प्रोग्राम बन गया था. लेकिन कुछ लोगों की राय थी कि अगर मैं वहां गया तो फिर पाकिस्तान के ऊपर मेरी मोहर लग जाएगी. मैंने कहा, क्या मतलब है इसका ? क्या पाकिस्तान मेरी मोहर से चलता है ? पाकिस्तान की अपनी मोहर है और वह चल रही है. लेकिन शक इतना गहरा है. हो सकता है कि मैं वापस जाऊं और मुझसे सवाल किए जाएं कि आप गए थे ऒफिश्यल विजिट पर, मिनारे-पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत. मैं जवाब दूंगा. मेरे जवाब से लोग संतुष्ट होंगे, मैं यह भी जानता हूं. लेकिन कुछ नहीं होंगे, यह भी मैं जानता हूं. लेकिन मुझे मिनारे-पाकिस्तान पर जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए, यह भी बहस का एक मुद्दा बन गया है. यह ठीक है कि हम बंटवारा नहीं चाहते थे. मैंने आपसे कहा, जब मैं यहां आया तब सारा हिन्दुस्तान एक था, अंग्रेज राज कर रहे थे. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. वह हिन्दुस्तान हमारी आंखों में है. देश का बंटवारा हुआ.

देश अलग-अलग राज्यों में बंटा, अलग-अलग राष्ट्रों में बंटा. हमारे दिल में घाव लगा. अब घाव भर गया है. दाग जरूर बाकी है. लेकिन वह दाग हमें इस बात की याद दिलाता है कि हमें मिलकर साथ रहना है. और साथ रहने के लिए मिलकर चलना जरूरी है.

पाकिस्तान फले-फूले हम चाहते हैं और हम फले-फूलें यह आप भी चाहते होंगे. इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता. ज्योग्राफी नहीं बदली जा सकती. आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ौसी नहीं बदल सकते. हम अच्छे पड़ोसी के नाते रहें. 1977-78 में भी हमने शुरुआत की थी, आपको याद होगा. दोनों देशों के बीच आना-जाना आसान कर दिया था. लोग अभी तक उस बात को याद करते हैं, हम फिर वह काम करने जा रहे हैं. आज कुछ फैसले हुए हैं. मैं एकतरफा उनका ऐलान नहीं करूंगा. वक्त आने पर उनका ऐलान होगा. लोग परिवार वालों से मिलने नहीं जा सकते. हाई कमीशन में भीड़ लगी है. दरवाजे वक्त पर खुलते हैं, वक्त पर बंद होते हैं. और अगर बेवक्त कोई मुसीबत आ जाए तो. और आती है मुसीबत. खबर देकर थोड़े ही आती है. लेकिन मिलने के लिए जा नहीं सकते हैं. अगर पहुंच भी गए, तो भी जिस शहर का वीजा बनाया गया है, उससे दूसरे शहर में जाना है तो पुलिस तस्वीर में आ जाती है और पुलिस के साथ क्या-क्या आ जाता है, यह बताने की जरूरत नहीं है. जो पुलिस वाले मेरी बात सुन रहे हों, बुरा न माने. जो यहां मौजूद हैं, मैं उनके लिए नहीं कह रहा. मैं एक सिस्टम की बात कह रहा हूं. पर इस चीज के बारे में भी सोचा जाना चाहिए. 

लोग मछलियां पकड़ने के लिए आते हैं. समुद्र में भटक जाते हैं. हवालात में पहुंच जाते हैं. मछली पकड़ने की बजाय ख़ुद पकड़ में आ जाते हैं. हमने तय किया है कि ऐसे लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिए. लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों के तय करने से बात नहीं बनेगी. यह मैं साल भर प्रधानमंत्री बने रहने के बाद समझ गया हूं. इसके लिए कुछ और करना पड़ेगा. लेकिन हम करेंगे, हमने तय किया है. हमारा फैसला है. स्थिति बदलनी चाहिए. हवा में और तरह की रंगत आनी चाहिए. दोस्ती की जरूरत है. दोस्ती के साथ भरोसे की जरूरत है. मैं चाहता था कि सरदार जाफरी साहब मेरे साथ आते. मगर वह आ न सके. उनका एक शेर आज मैंने यहां के एक अंग्रेजी अखबार में देखा.
तुम आओ गुलशने-लाहौर से चमन बरदोश
हम आएं सुबह बनारस की रौशनी लेकर
फिर उसके बाद यह पूछें कि कौन दुश्मन है

बहुत दिन दुश्मनी हो ली. अब कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए. बहनो और भाइयो, हमने पाकिस्तान के साथ-साथ, सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है. अभी श्रीलंका के साथ समझौता हुआ है फ्री ट्रेड के बारे में. बांग्लादेश के साथ भी हमने नहरी पानी का समझौता किया है. आपने यह भी पढ़ा होगा कि दिल्ली से लाहौर बस चल रही है, तो अब ढाका से कलकत्ता तक भी बस चलने वाली है. एक बस नहीं है. बस करो यह भी नहीं है. अभी तो शुरुआत करनी है. दोस्ती से कभी जी नहीं भरता. हां, दुश्मनी में ऐसा मुकाम जाता है  कि जब दिल करता है कि अरे छोड़ो. दुनिया में आर्थिक संबंधों का विकास हो रहा है. हम पाकिस्तान के साथ भी व्यापार के आर्थिक संबंधों में विस्तार के कदम उठाना चाहते हैं. अगर आपके पास बिजली ज्यादा है, हम खरीदना चाहेंगे. जरा भाव ठीक होना चाहिए. बाढ़ और तूफान के बावजूद हमारी गेहूं की फसल अच्छी हुई है. हमने मियां साहब से कहा कि हमने सुना है कि आप बहुत दूर से गंदम ला रहे हैं. हम आपके दरवाजे पर गंदम पहुंचा देते हैं. और चीजें हैं, गिना नहीं रहा हूं. 

मसले हल होंगे. मसले ठीक होने के लिए ठीक वातावरण बनाना चाहिए. कुछ कदम हिम्मत के साथ उठाने पड़ेंगे. और मैं आपसे वादा करना चाहता हूं. जहां तक हिम्मत के साथ कदम उठाने की जरूरत पड़ेगी, आप मुझे और मेरे साथियों को कमजोर नहीं पाएंगे. पीछे हटते हुए नहीं पाएंगे. जब पोखरण में एटमी विस्फोट करने का फैसला हुआ, तो मुझे लोगों ने मेरी ही कविता याद दिलाई थी. मैं हिरोशिमा गया था. मैंने नागासाकी का दृश्य देखा था. वहां बम चलाया जाता, उसकी जरूरत नहीं थी. वहां लड़ाई खत्म हो गई थी. मित्र देश जीत गए थे. वह आत्मरक्षा के लिए चलाया गया एटमी हथियार नहीं था. आज वे लोग भुगत रहे हैं.

मेरी कविता का शीर्षक था-हिरोशिमा की कविता. एक शायर के दिल की पीड़ा थी. और इसलिए जब एक गंभीर फैसला किया गया, तब भी मेरा दिमाग साफ था. हमें मिलकर एटमी वेपन फ्री वर्ल्ड का निर्माण करना है. हम अपने एटमी हथियारों को काम में लाएं, इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता. लेकिन इसके लिए दोस्ती का माहौल चाहिए. मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी 24 घंटे की यात्रा इस तरह का माहौल बनाने में मदद करेगी. मैंने कहा कि दिल्ली और लाहौर की दूरी थोड़ी कम सी हो गई है. ये दूरी हमें और कम करनी है. और केवल लाहौर की ही नहीं, सारे पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच नजदीकी लानी है. मुझे विश्वास है कि इस सब में पाकिस्तान के वजीरे-आजम का सहयोग और उनके साथियों का सहयोग मिलेगा. पाकिस्तान के अवाम का सहयोग मिलेगा. और हम मिलकर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगे.

आपने मेरा और मेरे डेलीगेशन का जो स्वागत किया, उसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं. मैं कोशिश करूंगा कि मन में जो आशाएं जगी हैं, उन आशाओं को हम लोग मिलकर पूरा कर सकें और साउथ एशिया में एक नया वातावरण और नई हवा पैदा कर सकें. बहुत-बहुत शुक्रिया.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता चाहते हैं

   


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 15 अगस्त, 1998 को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की प्राप्ति पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि देखते ही आधी शताब्दी बीत गई. लगता है कि कल ही की बात है. पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इसी स्थान पर पहली बार हमारा प्यारा तिरंगा नीले आसमान में फहराया था. उसके पश्चात प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर इस ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्रीय ध्वज फहराने की परंपरा चलती आ रही है. मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि यह सौभाग्य एक दिन मुझे भी मिलेगा. एक गरीब स्कूल मास्टर के लड़के का धूल और कुएं से भरी बस्ती से उठकर लाल किले की प्राचीर तक पहुंचना और स्वतंत्रता के पावन पर्व पर तिरंगा फहराना, यह भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और क्षमता को उजागर करता है. 

हम सब जानते हैं कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है. एक तरफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आंदोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएं सहन कीं, तो दूसरी ओर हजारों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फांसी का तख्ता चूम कर अपने प्राणों का बलिदान दिया. हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है. आइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े.

हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है. पचास वर्षों के इस छोटे से काल खंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं. लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी है. इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है- हमारे सेना के जवानों को. अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रख कर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते हैं. इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते हैं. सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियां हों या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिन्द महासागर का गहरा पानी, सभी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खड़ा है. इन सभी जवानों को, जो थल सेना, वायु सेना और जल सेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित हैं, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयां देता हूं और इतना ही कहता हूं कि हे भारत के वीर जवानों ! हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है.

सेना को समर्थन चाहिए जनता का. गत पचास वर्षों में किसानों और मजदूरों ने खेत-खलिहानों में, कल-कारखानों में देश की दूसरी रक्षा-पंक्ति को मजबूत किया है, हम यह भूल नहीं सकते. लाल बहादुर शास्त्री जी ने कहा था, "जय जवान, जय किसान," मानो हर कोई एक दूसरे के बिना अधूरा है, एक दूसरे के बिना अपूर्ण है.

मैंने अब इसमें नया आयाम जोड़ा है- ’जय विज्ञान’ 21वीं सदी में देश की सुरक्षा, देश का विकास बीती सदी के साधनों से नहीं किया जा सकता. 

इसी उद्देश्य से और केवल इसी उद्देश्य से हमने 11 मई और 13 मई को पोखरण में अणु विस्फोट किया था. पोखरण का विस्फोट वह एक रात का खेल नहीं था. हमारे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और हमारे सुरक्षा बलों के बरसों की तपस्या का यह फल था. 25 वर्ष पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस कार्य की नींव रखी थी, मैंने उस पर इमारत को खड़ा करने का प्रयास किया है. 

मैं जानता हूं कि केवल निमित्त मात्र हूं. इस महान उपलब्धि का सेहरा तो वैज्ञानिकों की कुशाग्र बुद्धि और जवानों की अतुलनीय मेहनत को जाता है. मैं इन सबको स्वतंत्रता के इस अत्यंत शुभ अवसर पर बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं.

मैं आप सबका भी बहुत आभारी हूं कि आपने परीक्षा की इस घड़ी में मुझे पूर्ण समर्थन देकर हौसला बढ़ाया. कुछ तत्वों को छोड़कर हर भारतीय, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में खड़ा हो, उसने इस कदम का स्वागत किया. मानो हम में से हर एक का माथा उस दिन उन्नत हुआ, सीना चौड़ा हुआ और हम एक स्वर से और ऊंचे स्वर से कहने लगे- "गर्व से कहो, हम भारतीय हैं," क्योंकि उस दिन पोखरण में केवल अणु ऊर्जा का नहीं, राष्ट्र की ऊर्जा का भी प्रकटीकरण हुआ था. 

इसी क्षण मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत सदैव शांति का पुजारी था, है और रहेगा. हम शस्त्र का उपयोग आत्मरक्षा के लिए करना जानते हैं और चाहते हैं. हम अणु शस्त्र का प्रयोग आक्रमण के लिए नहीं करेंगे और इसलिए हमने नये अणु परीक्षण पर अपनी ओर से पाबंदी लगा दी है. हमने स्वयं आगे होकर दुनिया से अणु शस्त्र का पहला प्रयोग न करने का वायदा किया है. हम यह सब न किसी के दबाव में कर रहे हैं, न किसी के डर से. हम केवल स्वेच्छा से इसलिए कर रहे हैं कि विश्व शांति और निरस्त्रीकरण में हमारी गहरी आस्था है. अणु अस्त्र रहित दुनिया, यह हमारा सपना है, जिसे हम साकार करना चाहते हैं. 

प्रारंभ में दुनिया के कुछ राष्ट्रों ने राष्ट्रीय सुरक्षा की हमारी आवश्यकता की नीति और नीयत पर संदेह किया. कुछ ने हम पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. अब परिस्थिति बदल रही है. दुनिया अब भारत की भूमिका को धीरे-धीरे समझ रही है. हम उन्हें अपना दृष्टिकोण समझाने में सफल हो रहे हैं. इसके चलते कुछ आर्थिक प्रतिबंध ढीले भी पड़ने लगे हैं. दुनिया की इस बदलती दृष्टि का हम स्वागत करते हैं.

