Thursday, August 20, 2026

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना : किसानों को आस बंधी


भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां अधिकतक ग्रामीण कृषि पर आश्रित हैं। कृषि किसानों का मुख्य व्यवसाय है, परंतु प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं अथवा आगजनी के कारण किसानों की फसल नष्ट हो जाती है। कभी अत्यधिक वर्षा के कारण फसल नष्ट हो जाती है, कभी ओलावृष्टि खड़ी फसल पर आपदा बनकर टूट पड़ती है, तो कभी सूखा पड़ जाता