इसके साथ एक बात और हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं. भारत एक महान देश है. हमारी जनता पराक्रमी है. अपने गौरव के लिए बहादुर जनता हर संकट का मुकाबला कर सकती है. इसका हमने इतिहास को बार-बार परिचय दिया है.

मैं अहंकार से नहीं, विनम्रता से, आह्वान के रूप में नहीं, चुनौती के रूप में नहीं, आत्मविश्वास से कहना चाहता हूं कि दुनिया की कोई भी ताकत हमें अपने निर्धारित मार्ग से दूर नहीं कर सकती. राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं.

हम अपने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारना चाहते हैं. हम जानते हैं कि युद्ध जीतने का सबसे आसान तरीका युद्ध को न होने देना है. पाकिस्तान से हम किसी भी विषय पर किसी भी स्तर पर और कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं.

आज सब जानते हैं कि कोलम्बो में सार्क सम्मेलन के अवसर पर मैंने इस बात की पहल की थी. मुझे थोड़ा सा दुख हुआ कि हमें अपेक्षित उत्तर नहीं मिला. फिर भी मैंने आशा नहीं छोड़ी है. इस मास के अंत में दक्षिण अफ्रीका में होने वाले गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के अवसर पर मैं फिर संवाद का प्रयास करूंगा.

मेरी मान्यता है कि दुनिया में कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जिसका बातचीत से हल नहीं हो सकता. इसलिए पाकिस्तान हो या ईरान, हम सबसे मैत्री भाव से बातचीत करके आपसी समस्याओं का हल ढूंढने के लिए प्रयास करते रहेंगे.

गत कुछ दिनों में जम्मू व कश्मीर में उग्रवादियों की कार्रवाइयां बढ़ गईं. उनके द्वारा हिमाचल में हुआ हत्याकांड एक बड़े षडयंत्र का भाग मालूम होता है. सीमा पार से प्रतिदिन होने वाली यह आतंकवादी कार्रवाइयां अघोषित युद्ध के समान हैं. सरकार ने इन घटनाओं को बहुत ही गंभीरता से लिया है. हम पूरी ताकत के साथ इसका मुकाबला कर रहे हैं और आतंकवाद को परास्त करके ही रहेंगे. 

व्यक्तिगत जीवन हो या राष्ट्र जीवन, इक्यानवीं वर्षगांठ बीते हुए अर्ध शताब्दी के जीवन का लेखा-जोखा लेने का स्वर्णिम अवसर होता है. हम सबके लिए आज का क्षण भी सिंहावलोकन का क्षण है. आज हम एक क्षण के लिए सिंह की तरह पीछे मुड़ कर देखें और फिर  21वीं शताब्दी में छलांग लगाने के लिए अपने आपको तैयार करें. 

लेखा-जोखा लेते समय एक गलती अकसर हो जाती है. हम अपनी उपलब्धि को कम आंकते हैं और कमजोरी को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं. जिसके परिणामस्वरूप देश में निराशा के स्वर को ज्यादा बढ़ते हुए देखता हूं. बात थोड़ी बहुत बिगड़ी भी होगी, लेकिन इतनी बिगड़ी नहीं कि सुधारी न जा सके. हमारे शास्त्रों में कहा है- "आत्मप्रशंसा मूर्खों का लेखा-जोखा है."

जब हम आजाद हुए थे, तब कुछ पश्चिम के पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि हम जनतंत्र और स्वतंत्रता के लायक नहीं हैं. जल्दी ही हम बिखर कर नष्ट हो जाएंगे. लेकिन आज गर्व से कह सकते हैं कि न हमने केवल हमारी अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा की है, अपितु विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र सफलतापूर्वक चला कर दिखाया है. जो राष्ट्र हमारे साथ आजाद हुए वे लभगभ सभी कभी न कभी तानाशाही या सेनाशाही का शिकार हुए, लेकिन हमने लोकशाही का दीप हमेशा जलाए रखा.

आज की लोकसभा बारहवीं लोकसभा है. मैं हिन्दुस्तान का ग्यारवां प्रधानमंत्री हूं. छोटे से देहात की चौपाल से लेकर संसद तक से सत्ता परिवर्तन होते हुए दृश्य को हमने देखा है. इस सबका श्रेय आप सबको है. हर चुनाव में आपने ऐसा चमत्कार करके दिखाया कि सभी पंडित-ज्ञानी हतप्रभ रह गए हैं. आपको बहुत-बहुत बधाई. जब तक आप जागरूक हैं, हमारे जनतंत्र पर कोई आंच नहीं आ सकेगी. आज के स्वर्ण जयंती समापन समारोह के अवसर पर एक महत्वपूर्ण तथ्य पर पूरे राष्ट्र को सोचना है. स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और पंथ निरपेक्षता, ये चारों एक दूसरे के पूरक हैं. हमें हर हालत में स्वतंत्र रहना है. स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त है- राष्ट्रीय एकता. राष्ट्रीय एकता के लिए लोकतंत्र जरूरी है. पंथ निरपेक्षता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का अटूट हिस्सा है. मैं और मेरी सरकार इन चारों तत्वों के प्रति प्रतिबद्ध है. 

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम एक राष्ट्र के नागरिक हैं. लद्दाख से लेकर निकोबार तक फैला हुआ है, यह देश. गारो पर्वत से लेकर गिलगित तक इसका विस्तार है, यह एक प्राचीन देश है. इसकी सभ्यता और संस्कृति 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है. इतना विशाल देश, इतनी विविधताओं से भरा हुआ देश भाषाओं, उपासना पद्धतियों, रहन-सहन, खान-पान की भिन्नताओं के बावजूद लोकतंत्र के सूत्र में बंधकर सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए कमर कसकर जुटा हुआ है. साथ-साथ हम इसे भी भूल नहीं सकते कि हमें जनतंत्र को विकृतियों से बचाना है. 

हम संसद और विधानमंडलों के सदनों में ऐसा व्यवहार करते हैं कि जिसे स्कूल की कक्षा में कोई भी शिक्षक कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगा. लोकशाही चर्चा से चलने वाली है. विपक्ष को कहने का, और सत्ता पक्ष को करने का अधिकार होना चाहिए. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधक नहीं. 

निर्भय और निष्पक्ष मतदान को और निखारना होगा. पद्धति में परिवर्तन कर उसे जातिवाद, हिंसा, धन, शक्ति आदि दुर्गुणों से मुक्त करना होगा, जिससे अगली शताब्दी में हमारा शासनतंत्र और भी निखर कर आए.

एक समय था, यह देश सोने की चिड़िया कहा जाता था. बाद में स्थिति बिगड़ी और हम गरीब राष्ट्रों में गिने जाने लगे. गत कुछ वर्षों में हमारे किसानों और खेतिहर मजदूरों ने कड़ी मेहनत करके देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया है. भूखे पेट कोई सेना नहीं लड़ सकती. भूखा देश चैन की नींद नहीं सो सकता. हमारे किसान-मजदूर भाइयों ने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाकर अपनी ’अन्नदाता’ की उपाधि सार्थक की है. मैं तो भगवान से केवल इतनी ही प्रार्थना कर सकता हूं ’अन्नदाता सुखी भव:’.

इस आनंद में दुख की छाया छिपी है. आज हमारे इस अन्नदाता की स्थिति विकट हुई है. मुझे इस बात की अत्यधिक पीड़ा है कि इस वर्ष कुछ प्रांतों में किसानों को कर्ज का बोझ असह्य होने के कारण आत्महत्या करनी पड़ी. मैं इनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता हूं. इन किसानों को श्रद्धांजलि के रूप में मैंने एक निर्णय लिया है. फसल बीमा योजना का विस्तार किया जाएगा, नई फसलें इसमें जोड़ी जाएंगी और भौगोलिक क्षेत्रों में भी इसे बढ़ाया जाएगा.

किसानों की सही आर्थिक स्थिति की जांच-पड़ताल करने के लिए और उसमें सुधार के सुझाव देने के लिए एक उच्चाधिकार संपन्न आयोग गठित किया जाएगा. मैं किसान भाइयों को आश्वस्त करना चाहता हूं, आप हमारे देश की रीढ़ की हड्डी हैं. आपको इस शासन में कभी झुकने की नौबत नहीं आएगी. उड़ीसा में बोलनगीर-कालाहांडी-कोरापुर एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आज भी लोग भूख से पीड़ित हैं. स्वतंत्रता के पचास वर्षों के बाद भी देश में लोग भूखे रहें, यह हम कल्पना भी नहीं कर सकते. मैंने योजना आयोग से कहा है कि इस क्षेत्र में रोजगार आश्वासन योजना की रकम दुगुनी कर दें. मेरा प्रयास रहेगा कि देश में अन्न के अभाव में किसी को भी अपनी जान न खोनी पड़े.

व्यापार, उद्योग और सेवाओं में भी देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है. हमारे कुछ उद्योग तो विश्व की स्पर्धा में अपने झंडे गाड़ रहे हैं. इस सफलता के लिए मैं सभी मजदूरों, कर्मचारियों, प्रबंधकों, उद्योगपतियों व व्यापारियों को बहुत बधाई देता हूं. लेकिन हम जानते हैं कि यह सफलता एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं. हमारा अंतिम लक्ष्य है- भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में दुनिया में उभारना. 

मैं जानता हूं कि यह कहना जितना आसान है, करना कठिन है. इसके लिए हमें कठोर परिश्रम, प्रामाणिकता और स्वावलंबन का मार्ग अपनाना होगा. विश्व के दर्जे का माल तैयार करना पड़ेगा, जो घरेलू और विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके. अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है.

लेकिन हम उदारीकरण का अनुचित लाभ नहीं उठाने देंगे. आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में हमने परियोजनाओं को तीव्रता से लागू करने का निर्णय किया है.

’स्वदेशी’ का अर्थ यह नहीं, हम कूपमंडूक हो जाएं. नई  दुनिया छोटा सा गांव बन गई है. हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं. हम इसे खुली अर्थव्यवस्था में भी अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर विश्व स्पर्धा में डटकर खड़े रह सकते हैं, और ऐसा हमारा विश्वास है, हम डटकर खड़े रहेंगे. 

आज के स्वतंत्रता दिवस की इक्यानवी वर्षगांठ केवल हमारे देश में नहीं, दुनिया भर में मनाई जा रही है. हर देश में बसा भारतीय मूल का नागरिक यह पावन पर्व हर्ष और उल्लास के साथ मना रहा है. मैं विदेशों में बसे सभी भारतीयों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देता हूं. इनमें से कुछ देशों में भाई-बहन हमारे इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण टीवी पर देख रहे होंगे.

अनिवासी भारतीयों ने, जहां वे बसे हैं, उन देशों की अर्थव्यवस्था में मजबूती लाई है. अब उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने का अवसर मिला है. हमने अब रिसर्जेट इंडिया बॊन्ड्स निकाले हैं. दुनिया भर में बसे अनिवासी भारतीय इस अवसर का लाभ उठा रहे हैं. अभी तक इस योजना में पांच हजार करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आए हैं. मुझे विश्वास है कि अनिवासी भारतीय और भी इसका लाभ उठाएंगे. देश का आर्थिक विकास अपने साथ-साथ समस्याएं भी लेकर आता है. हमें उन्हें हल करना है.

मैं जानता हूं कि आप सब और खास कर बहनें कुछ चीजों की बढ़ती कीमतों से खासी परेशान हैं.  मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं. इसमें सरकार से ज्यादा प्रकृति का दोष है. लेकिन मैं समझता हूं कि यह कहने से आपका बोझ तो हल्का नहीं  होता है. वित्त मंत्रालय और राज्य सरकारें मिलकर इस महंगाई से जूझने का अभियान शुरू करेंगी. व्यापारी वर्ग से भी अब मैं इसमें सहयोग चाहता हूं. वे अनावश्यक जमाखोरी और मुनाफाखोरी को बढ़ावा न दें. हम ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में हिचकिचाहट नहीं करेंगे. मैं जानता हूं कि आने वाले दिन त्योहारों के दिन हैं. मेरी यह कोशिश होगी कि बढ़ती महंगाई आपके त्योहारों का रंग फीका न कर दे.

देश में एक और महत्वपूर्ण समस्या है- भ्रष्टाचार की. भ्रष्टाचार का रोग देश को कैंसर रोग के समान खाये जा रहा है.  हमने इससे लड़ने का निर्णय लिया है. इसका आरंभ ऊपर से किया है. लोकसभा में पेश किए लोकपाल विधेयक में मैंने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा है. इससे हमने उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार से लड़ने की हमारी नीति और नीयत स्पष्ट की है. इसके साथ हम अफसरशाही के भ्रष्टाचार से भी लड़ना चाहते हैं. मैं जल्दी ही प्रधानमंत्री कार्यालय के उस कक्ष के क्रियान्वयन में तेजी लाऊंगा, जो भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की देखरेख करता है. 

"बेरोजगारी हटाओ", हम हमारे राष्ट्रीय एजेंडा का महत्वपूर्ण संकल्प है.  बेरोजगारी बड़ी समस्या है. यह सबके जीवन के साथ जुड़ी है. सबकी न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भी यही तरीका है.

पूर्ण रोजगार के लिए योजना बनाना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं. लेकिन इसके लिए नियोजन की पूरी प्रक्रिया में परिवर्तन करना होगा. बुनियादी जरूरत की चीजों और सेवाओं का उत्पादन जन साधारण द्वारा होना चाहिए. इसके लिए विज्ञान और टेक्नोलॊजी की सहायता लेनी पड़ेगी.

सरकार का फैसला है कि 10 सालों में 10 करोड़ लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसका अर्थ यह हुआ कि एक वर्ष में एक करोड़ लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसके लिए टॊस्क फोर्स गठित की जाएगी.

किसी भी आधुनिक समाज की प्रगति का मापदंड उस समाज में महिलाओं की स्थिति से होता है. हमने महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 फीसद आरक्षण देने का वायदा किया था. हमें खेद है कि इसे अभी तक पूरा नहीं कर सके हैं. 

लड़कियों को स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा देने का निर्णय तो हम ले ही चुके हैं. अब हम एक और बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं, प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाली सभी छात्राओं को उनकी पाठ्य क्रमिक पुस्तकें मुफ्त दी जाएंगी. इस पर 550 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.

महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला कल्याण बीमा योजना ’राजराजेश्वरी’ और लड़कियों के लिए एक विशेष योजना ‘भाग्यश्री’ इसी वर्ष दिवाली के आनंद पर्व से शुरू की जाएगी. इस योजना के लिए केवल एक महीने के लिए एक रुपया देना होगा. आवश्यकता होने पर वह एक रुपया देने वाले को 25 हजार रुपये के रूप में मिल सकेगा. इसका पूरा विवरण शीघ्र ही आपके सामने रखा जाएगा. 

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों को बराबरी और भागीदारी दिलाने के लिए हमने नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान तो किया है, लेकिन उसका क्रियान्वयन बहुत धीमे से होता है. मेरी सरकार का यह प्रयास रहेगा कि इस क्रियान्वयन में तेजी लाई जाए और इन वर्गों को नौकरियों देने के कार्य को जल्दी से जल्दी पूरा किया जाए. शासनतंत्र को इन वर्गों के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाया जाए.

युवा शक्ति ही राष्ट्र की शक्ति है, देश का भविष्य है. बहुत वर्ष पहले मैंने बाबा आम्टे का एक वाक्य पढ़ा था- "हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने, मरने में". हमारी भी यही इच्छा है. भारत के युवक-युवतियों को न किसी के सामने हाथ फैलाना चाहिए, न किसी पर अपने हाथों का जोर आजमाना चाहिए. सिर्फ अपने आपको राष्ट्र के पुनर्निर्माण के काम में झोंक देना चाहिए.

इसी हेतु हमने "राष्ट्रीय पुनर्निर्माण वाहिनी" के गठन की योजना बनाई है. 18 से 35 वर्ष आयु के युवक-युवतियां इसमें सम्मिलित हो सकेंगे. ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में आधारभूत सेवाएं, पर्यावरण की रक्षा करना, जनसंख्या के सवाल पर जन अभियान, नशीली दवाओं के प्रभाव के विरोध में लड़ना, शिक्षा का प्रसार, दलित वनवासी महिला उत्थान, खेल, कला, संस्कृति आदि क्षेत्रों में ये युवक-युवतियां काम कर सकेंगी. इसके लिए इन्हें मानधन भी मिलेगा. प्रारंभ में कुछ जिलों में और अंतत: सारे देश में यह योजना लागू की जाएगी. 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था. उसे उसी रूप में मनाना है. इस दिन से इस योजना का शुभारंभ होगा. युवक-युवतियों का मैं आह्वान करता हूं- आइए-, अपने यौवन का एक वर्ष देश को दान कर दीजिए और राष्ट्र को पुनर्यौवन प्रदान कर दीजिए.

21वीं सदी हमें दस्तक दे रही है. यह सदी सूचना की तकनीक की सदी होगी. भारत की सबसे बड़ी शक्ति है-भारत की बुद्धिमत्ता. विज्ञान और टेक्नोलॊजी में प्रशिक्षित व्यक्ति दृष्टि से विश्व में हमारा तीसरा स्थान है. हमें इस शक्ति का दोहन करना होगा. मेरी सरकार ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं. हमारी आकांक्षा है सूचना-तकनीक में महाशक्ति बनना. इस दृष्टि से मैं आज एक नये कदम की घोषणा कर रहा हूं. 

अंतरिक्ष एक नया क्षेत्र है, जो अगली सदी में मानव जाति को नई-नई संभावनाओं को तलाशने का मौका दे रहा है. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के काफी लाभ हैं, जिसे भारत को अपनी युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उपयोग में लाना होगा. मेरी सरकार "जय विज्ञान" के नारे के आधार पर युवाओं के सपने साकार करना चाहती है. इस दिशा में हम "स्वर्ण जयंती विद्या विकास अंतरिक्ष उपग्रह योजना" नामक एक नये उपग्रह पर आधारित  कार्यक्रम शुरू करेंगे. इस कार्यक्रम का पहला उपग्रह इन्सैट 3-बी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)  द्वारा  15 अगस्त, 1999 से पूर्व 12 महीने के एक रिकार्ड समय में बनाकर अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा. 

इस उपग्रह में 6 ट्रांसपोंडर्स ऒपरेशन नॊलेज को कार्यान्वित करने के लिए अलग से उपलब्ध होंगे, जिसका लक्ष्य देश में सभी विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर, इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर आधारित शिक्षा प्रदान करना होगा. विशेष रूप से सभी विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॊलेजों, चिकित्सा कॊलेजों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं तथा उच्च शिक्षा केंद्रों को अगले स्वतंत्रता दिवस से पहले सूचना तकनीक नेटवर्क से जोड़ दिया जाएगा. इस कार्यक्रम से राज्य सरकारों की विकास संबंधी संचार आवश्यकताएं भी पूरी होंगी.

आज महर्षि अरविंद की 125वीं जयंती समारोह का समापन होने जा रहा है. उन्होंने भारत के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जन्म की कल्पना की थी. आज हम उनकी कल्पनाओं को साकार बनाने का संकल्प करें. 

एक बार भारत रत्न डॊ. बाबा साहेब अम्बेडकर जी ने कहा था- " आर्थिक और सामाजिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी अधूरी है."  आज राजनीतिक स्वतंत्रता दिवस पर हम इस ध्येय वाक्य को भूले नहीं है. बीती हुई अर्द्ध शताब्दी में हमने अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता तो अक्षुण्ण रखी,  लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई अभी तक नहीं जीत सके हैं. हम देश को गरीबी से मुक्त नहीं करा सके हैं.  बेरोजगारी अभी भी अभिशाप बनी हुई है. निरक्षरता का कलंक आज भी हम मिटा नहीं सके हैं. जातिवाद और संप्रदायवाद का भूत अभी भी बीच-बीच में सर उठाता है.

आइए, हम सब मिलकर स्वतंत्रता की दूसरी अर्द्ध शताब्दी के प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर प्रतिज्ञा करें कि 50 वर्षों पूर्व हमने राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई जीती थी. अब हमारा उद्देश्य होगा- आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई जीतना.

प्रधानमंत्री के अभी तक के छोटे से कार्यकाल में मैंने सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया है. आम सहमति की राजनीति से हमारी राजनीति है. कावेरी का ही उदाहरण लें. वर्षों से कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी के बीच में कावेरी के जल को लेकर विवाद चला आ रहा था. कभी-कभी तो विवाद ने अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया. जहां कहीं आग लगती है, वहां पानी से उसे बुझाने की कोशिश की जाती है. लेकिन जब पानी में ही आग लग जाए, तो उसका इलाज क्या है ? इलाज है- समझदारी, भाईचारा, सहनशीलता, देशभक्ति और अपने हितों के साथ दूसरों के हितों के बारे में सोचना. हाल ही में हुआ कावेरी का समझौता इसी का परिचायक है. 

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हमारी अनेक नदियों का पानी समुद्र में चला जाता है, और हम किसको कितना पानी मिले, इस विवाद में उलझे हुए हैं. वर्षों से ये विवाद पड़े हुए हैं. इस स्थिति को बदलना होगा. हमारी नदियां, जो हिन्दुस्तान के राज्यों को जोड़ती हैं, उन्हें हिन्दुस्तानी के दिलों को भी जोड़ना चाहिए. एक राष्ट्रीय जल नीति बनाने की आवश्यकता है. हमने ऐसी नीति बनाने का वायदा किया है. लेकिन यह सबके सहयोग और धीरज से ही संभव हो सकता है.

मेरी सरकार लगभग पिछले पांच महीनों के शासन के राष्ट्रीय एजेंडे में किए गए वायदों को पूरा करने के लिए बड़ी गंभीरता से प्रयास करती रही है. हमारी सरकार मिली-जुली सरकार है. मिली-जुली सरकार का अपना धर्म होता है, जिसका निष्ठापूर्वक पालन होना चाहिए. हमने अपने गठबंधन के लिए एक साझा कार्यक्रम यानी एक नेशनल एजेंडा तैयार किया. हमने सभी विवादास्पद मुद्दों को इस एजेंडे से बाहर रखा है. आज तक हमने जो भी किया है, वह राष्ट्रहित में किया है. हमने हमेशा राष्ट्रहित को दलहित से और व्यक्तिगत हित से ऊपर माना है.

राष्ट्र आज एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. आज हमारी पूरी राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के दौर से जा रही है. ऐसी स्थिति में हर एक दल को और हर एक राजनेता को जिम्मेदारी के साथ चलना होगा. राष्ट्रहित को चोट पहुंचाने वाले किसी भी कार्य के लिए इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा. 

आज की जनता को चाहिए कि वह मौजूदा राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था के बारे में गंभीरता से सोचे. हम सबके सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं. क्या बार-बार चुनाव होना देश के लिए अच्छी बात है ? क्या इन चुनावों पर होने वाले भारी खर्च का बोझ बार-बार उठाना देशहित में है ? 

मुझे प्रधानमंत्री का पद संभाले केवल पांच महीने हुए हैं. संसद में हमारा बहुमत बहुत कम है. मैं जानता हूं कि साझा सरकारों की मर्यादाएं होती हैं. मैं जानता हूं कि आज की व्यवस्था में निर्दोष संन्यासी को सत्तापिपासु फांसी चढ़ा देते हैं. लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैंने जीवन में कभी सत्ता के लालच में सिद्धांतों के साथ सौदा नहीं किया है, और न मैं भविष्य में करूंगा. सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेरे लिए एक जैसा है. मैं 40 साल तक विपक्ष में रहा और अपने कर्तव्य का पालन करता रहा. मेरे विरोधी भी उसकी प्रशंसा करते हैं. लेकिन वैसा विरोध आज मुझे दिखाई नहीं देता, जब मैं कुर्सी पर बैठा हूं. यह परिवर्तन क्या हो गया है ?

आज मुझे डॊ. शिवमंगल सिंग ’सुमन’ की एक कविता याद आती है-
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
कर्तव्य पथ पर जो मिले
यह भी सही, वह भी सही
वरदान मांगूगा नहीं, वरदान मांगूगा नहीं

मित्रों, मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं कि कितनी भी आपत्तियां आएं, हम वरदान के लिए झोली नहीं फैलाएंगे. आखिरी क्षण तक वरदान की तलाश नहीं करेंगे. न मैं संघर्ष का रास्ता छोड़ूंगा. बस मुझे आपका साथ चाहिए. भारत की  100 करोड़ जनता का आशीर्वाद चाहिए.

जीवन में ऐसा क्षण आता है, जब व्यक्ति चौराहे पर खड़ा होकर सोचता है-
राह कौन सी जाऊं मैं ?
चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूं आखिरी चाल कि
बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं ?

फिर लगता है, नहीं बाजी छोड़ कर मैं विरक्ति में नहीं जा सकता. मुझे जूझना होगा और फिर मैं लाल किले की प्राचीर से आपकी उपस्थिति में अपने संकल्प को दोहराता हूं-
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

बहुत-बहुत धन्यवाद
जय हिन्द
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Tuesday, July 14, 2026

राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है वंदे मातरम

   


महाराष्ट्र के मुंबई के विलेपार्ले में 1996 में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं जयंती के समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वंदे मातरम के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- सचमुच मैं महोत्सव समिति को बधाई देकर उनका अभिनंदन करना चाहता हूं. समिति ने वंदे मातरम को, लेखक श्री बंकिमचंद्र को- जिन्हें ऋषि के रूप में याद किया जाता है- वस्तुत: वह हमारी विश्व परंपरा में थे, उनकी स्मृति को  एक बार फिर से जन-जन तक पहुंचाने के लिए यह अनुष्ठान बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न किया. वंदे मातरम एक शताब्दि से अधिक समय से इस देश को अनुप्राणित करता रहा है. लेकिन इतने दिनों बाद, उसे फिर से प्रस्तुत करने का जो प्रयत्न हुआ है, वह अपने में एक महनीय प्रयत्न है और मैं महोत्सव समिति को एक बार फिर बधाई देना चाहता हूं. मैं नहीं जानता, देश के किसी भाग में इस तरह का शताब्दि समारोह मनाया गया, कम से कम मुझे उसका निमंत्रण नहीं आया. इसलिए पहले जब इस कार्यक्रम का निमंत्रण मिला, तो सहज स्वाभाविक रूप से मेरी इच्छा हुई कि ऐसे कार्यक्रम में मुझे जाना चाहिए. लेकिन उस समय मेरे विदेश जाने की बात थी, न्यूयॊर्क में जनरल असेंबली का अधिवेशन चल रहा था, उसकी एक समिति के साथ मैं जुड़ा हुआ हूं. मैंने डॊ. लेले साहब को लिखा था कि अगर मैं विदेश नहीं गया तो आऊंगा. मगर संयोग देखिए कि मैं विदेश भी गया और यहां भी आ गया. यह समिति के सदस्यों के आत्मीयता के कारण हुआ है.

अभी जो मैंने विस्तृत विवरण सुना-किस किस तरह से विद्यालयों में, किस तरह से छात्रों के बीच, किस तरह से विविध प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करके राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम का शताब्दि का समारोह मनाया गया है, यह सचमुच में एक प्रेरणादायी प्रसंग है. मैं उन कार्यक्रमों के विस्तार में नहीं जाता, मैं तो उनके बारे में पढ़ रहा हूं, सुन रहा हूं- आपने तो उनको देखा होगा. मैं देखने से वंचित हो गया. मैंने डॊक्टर साहब को पूछा कि मेरे भाषण के अतिरिक्त और भी कोई कार्यक्रम है या नहीं ? कार्यक्रम होना चाहिए था. या शायद मुझे समय पर आना चाहिए, मैं देर से आया हूं- या कार्यक्रम पहले हो गया हो.  

वंदेमातरम के साथ हमारी राष्ट्रीय स्मृतियां जुड़ी हुई हैं. उसके साथ पराधीनता की पीड़ा जुड़ी हुई है, पराधीनता के पाश को काट कर फेंकने का वज्र संकल्प जुड़ा हुआ है. एक राष्ट्र के संघर्ष की कहानी जुड़ी हुई है. बलिदानों के प्रसंग जुड़े हुए हैं. काले पानी की काल कोठरियों में बेड़ियों की झंकार के बीच सुनाई देने वाली उसकी गूंज जुड़ी हुई है. हमें ऐसा राष्ट्र गीत उपलब्ध हुआ है, जो सचमुच में हमारे हृदय के तारों को झंकृत कर देता है. जो गीत फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए गाया जाता है, जो गीत बलिदान के रक्त से लिखा गया था, जो गीत संपूर्ण संघर्ष की कहानी कहता है. और इस धरती के प्रति- भारत मां के प्रति, जो श्रद्धा निवेदन में अपूर्व है, उस गीत की शताब्दि मनाकर आपने सचमुच में उस गीत का सम्मान नहीं किया- हमने अपनों को सम्मानित किया है. हमने अपनों को एक आदर्श दिया है.
 
मैंने कहा आपसे कि बंकिमचंद्र की गणना ऋषियों में होगी. कल्पना करिए उस सौ-सवा सौ वर्ष पहले के काल का- किस तरह से विदेशियों ने देश को पददलित किया था, किस तरह से देश को बांटने की साजिश की थी, किस तरह से अत्याचार और आतंक के साम्राज्य को स्थापित किया था. लेकिन उसी के साथ त्याग और बलिदान की एक परंपरा, एक के बाद एक फांसी के तख्ते पर चढ़ने के लायक भारतमाता के सुपुत्र, दमन और आतंक के खिलाफ छाती तानकर खड़े रहने की तैयारी में इस गीत ने देश में नये प्राण फूंके थे. वंदेमातरम एक मंत्र बन गया था. विदेशी उसे सुनकर चिढ़ते थे, वंदेमातरम का गीत गाकर, वंदेमातरम का नारा लगाकर, देश भक्तों के हृदय पुलकित हो जाते थे. जो फांसी के तख्तों पर नहीं चढ़ सकते थे. वे भी वंदेमातरम का गीत गाकर आनंदित अनुभव करते थे, अपने को गौरवांवित अनुभव करते थे. शायद ही संसार के किसी देश में त्याग और बलिदान से पवित्र ऐसा गीत, राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया हो.

यह दुर्भाग्य की बात है कि यह गीत भी विवाद का विषय बन गया था. अभी भी थोड़ा विवाद हो रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण विवाद सामने आया, मुंबई के लोकसभा सदस्य श्री रामभाऊ नाईक के प्रयत्नों से. उनका अभिनंदन होना चाहिए. वह चुनकर गए, तो उन्होंने अपना प्रयत्न प्रारंभ किया कि संसद के सत्र का जब प्रारंभ होता है और जब सत्र समाप्त होता है, तो वह राष्ट्रगीत के साथ होना चाहिए. महाराष्ट्र के विधान मंडल में पहले से ऐसा हो रहा है.  लोकसभा के अध्यक्ष श्री शिवराज पाटील को यह विचार पसंद आया. मैं उनको भी श्रेय देना चाहता हूं. लेकिन सदस्यों में मतभेद है. क्या आवश्यकता है ? यहां से प्रश्न शुरू हुआ. अभी तक राष्ट्रगीत नहीं गाया जाता था. अब उसकी क्या जरूरत है ? जब देखा कि यह विरोध का तर्क चलता नहीं है, अच्छा काम है जब शुरू हो, तबसे उसका उदात्त स्वीकार करना चाहिए, फिर कहा गया कि एक हमारी राष्ट्रीय धुन है, वंदेमातरम राष्ट्रीय गीत है- जनगणमन क्यों नहीं ? वंदेमातरम क्यों ? संविधान सभा की कार्यवाही देखी गई. संविधान सभा के अध्यक्ष डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने जो विरोध किया था, उसका उल्लेख किया गया. दोनों में से कौन पहला है, कौन बाद में है, इस तरह का सवाल नहीं है. यह राष्ट्रीय धुन है, यह राष्ट्र गीत है. वह भी विवाद हुआ था कि आरंभ किससे करें- अंत किससे करें- और एक दल के सदस्यों ने तो कहा कि यह गीत गाया जाए, इससे हम सहमत नहीं हैं. यह वही दल है, जिसने पहले विरोध किया था, पराधीनता के काल में- मनोवृत्ति बदली नहीं है. कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में वंदेमातरम गाया, तो उसका विरोध हुआ, मुस्लिम लीग के सदस्य नहीं, कांग्रेस का काम करने वाले मुस्लिम सदस्य विरोध करके चले गए. फिर गीत गाना रोक दिया गया- गीत गाना कम कर दिया गया. तुष्टिकरण की यह कहानी बहुत पुरानी है. इस तरह की बात को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. अगर कोई कहता है कि भारत को मां के रूप में वंदना करना मूर्तिपूजा है और हम मूर्तियों में विश्वास नहीं रखते, तो वह अपने विश्वास को अपने पास रख सकता है. उसके विश्वास को कोई ठेस नहीं पहुंचती. आखिर यह भारत मां है. हम मां के रूप में इसकी वंदना करते हैं. हम उसकी संतान हैं. हमने उसकी गोद में जन्म लिया है. हम इसके आंचल की छाया में बढ़ रहे हैं. और यह संस्कार कोई आज का संस्कार नहीं है. यह परकीय राज्य के विरोध में पैदा हुई भावना नहीं है.  

वाल्मीकि ने जब रामायण लिखी और उसमें लंका विजय वर्णन के बाद उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया. प्रभु रामचंद्र ने, वन में निवास करने वाले लोगों को इकट्ठा करके रावण पर विजय पाई. सोने की लंका पर अधिकार कर लिया. लेकिन उन्होंने लंका को अपने राज्य में नहीं मिलाया. लंका का शासन विभीषण को दे दिया. हमारे बहुत से राजनेताओं को यह पता नहीं है कि विभीषण कौन था ? मैं नाम नहीं ले रहा हूं, मैं इशारा कर रहा हूं, आप समझ जाएंगे- श्री वी.पी. सिंह का जब कांग्रेस से झगड़ा हो गया और वह कांग्रेस से निकल आए- तो उस समय कांग्रेस के जो सर्वेसर्वा थे- वह एक दिन अपने मित्रों के साथ बैठे हुए थे- और मित्रों में से किसी ने कहा कि वी. पी. सिंह तो विभीषण बन गए. तो उस नेता ने पूछा कि यह विभीषण कौन है ? उन्हें पता नहीं था. मैं उन्हें दोष नहीं देता. लेकिन भगवान राम ने विभीषण को राज्य सौंप दिया. और वापस अयोध्या चलने की तैयारी करने लगे, तो वानरों ने कहा, प्रभु सोने की लंका छोड़कर कहां जा रहे हो. चौदह साल भटकते हो गए. आपके साथ जंगलों की ख़ाक छानी, और बलशाली रावण से लड़े, अब तो अपना राज है, अब अयोध्या एक तो बहुत दूर है फिर वहां क्या परिस्थिति होगी, पता नहीं, स्वागत होगा कि नहीं होगा ? चौदह वर्ष का काल बड़ा लंबा काल होता है. और लंका सुनिश्चित है, अयोध्या की स्थिति अनिश्चित है. क्यों जाएं वहां ? यहीं बस जाते, उचित है, पर ऐसा था नहीं. अब प्रभु रामचंद्र ने लक्ष्मण से कहा- अपी स्वर्णमयी लंका, नमे लक्ष्मण रोचते जननी जन्मभूमी़श्च स्वर्गादपि गरियसी. सोने की लंका मेरे मन को नहीं भायी. यह मुझे पसंद नहीं है. जननी जन्मभूमि- स्वर्ग से भी मुझे प्रिय है. पृथ्वी को माता के रूप में देखना अर्थवेद का वचन है. पृथ्वी हमारी माता है. हम उसके पुत्र हैं. और अगर वंदेमातरम के रूप में हम उसी मां का वंदन करते हैं- वंदेमातरम- उसमें मूर्ति पूजा कहां से आती है ? इस्लाम भी अपने ढंग से आदर व्यक्त करता है. जो हज के लिए जाते हैं, वहां जो पवित्र पत्थर है, उसे चूमते हैं, माथा टेकते हैं. नमाज़ पढ़ने के लिए भी धरती चाहिए. नमाज़ धरती पर ही पढ़ी जा सकती है. आसमान में नहीं, धरती पर माथा रखकर- मुझे ऐसे बहुत मुस्लिम लोग मिले हैं, जो इतनी बार नमाज़ पढ़ते हैं कि माथे पर निशान बन गया. हम उनकी भावना को समझते हैं. उन्हें हमारी भावना समझनी चाहिए. यह मूर्ति पूजा नहीं है. आखिर मजारों पर चादर चढ़ाई जाती है, क्या वह एक ढंग की पूजा नहीं होती. आदर का प्रकटीकरण नहीं है ? मुस्लिम देशों में और तरह की रीतियां प्रचलित हैं. हम उसकी आलोचना नहीं करते, हम सर्व-धर्म-समभाव में विश्वास करते हैं. कोई अगर अपने मार्ग से ईश्वर तक पहुंचना चाहता है, तो उसका स्वागत है. यह बात अलग है कि मार्ग के बारे में प्रामाणिकता चाहिए, उत्सर्ग चाहिए. लोगों का हृदय जीतने का प्रयास चाहिए. बल प्रयोग से नहीं, जोर जबरदस्ती से नहीं. लेकिन वंदेमातरम में मूर्ति पूजा है, इसलिए हम उसका गायन नहीं कर सकते, यह हास्यास्पद है. इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता. उस समय स्वीकार किया गया, वह गलती की गई थी. अब हम उस गलती का परिमार्जन कर रहे हैं. लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा, मुस्लिम लीग ने अंतत: लोकसभा में अपने विरोध को वापस ले लिया. बाद में सबने स्वीकार किया. मैं और दलों की चर्चा नहीं करता, वह निर्णय कर रहे थे- उधर ही देखकर. वह टालना चाहते थे. यह भी राजनीति का मुद्दा बन गया. दोस्तों कभी-कभी इस स्थिति पर बड़ा दुख होता है. देशभक्ति राजनीति का मुद्दा हो जाए, भारत माता के प्रति आदर व्यक्त करना, यह संकुचित स्वार्थ से जुड़ जाए, शायद इस तरह की वृत्ति अपनाने का यह हम दुष्परिणाम भुगत रहे हैं. लेकिन अंत में हुआ, अब वंदेमातरम से संसद के सत्र की समाप्ति होती है. सामूहिक रूप से वंदेमातरम का गान.

आनंदमठ में जिस तरह से उसका उल्लेख है- आनंदमठ संन्यासियों के विद्रोह की कहानी है. प्राय: सभी देशों में और विशेष करके भारत जैसे देश में राजनीतिक परिवर्तन से पहले, एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण होता है. राजनीतिक परिवर्तन के पहले समाज की मानसिकता को तैयार करने के लिए साधु, संत, संन्यासी निकल पड़ते हैं. उस समय हथियार उठाकर जो लोग अंग्रेजों से लड़ना चाहते थे, उनके लिए भी रास्ता खुला हुआ था. आनंदमठ की कहानी भी बड़ी रोमांचक कहानी है. मैं आपसे कहूंगा कि आनंदमठ अवसर मिले तो पढ़िए. भारत की सभी भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ है. उससे परिस्थिति का थोड़ा सा परिचय मिलता है. आज वंदेमातरम को बड़े प्रभावशाली ढंग से गाया जाता है. एक अल्प गायन भी होता है. सामूहिक गायन भी होता है, मगर हमें सामूहिक गायन को अपने देश में प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है- मिलकर गाएं. केवल वंदेमातरम नहीं, वंदेमातरम तो गाना ही चाहिए, बल्कि अन्य गीत भी गाने चाहिए. हम मिलकर गीत गाने में कुछ पीछे हैं. और देशों में जब भीड़ इकट्ठी होती है- लोग गाना शुरू कर देते हैं. वे गीत उनके जीवन से, उनकी धरती से, उनकी प्रकृति से, उनकी संस्कृति से जुड़े होते हैं. लाखों लोग एक साथ गाना शुरू कर देते हैं. हमें भी कुछ गीतों को प्रचलित करना चाहिए, लोकप्रिय बनाना चाहिए. एक कंठ से गीत गूंजे. हमारे राष्ट्रीय संकल्प को प्रकट करें. वंदेमातरम मन:स्पर्शी गीत है- मातृभूमि की वंदना- किस तरह से वह हरी-भरे रहनी चाहिए, किस तरह से यह दुष्टों का दमन करने में समर्थ है, किस तरह से यह भूमि हमारे लिए धर्म है, विद्या है, सब कुछ है- स्वामी विवेकानंद ने इसी बात को अपने भाषण में प्रकट किया था, जब उन्होंने कहा था-थोड़े समय के लिए हम और देवी-देवताओं को भूल जाएं और भारत माता को याद रखें- भारत माता को. इससे बड़ा देवता कोई नहीं है. इससे बड़ा आराध्य कोई नहीं है. और जब भारत माता की चर्चा करते हैं, उसमें धरती आती है, वह हमें धारण करती है. यह धरित्री है. यह वसुंधरा है. कभी हम प्रकृति के साथ ज्यादती करते हैं, तो प्रकोप भी हमें देखने को मिलता है. लेकिन इस पर टिके हुए हैं- वह हमारा पालन पोषण करती है- यह आधार है- इसलिए यह धरती की रक्षा- यह धरती पवित्र है, यह धरती पावन है. सवेरे उठ कर हम धरती पर पांव रखते हैं- पादेन स्पर्शम- क्षमा करना मैंने पैर रख दिया, मां मुझे क्षमा करना. धरती के बारे में ऐसी पवित्र भावना और इसलिए धरती का पूरा संरक्षण, उसे समृद्ध बनाना, हरी-भरी बनाना. धरती के बांटने का सवाल ही पैदा नहीं होता. और होना नहीं चाहिए. वह ऐसी एक मूल है, पता नहीं कब तक वह हमसे अपनी कीमत चुकाने के लिए कहती रहेगी. धरती मां और उस पर निवास करने वाली उसकी संतति, विशाल परिवार, अलग-अलग भाषाओं में अपने को अभिव्यक्त करता हुआ- अलग-अलग रहन-सहन की पद्धति अपनाता हुआ, अलग-अलग प्रकार के मौसमों में जीवन-यापन के तरीके ढूंढता हुआ, हजारों साल से इस देश में, इस मां की संतति के रूप में जो विद्यमान समाज है, उसका भी स्मरण करना है. उसके विकास का उसकी रक्षा का, उसके अच्छे दिनों की कल्पना करते हैं. धरती और धरती पर निवास करने वाला जन्म और जन्म के साथ-साथ रहते-रहते, सहते-सहते, जीवन के मीठे और कड़वे फल साथ-साथ चखते-चखते, प्रकृति से लड़ते-लड़ते, परकीयों का सामना करते-करते, सृष्टि के सारे रहस्यों को भेदने की दिशा में निरंतर अन्वेषण करते-करते, भारत माता की संतति ने एक संस्कृति का निर्माण किया है. और जब हम मां की वंदना करते हैं, इस धरती की वंदना करते हैं, इस धरती पर निवास करने वाली उसकी संतति की वंदना करते हैं, और उस संतति ने जीवन की जो पद्धति विस्तृत की है, हम उसकी रक्षा करने का भी अभिवचन देते हैं, हम उस संस्कृति से लाभान्वित होने की एक तरह की घोषणा करते हैं.

वंदेमातरम मात्र गीत नहीं है. यह तो एक राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है. यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगी. यह राजनीतिक परिवर्तन से परे है. इसे सत्ता के संघर्ष के कारण खंडित नहीं होने देना चाहिए.  यह एक यथार्थ है, एक सपना भी है. अगर आने वाली पीढ़ी को हम उसकी कल्पना का और हमारे सपनों का भारत नहीं दे सके. तो भी हम वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा मंत्र दे जाएंगे. वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा देश दे जाएंगे, एक ऐसी पद्धति दे जाएंगे, जिसके बल पर खड़े होकर वह सैकड़ों साल के संकल्प को साकार करेंगे. मित्रों, मैं तो आनंदमठ का पाठक हूं. आनंदमठ और उस समय लिखे गए अन्य उपन्यास, संघर्ष के काम में किस तरह से उपन्यास, कविता, गीत एक नये जीवन से भर जाते. लोगों में जूझने की प्रेरणा देते. उस समय अंग्रेज बंगाल को नहीं बांट सके और बाद में उन्होंने भारत को बांट दिया. यह हृदय को चुभने वाला घाव है. आज राष्ट्रीय एकता और अखंडाता के लिए जो समस्या पैदा हो रही है, कहीं ना कहीं उनके मूल में वह देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन है. हमारी सुरक्षा अगर संकट में है, तो वंदेमातरम का गीत हमें प्रेरणा देता है. हमारे मन में यह विश्वास पैदा करता है कि अगर विभाजित जर्मनी एक हो सकते हैं, अगर दो कोरिया को मिलाकर एक कोरिया बनाने की फिर से बात हो सकती है, तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो नरसों, ऐसा वक्त जरूर आने वाला है कि भारत फिर से एक होगा. जो हमसे अलग-अलग चले गए हैं, उनकी भी समझ में आएगा. थोड़ा समय लगेगा.

आज फिर से वे धमकियां दे रहे हैं,  हथियारों से लड़ाई का खाका खींचा जा रहा है, एक दिन भाषण दिया जाता है हथियारों का, दूसरे दिन उसका खंडन कर दिया जाता है. किसी देश की सरकार को इतना झूठ नहीं बोलना चाहिए. बेनजीर तेरे मन में क्या है ? बेनजीर का मतलब है, जिसकी नजीर नहीं, जिसका कोई उदाहरण नहीं हो, जो अनुपम है, जो बेमिसाल है. वे एक बार दिल्ली में मुझसे मिलने आई थीं, तब विरोधी दल के नेता के नाते आई थीं और कहने लगीं- ’हमने सोचा वाजपेयी साहब चलो आपसे भी मिलते चलें, आप भी अपोजिशन में हैं और इस समय मैं भी अपोजिशन में हूं. बातें और भी हुईं, उनका मैं उल्लेख नहीं करता. फिर आडवाणी जी आ गए. फिर उनके बीच सिंधी में क्या बातें हुईं, ये तो मैं नहीं जानता. सचमुच में यह बड़ी दुर्भाग्य की बात है, दुनिया बदल गई, शीतयुद्ध समाप्त हो गया, साम्यवाद बिखर गया, और हम आपस में झगड़ों में उलझे हुए हैं, हथियारों पर ख़र्च कर रहे हैं, इसकी होड़ लगी है.

मुझे आदिवासी क्षेत्र में जाने का मौका मिला- पीने का पानी नहीं है, कुपोषण के कारण बच्चे मर रहे हैं. लेकिन हम अपनी सुरक्षा की उपेक्षा नहीं करेंगे. देश की सीमाओं की रक्षा सर्वोपरि है. लेकिन पड़ोसियों को समझना चाहिए- उन्हें भ्रम पैदा हो गया है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र लड़खड़ा रहा है. प्रधानमंत्री ऐसे हैं, जो निर्णय नहीं कर सकते- अगर हमने हमला किया तो वह थोड़ी देर निर्णय नहीं कर पाएंगे, हमले का विरोध करना या क्या करना है, नरसिंह राव जी के बारे में मेरी ऐसी राय नहीं है. अगर सीमा पर रणभेदी बजेगी, तो सारा देश सारे मतभेद भूलकर, साथ मिलकर, पड़ोसियों को ऐसा पाठ पढ़ाने के लिए तैयार होगा कि वह अगली बार हमला करने लायक न रहे. अभी कुछ लोग गए थे, पाकिस्तान से लौटकर आए हैं, वहां जिस तरह की बातें हो रही हैं, वह चिंता पैदा करने वाली हैं. कोई दु:स्साहसपूर्ण कदम उठाया जा सकता है. वे समझ रहे हैं कि इस देश का मनोबल टूट जाएगा, भारत में से आवाज उठेगी- कश्मीर के लिए कब तक लड़ते रहोगे, कब तक खून बहाते रहोगे- ले-देकर समझौता करो- यह गलतफहमी है- यह होगा नहीं, यह हम होने नहीं देंगे. एक बार देश का बंटवारा हो गया. हम लोग राजनीति में नहीं थे- अब हम हैं- और दृढ़ता के साथ खड़े हैं. और केवल हम नहीं, अब सारे देश ने पाठ पढ़ लिया है, सारे देशवासी इकट्ठे हो जाएंगे, सरकार को प्रेरित करेंगे, सरकार को विवश करेंगे- देश की प्रादेशिक अखंडता के साथ और समझौता नहीं होगा. अब और भूदान नहीं होगा. और यह मानसिकता बनाने में  वंदेमातरम हमारा पथ प्रदर्शक है. हमें अनुप्राणित करने वाला संदेश है, मैं बधाई देता हूं एक बार फिर से महोत्सव समिति को, डॊक्टर साहब को- वह तो हृदय की चिकित्सा करते हैं, अगर कहा जाए तो वंदेमातरम हमारे राष्ट्र के हृदय की धड़कन को व्यक्त करता है. और यह ऐसा हृदय है, जिसके ऒपरेशन की कभी आवश्यकता नहीं है. यह चिंतन हृदय है. और यह धड़कन शाश्वत है. यह धड़कन काल की सीमाओं को पार कर चलेगी. यह भविष्य को रूप देगी. यह गीत हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता रहेगा. आपने इस गीत की शताब्दि समारोह का आयोजन किया, ऋषि बंकिमचंद्र को याद किया. मैं आपको बधाई देना चाहता हूं. सचमुच विलेपार्ले के लोग विलक्षण हैं- बहुत अच्छा काम आपने किया है. देश के अन्य भागों में भी इस तरह का अनुष्ठान होना चाहिए- साल भर यह कार्यक्रम चल सकता है. यह हृदय पर संस्कार डालने वाला कार्यक्रम है. और संस्कार सगर सही होते हैं, तो देश थोड़े दिन के लिए भले ही रास्ता भटक जाए, लेकिन अंत में अपना लक्ष्य पाने में जरूर सफल होता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

बलिदान की बेला में पीछे नहीं हटेंगे

   


श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के विदेशमंत्री के रूप में 3 से 4 अक्टूबर, 1977 को आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ के बत्तीसवें अधिवेशन को संबोधित किया. इस अवसर पर उन्होंने कहा- 
अध्यक्ष महोदय, प्रतिनिधिगण
भारतवर्ष में हाल ही में एक ऐतिहासिक और अहिंसात्मक क्रांति हुई. गत मार्च में हुए चुनावों में भारतीय जनता ने मानव की दुर्दम्य आत्मशक्ति का परिचय दिया और एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज में अपनी आस्था की पुष्टि की. उन्होंने लोकतंत्र को नष्ट करने के तामसी तथा निरंकुश शक्तियों के धूर्ततापूर्ण प्रयत्नों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया. हमारे देश की 60 करोड़ की जनता के लिए मार्च की यह क्रांति स्पष्टतया दूरगामी महत्व रखती है, साथ ही समस्त संसार के स्वतंत्रता-प्रेमी लोगों के लिए यह उतनी ही महत्वपूर्ण है.

हमारी जनता ने निर्भय होकर उन मूलभूत सिद्धांतों, जीवन-मूल्यों तथा आकांक्षाओं को परिपुष्ट किया, जिन पर लगभग 30 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की आधारशिला रखी गई थी. भारत के लोगों ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता और मूलभूत मानव-अधिकार पुन: प्राप्त कर लिए. मैं भारतीय जनता की ओर से राष्ट्र संघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूं. महासभा के इस बत्तीसवें दिन अधिवेशन के अवसर पर मैं संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की दृढ़ आस्था को पुन: व्यक्त करना चाहता हूं. हमारा विश्वास है कि राष्ट्र संघ विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखने और राष्ट्रों के बीच सहयोग के माध्यम से समानता, न्याय और समता पर आधारित शांतिपूर्ण प्रगति को प्रोत्साहित करने का उपकरण बनेगा.

जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले छह माह भर हुए हैं. फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं. भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं. जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था, वह अब दूर हो गया है. ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं, जिनसे यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा. लेकिन हम केवल इन उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं है. हमारी संसद में 22 जुलाई, 1977 को विधिवत इस बात की पुष्टि कर दी गई है कि भारत के लोग शांतिमय और वैध तरीकों से देश में एक ऐसी आर्थिक और सामाजिक क्रांति लाने के लिए कृत-संकल्प हैं, जो लोकतांत्रिक भावनाओं से प्रदीप्त हो, समाजवादी आदर्शों से अनुप्राणित हो और नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की आधारशिला पर सुदृढ़ रूप से स्थित हो.
 
अध्यक्ष महोदय, मैं भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ में नया हूं, मेरा देश नया नहीं है. इस संस्था की स्थापना के समय से ही भारत का इससे निकट संबंध रहा है. इस सम्मान्य सभा को संबोधित करते हुए मुझे गौरव का अनुभव हो रहा है. अपने देश में 20 वर्ष से अधिक राष्ट्रीय संसद का सदस्य होने के नाते, विश्व के देशों की इस सभा में पहली बार भाग लेते हुए, मुझे विशेष उल्लास हो रहा है.

अध्यक्ष महोदय, आपको अध्यक्ष पद पर आसीन देखकर मुझे और भी अधिक प्रसन्नता हो रही है, क्योंकि आप एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं, जो भारत के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है, और जिसके साथ हमारे मैत्री-संबंध हैं. भारत सरकार की ओर से और अपनी ओर से भी मैं संयुक्त राष्ट्र महासभा के बत्तीसवें अधिवेशन के सर्वानुमति से अध्यक्ष चुने जाने पर आपका हार्दिक अभिनंदन करता हूं. आपका चुनाव न केवल आपके विस्तृत राजनयिक अनुभवों और निजी विशिष्टताओं के प्रति आदर का द्योतक है, बल्कि आपके देश यूगोस्लाविया तथा उसके द्वारा शांति और स्थायित्व की शक्तियों को जो बल प्रदान किया जा रहा है, उसके प्रति भी सम्मान का सूचक है. मैं आश्वासन देना चाहता हूं कि आपको अपने पद का दायित्व निभाने में हमारा पूरा सहयोग मिलेगा.

पदमुक्त अध्यक्ष महामान्य शर्ली अमरसिघे का भी हार्दिक अभिनंदन करते हुए मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है. वे हमारे निकट पड़ोसी देश श्रीलंका के विशिष्ट प्रतिनिधि हैं और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के इकत्तीसवें अधिवेशन का बड़ी कुशलता और योग्यता के साथ संचालन किया है.

अन्य प्रतिनिधि मंडलों के साथ मैं भी संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डॊक्टर कुर्ट वाल्डहाइम को हार्दिक बधाई देना चाहूंगा. वे अपनी बुद्धिमता, धैर्य और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के साथ अपने जटिल दायित्व को निभा रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय सदभाव और विश्व-कल्याण को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं. 

महासचिव ने बहुत विचारप्रेरक रिपोर्ट महासभा के सम्मुख प्रस्तुत की है. मैं उसके लिए उन्हें विशेष रूप से बधाई देना चाहूंगा. इस रिपोर्ट में उन्होंने साफ-साफ शब्दों में हमारा ध्यान भविष्य में आने वाली चुनौतियों की ओर आकर्षित किया है. उन्होंने कहा है कि संयुक्त  राष्ट्र संघ में अतुलनीय संभावनाएं हैं, लेकिन किसी हद तक यह भी अपने अभिन्न व्यक्तित्व और सही भूमिका की खोज में है.

जनता सरकार शांति, गुटनिरपेक्षता और सब देशों के साथ मैत्री की नीति का दृढ़ता से अनुसरण कर रही है. गुटनिरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय संप्रभुता का विस्तार है. इसका मूल तत्व तटस्थता न होकर स्वाधीनता है, जो उपनिवेशवाद के विरुद्ध हमारे राष्ट्रीय संघर्ष और दासता तथा दमन से मानव-चेतना की मुक्ति का सहज परिणाम है. हम राष्ट्रों की सच्ची स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं. हमारी मान्यता है कि हर देश को अपने सर्वोत्तम हितों के अनुकूल नीति अनुसरण करने की तथा प्रत्येक समस्या पर गुणों के आधार पर विचार करने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

नई सरकार ने शासन संभालते ही न केवल गुटनिरपेक्षता के मार्ग पर चलते रहने की, अपितु उसके मौलिक तथा सकारात्मक रूप को पुन: प्रतिष्ठित करने की घोषणा की. यह संतोष का विषय है कि वास्तविक गुटनिरपेक्षता पर हमारे द्वारा दिए गए जोर और इस नीति को उत्साह और गतिशीलता से आगे बढ़ाने के हमारे निर्णय को सही मानो में देखा और समझा गया है.

अध्यक्ष महोदय,’वसुधैव कुटुम्बकम’ की परिकल्पना बहुत पुरानी है. भारतवर्ष में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि संसार एक परिवार है. अनेकानेक प्रयत्नों और प्रयोगों के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के  रूप में इस स्वप्न के अब साकार होने की संभावना है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता लगभग विश्वव्यापी हो गई है और वह 400 करोड़ लोगों का, जो विभिन्न जातियों, रंगों और समुदायों के हैं, प्रतिनिधित्व करता है. फिर भी यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ केवल सरकारी प्रतिनिधि मंडलों का मिलनमंच मात्र न रहे. हमें इस लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए कि किस प्रकार राष्ट्रों की यह महासभा मानवता के सामूहिक विवेक और इच्छा शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव की संसद का रूप ले चुकी है. 

संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा-पत्र केवल राष्ट्रों की ओर से या राष्ट्रों के लिए किया गया आह्वान मात्र नहीं है. यह तो संसार के समस्त लोगों द्वारा किया गया सदघोष है कि अपनी भावी पीढ़ी को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाए और सच्ची स्वतंत्रता के वातावरण में एक नई विश्व-व्यवस्था की रचना की जाए.

यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा. आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए अधिक महत्व रखती है. अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज, वस्तुत: हर नर, नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में यत्नशील हैं. संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह समस्त मानवता का सबल स्वर बन सके और देशों के बीच एक-दूसरे पर अवलंबित सामूहिक कृति तथा सहयोग का गतिशील माध्यम बन सके.

स्वयं अपने इतिहास और राजनीतिक अनुभव से हमने सीखा है कि वास्तविक सत्ता सरकारों में नहीं, जनता में निहित है, और जो उनकी इच्छा और समर्थन पर आश्रित है. आज से 30 वर्ष पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में जनता ने हथियार उठाए बिना बड़ी हिम्मत से एक शक्तिशाली साम्राज्य का सामना किया और उससे देश को मुक्ति दिलाई. इस वर्ष के प्रारंभ में हमारी जनता ने एक स्वार्थांध सत्ता के उन सब प्रयत्नों पर सफलतापूर्वक पानी फेर दिया, जिनके द्वारा उनकी मूलभूत स्वतंत्रता को छीना जा रहा था. 

इस घटना से हमारे कई विदेशी मित्र-बंधुओं को आश्चर्य हुआ. परंतु मुझे तो स्पष्ट है कि हमारे लोगों द्वारा प्रदर्शित महान राजनीतिक साहस की प्रेरणा हमारी प्रकृति और परंपरा से मिली है. सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केंद्र बिंदु व्यक्ति रहा है. हमारे धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्राह्मांड और सृष्टि का मूल- व्यक्ति और उसका संपूर्ण विकास है.

हमारी सदा मान्यता रही है कि ईश्वर के अनेक रूप हो सकते हैं. हर भारतवासी को, भले ही वह कहीं जन्मा हो या कोई भी आस्था रखता हो, अपने उद्धार और मुक्ति का मार्ग ढूंढने की स्वतंत्रता रही है. साथ ही हमारे मनीषियों ने वैदिक युग से लेकर अब तक सदा ही हमें अपने साथी मानवों के प्रति करुणा और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है. गांधी जी ने इस तत्व का सार उनके प्रिय शब्द ’अंत्योदय’ में व्यक्त किया है. ’अंत्योदय’ का अभिप्राय है : निम्नतम और निर्धनतम वर्गों के हितों की रक्षा और कल्याण, जिसके लिए प्रत्येक समाज को संलग्न रहना चाहिए.

मेरा विश्वास है कि हमारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में निरंतर सर्वोच्च स्थान मनुष्य, उसके सुख और कल्याण तथा मानव की आधारभूत एकता को मिलना चाहिए. मेरा अभिप्राय किसी आकृतिहीन मानव से नहीं है, जो अतीत काल में निरंकुशता को थोपने का बहाना रहा है, मेरा मतलब जीते-जागते मानव से है. उसकी संवेदनाएं और अपेक्षाएं, उसका सुख और दुख हमारे प्रयत्नों का केंद्र बिंदु होना चाहिए.

अध्यक्ष महोदय, हम विश्व शांति के, ऐसी शांति के, जो जीवंत है, प्रबल समर्थक हैं. विश्व शांति हमारे सारे प्रयत्नों की आधारशिला है. शांति की परिभाषा केवल युद्ध न होना मात्र नहीं है. विश्व शांति का ताना-बाना किसी समय भी छिन्न-भिन्न हो सकता है. उसका संरक्षण तो केवल उन सामूहिक प्रयत्नों से हो सकता है, जो राष्ट्रों के बीच विद्यमान भारी असमानता और असंतुलन को दूर कर सकें, एक राष्ट्र पर दूसरे राष्ट्र के प्रभुत्व और शोषण का अंत कर सकें और संसार के समस्त लोगों को बराबरी के आधार पर अवसर और अधिकार प्रदान कर सकें.

नि:संदेह हर देश अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण और संवर्धन करना चाहता है. पर कोई देश सबसे अलग-थलग होकर चहारदीवारी के भीतर नहीं रह सकता.  हमें यह समझना होगा कि विश्व के देशों में पारस्परिक निर्भरता के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं है. इसी में विश्व मानव कल्याण है. इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सब अपने-अपने राष्ट्रीय क्षितिजों के पार दृष्टि दौड़ाएं. पारस्परिक सहकारिता और त्याग की प्रवृत्ति को बल देकर ही मानव-प्रगति और समृद्धि का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है.

जब भारत ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वातंत्र्य संग्राम छेड़ा था, तब से विश्व एक लंबा रास्ता तय कर चुका है. एक एशियाई देश के नाते हमने वियतनाम के बहादुर लोगों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झेले गए अपार कष्टों और अनगिनत बलिदानों को बड़ी संवेदना के साथ देखा. उनकी अंतत: सफलता मानव की आत्मशक्ति की ज्वलंत परिचायक तथा दासता के विरुद्ध उसके अदम्य प्रतिरोध के प्रति श्रद्धांजलि है.

हमें प्रसन्नता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वियतनाम के पुनर्निमाण और वहां के लोगों के पुनर्वासन के लिए अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर सहायता देने की योजना बनाई है. भारत वियतनाम को अपनी ओर से यथासंभव और भरसक सहायता देने के लिए तत्पर है.

भारत, वियतनाम समाजवादी गणराज्य के संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश का सहर्ष स्वागत करता है. नये अफ्रीकी राज्य जिबूटी का भी हम हार्दिक अभिनंदन करते हैं. इन दोनों देशों की सदस्यता से संयुक्त राष्ट्र संघ और भी विश्वव्यापी हो गया है. इन दोनों देशों के साथ भारत के मधुर मैत्री संबंध हैं और हम आशा करते हैं कि भविष्य में हमारे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी. 

इस अवसर पर मैं साइप्रस के दिवंगत राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोस के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूं. स्वर्गीय आर्चशिप एक विश्वनेता थे और वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे. उन्होंने साइप्रस की आजादी का सृजन तो किया ही, साथ ही उसके अस्तित्व के संरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त किया.

अध्यक्ष महोदय, महासभा के समक्ष जो कार्यसूची है, उसमें संसार की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं सम्मिलित हैं. मैं इनमें से कुछ ऐसे विशिष्ट प्रश्नों का उल्लेख करना चाहूंगा, जिनका तात्कालिक महत्व है, और जिनको हमारे इस सामूहिक विचार-विनिमय में प्राथमिकता दी जानी चाहिए. 

हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या दक्षिणी अफ्रीका में मानव अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए हो रहे महान संघर्ष की है. भारत ने सदैव ही राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अनावश्यक रक्तपात और हिंसा का विरोध किया है. हम अहिंसा में आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो. पराधीनता के अंधकारपूर्ण काल में भी भारत कतिपय आधारभूत सिद्धांतों पर दृढ़ था. ये सिद्धांत थे औपनिवेशिक दमन का तीव्र विरोध और रंगभेद के  प्रत्येक हनन की पूर्ण अस्वीकृति. इन सिद्धांतों के प्रति स्वतंत्र भारत की श्रद्धा आज भी अधिक गहरी हो गई है.

अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट है. प्रश्न यह है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा से रहने के अपहरणीय अधिकार हैं या रंगभेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहे. नि:संदेह रंगभेद के सभी रूपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए. रंगभेद निश्चित रूप से समाप्त होना चाहिए. इसका अस्तित्व मानवता पर कलंक और संयुक्त राष्ट्र संघ पर एक गहरा आक्षेप है.

भारत चाहता है कि जिम्बाब्वे की समस्या का शांतिपूर्ण ढंग से अतिशीघ्र समाधान हो. भारत ने इसी संदर्भ में आंग्ल-अमेरिकी प्रस्तावों के उन विधायक अंशों का स्वागत किया है, जो एक विशिष्ट समयावधि में वास्तविक बहुमत शासन की स्थापना की ओर इंगित करते हैं. आशा है कि इस विषय पर हाल ही में सुरक्षा परिषद में स्वीकृत प्रस्ताव से युद्ध-विराम होगा और अंततोगत्वा समस्या का समाधान निकलेगा. यह अधिकांश इस बात पर निर्भर है कि रियान-ह्यूझान का अवैधानिक शासन अपना दुराग्रह और अकड़ त्यागने और विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है या नहीं ?

जब तक स्मिथ सरकार हटा नहीं दी जाती और जब तक लंबे समय से त्रस्त जनता को स्वाधीनता की पुन: प्राप्ति नहीं हो जाती, हम यह कैसे आशा कर सकते हैं कि स्वतंत्रता के सेनानी अपने हथियार रख देंगे. भारत जिम्बाब्वे में अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत देशभक्त शक्तियों के प्रति अपने ठोस समर्थन की पुन: पुष्टि करता है, जो भारी बने रहने के निष्फल प्रयास में रियान-ह्यूझान विश्व जनमत की जानबूझकर अवहेलना करता रहता है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने समस्त अधिकारों का प्रयोग कर अवैधानिक और अल्पमतीय सत्ता और उसके समर्थक दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध अनिवार्य प्रतिबंधों को अधिक व्यापक करना पड़ेगा. इसी से अवैधानिक शासन का अंत निकट आएगा और जिम्बाब्वे के लोगों को अपने भाग्य का स्वयं फैसला करने का अपहरणीय अधिकार प्राप्त होगा.

नामीबिया में भी, जिसे अंतर्राष्ट्रीय राज्य क्षेत्र का दर्जा मिला हुआ है,  संयुक्त राष्ट्र संघ की सत्ता, विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को समान तथा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. 

अभी यह देखना बाकी है कि पाश्चात्य देशों के प्रयत्न दक्षिण अफ्रीकी सरकार को कहां तक नामीबिया छोड़ने के लिए तैयार करते हैं, जिससे कि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव कार्यान्वित हो सकें. वालविस बे को, जो नामीबिया का एक भाग है, अपने राज्य क्षेत्र में स्थित केप प्रांत में शामिल करने के दक्षिण अफ्रीका के निर्णय की हम निंदा करते हैं. इसी तरह नामीबिया के एक क्षेत्र का अणु परीक्षण के लिए कथित उपयोग करने की योजना की भी हम भर्त्सना करते हैं.

हम पूर्ण रूप से स्वापो (दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका जन संस्था) के साथ हैं और सभी देशों को उसके प्रातिनिधिक स्वरूप को स्वीकार करने की अपील करते हैं. हम नामीबिया की जनता से अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह अपना सशक्त संघर्ष छोड़ दे. यदि आजादी हासिल करने का एक यही उपाय रह जाता है. किंतु हम समस्या का समाधान केवल स्वापों के प्रयत्नों  और संघर्ष पर ही नहीं छोड़ सकते. इस कार्य में संयुक्त राष्ट्र संघ ने दक्षिण अफ्रीकी प्रशासन को नामीबिया से पूर्ण रूप से हट जाने के लिए बाध्य करने की अपनी समर्थता का निश्चय ही अभी तक पूरा उपयोग नहीं किया है.

जबकि दक्षिण अफ्रीका में हम उपनिवेशवाद और रंगभेद के निकृष्टम रूप का सामना कर रहे हैं, पश्चिम एशिया में विश्व शांति को और भी अधिक विस्फोटक खतरा है. यहां भी कुछ मूलभूत सिद्धांतों का प्रश्न है. सर्वप्रथम किसी को भी आक्रमण के फलों का उपयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती. दूसरे किसी भी जनमसूह को अपने ही देश में रहने के अपहरणीय अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. तीसरे, सीमा संबंधी सभी विवाद शक्ति प्रयोग से नहीं, बल्कि बातचीत के जरिये सुलझाए जाने चाहिए.

इस दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट है कि इजराइल ने बल प्रयोग द्वारा जिन क्षेत्रों पर अवैध रूप से कब्जा किया है, उसे मान्यता नहीं दी जा सकती. आक्रमण समाप्त होना ही चाहिए. यह भी आवश्यक है कि फिलिस्तीन के अरब लोगों को, जिन्हें बलपूर्वक अपने घरों से उजाड़ दिया गया है, पुन: अपने देश में लौटने के अपहरणीय अधिकार का उपयोग करने दिया जाए. इस क्षेत्र के सभी लोगों और राज्यों को अपने पड़ोसियों के साथ शांति और मेल-मिलाप से रहने का अधिकार है. इस भूखंड की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए यह एक आवश्यक शर्त है. हाल में इजराइल ने वैस्ट बैंक और गाजा में नई बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है, संयुक्त राष्ट्र संघ को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए.

यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता, तो इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं. यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का शीघ्र ही पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पी.एल.ओ. को प्रतिनिधित्व दिया जाए.

साइप्रस की स्थिति का भी समाधान बाकी है. हमें अब भी आशा है कि द्विपक्षीय सामुदायिक वार्ताएं पुन: प्रारंभ होंगी और समस्या का ऐसा हल निकलेगा जो साइप्रस गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता, सार्वभौमिकता और गुटनिरपेक्षता के अनुरूप होगा.

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक समस्याओं का महत्व अधिकाधिक बढ़ता जा रहा है. समानता और न्याय पर आधारित एक नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को विश्व समाज में मान्यता मिल गई है. अब इसे मूर्त रूप देने की दिशा में शीघ्र आगे बढ़ना है, जिससे विश्व के सभी नर-नारियों को अधिक न्यायसंगत और समुचित अवसर तथा अपने श्रम के लिए लाभ प्राप्त हो.

अध्यक्ष महोदय, मैं पहले इस बात का उल्लेख कर चुका हूं कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करने में अनेक अंतर्विरोध और चुनौतियां हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के  30 वर्ष बाद आज हमें, पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गया है कि दरिद्रता के सागर में कोई एक राष्ट्र या राष्ट्र समूह समृद्धि का द्वीप बनकर नहीं रह सकता. 

दो दशकों से भी अधिक  समय से अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर विचार-विनिमय हो रहा है. परंतु विकास दशक के लिए जो स्वरूप लक्ष्य निश्चित किए गए थे, उनकी या तो अवहेलना कर दी गई है या उन्हें पीछे धकेल दिया गया है. बढ़ी हुई विषमताओं को कम करने के लिए विकसित देशों से संसाधनों और तकनीकी ज्ञान का पर्याप्त स्थानांतरण नहीं हुआ. 

इस वर्ष पेरिस में हुए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग सम्मेलन में इन सभी समस्याओं पर विस्तृत रूप से विचार-विमर्श हुआ था. यद्यपि इन 18 महीनों के प्रदीर्घ विचार-विनिमय के फलस्वरूप कुछ प्रगति हुई, किंतु पेरिस सम्मेलन का परिणाम, कुल मिलाकर अत्यंत निराशाजनक रहा है.

एक विशेष कोष कायम किया जाएगा और ओ.डी.ए. (अधिकृत विकास सहायता) के लिए दिए गए कुल आश्वासनों की भी पुष्टि कर दी गई है. लेकिन संसाधनों और तकनीक के स्थानांतरण तथा कर्ज के बोझ से बचने की गंभीर समस्याओं का हल निकलना अभी बाकी है. यद्यपि वस्तुओं के एकीकृत कार्यक्रम के अंतर्गत सामान्य कोष पर सिद्धांतत: सहमति हो गई है, किंतु इसे व्यवहार में मूर्त रूप देना अभी शेष है.

ऐसे तर्क और विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो विकासशील देशों के सम्मुख खड़े गंभीर संकट का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं करते. संभवत: इसका कारण यह है कि विकसित देश अपनी स्वयं की समस्याओं और कठिनाइयों में उलझे हुए हैं. कई स्थितियों में तो जो एक हाथ से दिया जा रहा है, उसे दूसरे हाथ से वापस लिया जा रहा है.

प्राय: यह दावा किया जाता है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति निर्धनता को दूर करने और उन्नति के लाभों को समस्त संसार में उपलब्ध करने की क्षमता रखती है, किंतु सत्य तो यह है कि विकासशील देशों को सही ढंग की तकनीक न मिलने के कारण धनी और निर्धन देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है.

निस्संदेह युद्धोपरांत की शताब्दियों में अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य का कई गुना विस्तार हुआ है, परंतु उसका लाभ अधिकांशत:  विकसित देशों को मिला है और उन्हीं देशों के लोगों के आर्थिक विकास तथा जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायक हुआ है.

विकासशील  देशों के लिए विभिन्न व्यापार संबंधी प्रतिबंधों को शिथिल करने तथा निर्यातों के लाभकारी मूल्यों को सुरक्षित रखने की समस्याएं आज भी उसी स्थिति में हैं, वो ऊर्जा के संकट के तुरंत बाद थीं. तेल आयातक देशों की आर्थिक समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि कर्ज के बोझ को निरंतर बढ़ाने के अतिरिक्त उनके सम्मुख कोई अन्य उपचार नहीं दिखाई देता.

इसमें संदेह नहीं कि विकसित देशों की अपनी आंतरिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें अपने दृष्टिकोणों और नीतियों को तात्कालिक तथा संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठाना आवश्यक है. यह पूछा जा सकता है कि क्या विकसित देशों के आर्थिक ढांचे की समस्याओं के समाधान का युक्तिसंगत और प्रबुद्ध रास्ता यह नहीं है कि इन देशों से विकासशील  देशों में विशिष्ट मात्रा में वित्तीय और प्रौद्योगिक क्षमता का स्थानांतरण किया जाए ? समृद्ध देशों की बेरोजगारी और आर्थिक उथल-पुथल का समुचित समाधान संसार के तीन अरब लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होने पर ही हो सकता है.

भारत ने इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय विचार-विमर्शों में उत्साह और ईमानदारी से भाग लिया है. हमारी मान्यता रही है कि संसार के आर्थिक रोगों का निवारण संघर्ष की भावना को बल देने से नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पारस्परिक निर्भरता और सहयोग की नई भावना को जागृत करने से होगा. 

अध्यक्ष महोदय, इस संबंध में मैं आपके सम्मुख महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना चाहता हूं, जिसका उन्होंने कई दशकों पहले सुझाव दिया था. जैसा आप जानते हैं, वे सचमुच में एक विश्व-मानव थे. दो दिन पूर्व ही उनका 108वां जन्मोत्सव मनाया गया था. उन्हें कुछ विशिष्ट सिद्धांतों पर आधारित विश्व अर्थव्यवस्था के संबंध में स्पष्ट बोध था. संक्षिप्त रूप से, उनके विचार भी मेरी राय में इस प्रकार थे-
-सब लोगों को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार है, भले ही उनकी अर्थव्यवस्था का रूप, उत्पादकता का स्तर तथा भौगोलिक स्थिति कुछ भी हो.
-राष्ट्रों के बीच पारस्परिक निर्भरता शोषण-रहित होनी चाहिए. असमान लोगों के बीच वास्तविक पारस्परिक निर्भरता नहीं हो सकती, अंत: असमानता को दूर करने के लिए कार्रवाई होनी चाहिए.
-विकासशील देशों को स्वावलंबन और सामूहिक निर्भरता की नीति का पालन करना चाहिए. यह एक ऐसी व्यापक रणनीति का अंश होना चाहिए, जिसका उद्देश्य विकसित देशों से संसाधनों और तकनीक का स्थानांतरण कराना होगा. 
-संसार के लोग, भले ही पृथक राष्ट्रों में बंटे हों, एक ही परिवार हैं. एक सुसंबद्ध विश्व अर्थव्यवस्था की मांग है कि सीमाओं से परे न केवल वस्तुओं, पूंजी के साधनों और तकनीक का आदान-प्रदान हो, बल्कि आदमियों का भी आवागमन होता रहे.
-आर्थिक व्यूह रचना का लक्ष्य मात्र जी.ए.पी. बढ़ाना न होकर, रोज़गार में वृद्धि करना हो.
-उपभोग में असंयम के विरुद्ध एक विश्वव्यापी आंदोलन की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा असंयम मनुष्य को गिराता है और उसे शेष समाज से दूर ले जाता है.
-न केवल विकसित, बल्कि विकासशील देशों को भी अपने देश की आम जनता और आभिजात्य वर्ग के बीच की खाई को भरना चाहिए. न्यायसंगत  विश्व अर्थव्यवस्था का आधार हर देश में एक न्यायोचित अर्थव्यवस्था की रचना हो सकता है.

अध्यक्ष महोदय, संसार में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे नंबर का देश होने के नाते भारत की समस्याएं भी बहुत जटिल हैं. हमारी प्रगति उल्लेखनीय है, लेकिन हमारे सम्मुख कई चुनौतियां विद्यमान हैं. एक ऐसे देश के नाते जिसने लोकतंत्र में अपनी आस्था पुन: व्यक्त की है और जो सहमति के अधार पर शासन चलाना चाहता है, हमारा काम और भी अधिक क्लिष्ट हो गया है.

हमें गत कुछ  दशकों तथा सदियों से जो अनेकानेक समस्याएं विरासत में मिली हैं, उन्हें हल करने के लिए हमारे पास न तो कोई जादू की छड़ी है और न कोई तुरत-फुरत समाधान. लेकिन हमें आशा और विश्वास है कि हम सफल होंगे. स्वतंत्रता के विगत 30 वर्षों में हमारे लोगों ने अपनी परंपरागत प्रतिभा के बल पर विज्ञान और तकनीक द्वारा प्रस्तुत नये अवसरों के महत्व को समझा है और राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रगति के इन नवीन उपकरणों का प्रयोग करने की क्षमता दिखाई है.

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की उपयोगिता को समझते हुए भी, हमारा प्रयास यही रहा है कि अपनी राष्ट्रीय प्रगति और आर्थिक स्वावलंबन के लिए हम अपने ही प्रयत्नों पर निर्भर रहें. हमारी नई सरकार नई प्राथमिकताओं के निश्चित करने और नियोजन तथा नीतियों में जो विकृतियां आ गई थीं, उन्हें दूर करने के लिए तत्पर है. आर्थिक क्षेत्र में अपने विकास के लिए हम औद्योगिक देशों की आंख मूंदकर नकल नहीं करना चाहते. हम ऐसे एकात्मक नियोजन की ओर बढ़ना चाहते हैं, जिसका केंद्रबिंदु मानव हो. हम अपना ध्यान ग्रामीण विकास पर अधिक केंद्रित करना चाहते हैं, क्योंकि हमारे देश की बहुसंख्यक जनता गांवों में रहती है और उसका जीवन वहीं बीतेगा. हम आभिजात्य वर्ग के उपभोगवाद पर आधारित बहुलता नहीं चाहते. मनुष्य का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसके पास क्या है, बल्कि उसकी कसौटी यह है कि वह कैसा है ? हम बेरोजगारों को रोजगार देना चाहते हैं और पिछड़े वर्गों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृतसंकल्प हैं. नगरों की ओर दौड़ने की प्रवृत्ति को उलटने या कम से कम रोकने की हमारी योजना है. विकासशील देशों के लिए यह एक बहुत बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्या बन गई है. कई दशक पहले गांधी जी ने इस बारे में चेतावनी दी थी.  

अधिक सुहाने प्रभात के लिए जूझते हुए भी भारत अपने आर्थिक और तकनीकी अनुभव में अपने बराबर विकासशील देशों को सहभागी बनाने के लिए सदैव तत्पर रहा है. हम अपनी विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में अन्य विकासशील देशों के हजारों  छात्रों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. हमारा विश्वास है कि यह विविधतापूर्ण प्रशिक्षण उन देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास में सहायक होगा. हम विकासशील देशों के बीच परस्पर लाभकारी सहयोग बनाने पर जोर दे रहे हैं और इससे हम केवल अपने लिए किसी प्रकार के राजनीतिक या आर्थिक लाभ की कामना नहीं करते. 

अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व नहीं चाहता. जनता सरकार सभी देशों के साथ स्नेह, सहयोग और समझदारी के सेतु निर्माण करने के लिए सक्रिय है. सर्वप्रथम हमारा ध्यान नजदीकी देशों के साथ संबंध सुदृढ़ करने की ओर गया है. यह मैत्री संदेश लेकर हाल ही में नेपाल, बर्मा और अफगानिस्तान गया था. पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को हम सुदृढ़ करना चाहते हैं, जिससे न केवल स्थायी शांति कायम हो, बल्कि लाभदायक सहयोग में भी वृद्धि हो.

चार दिन पूर्व 30 सितंबर को भारत और बांग्लादेश के प्रतिनिधियों ने गंगाजल की समस्या पर हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. यह एक व्यापक समझौता है, जिसमें अल्पकालीन समस्या को हल किया गया है और दीर्घकालीन समस्या के समाधान की नींव रखी गई है. इससे दोनों देशों की समुचित आवश्यकताओं की पूर्ति होगी.

इस समस्या ने हमारे पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंधों में पिछले 25 वर्षों से बिगाड़ पैदा कर रखा था. समझौता हमारे इस विश्वास की पुष्टि करता है कि ऐसी जटिल समस्या को, जो दो पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है, ईमानदारी से प्रेरित द्विपक्षीय चर्चा के द्वारा ही हल किया जा सकता है. ऐसे हल के लिए दोनों पक्षों को कुछ न कुछ त्याग करना पड़ता है और आदान-प्रदान के आधार पर आगे बढ़ना होता है.

पिछले एक वर्ष में दक्षिण एशिया के देशों में अनेक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं. फिर भी इन देशों के लोगों को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि दक्षिण एशिया पिछले कई दशकों की अपेक्षा आज तनाव से अधिक मुक्त है. यदि सचमुच दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो जाए, तो हम सब, जिन पर विकास का सारा बोझ है, अपने विकास की ओर अधिक ध्यान दे सकेंगे और अपने संसाधनों को विनाश से हटाकर विकास में लगा सकेंगे.

वस्तुत: इसी संदर्भ में हम यह विशेष अपील करते हैं कि हमारे चारों तरफ के हिंद महासागर के विशाल क्षेत्र को बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और सैनिक अड्डों से मुक्त रखा जाए, जिनका उपयोग  आक्रमण के लिए हो सकता है. विस्तृत परिपेक्ष्य में भारत तनावशैथिल्य के प्रयत्नों का स्वागत करता है. भारत चाहता है कि तनावशैथिल्य केवल यूरोप तक सीमित न रहे, बल्कि विश्वव्यापी हो और उसके लाभ विश्व के सब देशों और लोगों को मिलें.

वर्षानुवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ में अनगिनत प्रस्ताव पास किए गए हैं, जिनमें पूर्ण निरस्त्रीकरण, विशेषकर आणविक निरस्त्रीकरण की मांग की गई है. अणु शस्त्रों की दौड़ बहुत भयावह स्थिति में पहुंच गई है. विनाशकारी हथियारों के अंबार ने संसार को बड़ी विकट दुविधा में डाल दिया है. हमसे कहा जा रहा है कि युद्ध रोकने के लिए आणविक शस्त्र आवश्यक हैं और यह कि इन शस्त्रों के प्रयोग का डर ही युद्ध की रोकथाम करने में समर्थ हो सकता है. हम इस दावे को स्वीकार नहीं करते.

हमारी धारणा है कि आणविक शस्त्र खतरनाक हैं, भले ही वे एक के पास हों, कुछ देशों के पास हों या कई देशों के पास हों. हम केवल आणविक शस्त्रों के फैलाव के ही विरुद्ध नहीं हैं, वस्तुत: हम तो आणविक शस्त्रों के ही खिलाफ हैं. भारत सदा से ही आणविक शस्त्रों को प्राप्त करने और उन्हें विकसित करने का विरोधी रहा है.

तथ्य तो यह है कि भारत पहला देश था, जिसने संयुक्त राष्ट्र संघ में 20 वर्ष पूर्व समस्त आणविक शस्त्रों के परीक्षण पर रोक लगाने का मसला उठाया था. उस समय बड़ी शक्तियां हमारी बात को सुनने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं.  जब वे तैयार हुईं, तो उन्होंने केवल आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए. यह 15 वर्ष पूर्व की बात है. उस समय विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई और यह उम्मीद बंधी कि पूर्णरूपेण परीक्षण प्रतिबंध संधि पर भी जल्दी ही समझौता हो जाएगा. लेकिन हम अभी भी उसकी राह देख रहे हैं. आंशिक शस्त्र प्रतिबंध लागू करने के बाद, पहले की बजाय अधिक अणुशस्त्र परीक्षण हुए हैं. भूमिगत परीक्षण तो अभी भी जारी हैं. आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है.

भारत न तो आणविक शस्त्र शक्ति है और न बनना चाहता है. नई सरकार ने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुन: घोषणा की है. हमारे प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने कहा है कि यदि विश्व के अन्य सभी देश आणविक शस्त्र बनाने लगें, तब भी भारत आणविक शस्त्रों को बनाने की ओर अग्रसर नहीं होगा. हमने अणु शस्त्रों के फैलाव को रोकने वाली संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, क्योंकि हम उसे एक असमान और भेदमूलक संधि समझते हैं. यह संधि दस वर्ष पूर्व तैयार हुई थी. तब से अब तक ऐसी कोई घटना नहीं घटी, जिसके कारण हमें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस हुई हो.

अध्यक्ष महोदय, भारत ने लगभग  25 वर्ष पूर्व आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग के कार्यक्रम को प्रारंभ किया था. अणुशक्ति के शांतिमय उपयोग में हमारा विश्वास दृढ़ है. हम इस दृष्टिकोण से पूर्णतया सहमत हैं कि आणविक शस्त्रों का फैलाव और आणविक प्रौद्योगिकी का विस्तार दो पृथक चीजें हैं और इनके स्पष्ट अंतर को समझा जाना चाहिए.

हम उन सब कदमों और नीतियों का पहले की तरह विरोध करेंगे, जो आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग में रुकावट डालेंगी, साथ ही हम उन सब कदमों और नीतियों का भी विरोध करेंगे, जो भेदभावपूर्ण हैं. हम अन्य देशों के साथ इस समस्या पर पूर्ण सहयोग देने और चर्चा करने के लिए तैयार हैं कि आणविक शस्त्रों के खतरे को किस प्रकार समाप्त किया जाए.

यह नितांत आवश्यक है कि राजनीतिक दिमाग अपने आपको सैनिक तर्कों से मुक्त रखे. यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति विवेक से काम लेकर आणविक शस्त्रों की होड़ को आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में पलट दे. हमें विश्वास है कि आगामी वर्ष निरस्त्रीकरण पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो अधिवेशन होने वाला है, उसमें आणविक निरस्त्रीकरण की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने की दिशा में ध्यान केंद्रित होगा और निरस्त्रीकरण से ऐसे उपाय ढूंढे जाएंगे, जो एक निश्चित समयावधि में सफलतापूर्वक कार्यान्वित किए जा सकें.

पहले ही अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना में शस्त्रों की निरर्थक दौड़ में विश्व के सीमित संसाधनों के फंसे रहने से देरी हो रही है.  वर्तमान कीमतों के आधार पर संसार का कुल सैन्य खर्च लगभग 400 अरब डॊलर है. इसका 90 प्रतिशत विकसित देश खर्च कर रहे हैं, जो विकासशील देशों को दी जाने वाली अधिकृत विकास सहायता से 20 गुना अधिक है. यदि शस्त्रों पर किए जाने वाले व्यय में पांच प्रतिशत की कमी हो जाए, तो उससे विकासशील देशों को अपने सामान्य आर्थिक लक्ष्य को प्राप्त करने में भारी सहायता मिलेगी. अत: निरस्त्रीकरण न केवल शांति तथा सुरक्षा के लिए बल्कि त्वरित आर्थिक सामाजिक प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण है.

इसमें संदेह नहीं कि हमें काफी कुछ करना अभी बाकी है. हम अकसर इच्छाशक्ति या प्रगति की कमी की शिकायत करते रहते हैं. लेकिन हमें हताश या निराश होने की जरूरत नहीं है. कई विफलताओं के बावजूद भी, संयुक्त राष्ट्र संघ की उपलब्धियां बड़ी प्रभावशाली रही हैं. मैं आई.एल.ओ., डब्ल्यू. एच. ओ., यूनेस्को, यूनीसेफ, एफ.ए.ओ. अंकटाड, यूनीडी और संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य संस्थाओं के काम की प्रशंसा करना चाहता हूं. यदि इन्हें पर्याप्त धनराशि मिले, तो ये संस्थाएं मानव व्यथाओं का निवारण करने और मानव कल्याण को बढ़ावा देने की दिशा में और भी बहुत काम कर सकती हैं. एक उदाहरण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मलेरिया के उन्मूलन के लिए किए गए उपाय हैं. आज मलेरिया पुन: अपना सिर उठा रहा है. इसके निराकरण के लिए डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा बनाए गए कार्यक्रम में लगभग 45 करोड़ डॊलर लगेंगे. यह राशि संसार में प्रतिदिन होने वाले सैन्य खर्च से आधी है. फिर भी धन के अभाव में यह कार्यक्रम पिछड़ रहा है.

अध्यक्ष महोदय, भारत का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का एक विश्व संगठन के रूप में समर्थन, सुदृढ़ीकरण तथा विकास होना चाहिए, जिससे न केवल विश्व शांति को संरक्षण तथा मानव अधिकारों का संवर्धन हो, बल्कि वह आर्थिक सहयोग की वृद्धि और राष्ट्रों के क्रियाकलाप में मेल बैठाने के दायित्व का भी निर्वाह कर सके. यह अंतर्राष्ट्रीय समाज के सम्मुख एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य है.

अंत में मैं पुन: अपने भाषण के मूल विषय पर आना चाहता हूं. हमारे सम्मुख महानतम कार्य मानव कल्याण का है, जो मानवता के सम्मुख समुपस्थित सभी समस्याओं को स्वयं में समाहित करता है. यह कार्य मनुष्य की जाति, रंग, संप्रदाय या राष्ट्रीयता की परिधि से परे है. हमारी सारी समस्याएं- युद्ध और शांति का प्रश्न, आर्थिक और तीव्र गति से समाप्त हो रहे प्राकृतिक संसाधन, सब हमें एक ही निष्कर्ष पर ले जाते हैं. हमारे इस पारस्परिक निर्भर संसार में हममें से प्रत्येक अपने भाई का रखवाला है.

हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय, जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों बना रहेगा- वह है मानव का भविष्य. इस मानव को यह पृथ्वी विरासत में मिली है और उसने इस धरती का विकास किया है और इससे स्वयं पोषण पा रहा है. यदि हम यह अनुभव करते हैं कि मानव की अस्तित्व रक्षा अन्य करोड़ों मानवों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है, जैसी कि पहले कभी नहीं थी, तो हम अपने समय के इस एकमात्र निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे कि राष्ट्रीय प्रभुसत्ता का अंतर्राष्ट्रीय परस्पर निर्भरता के साथ निश्चित रूप से मेल बैठाना चाहिए.

मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसकी कीर्ति के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे पग नहीं हटाएंगे. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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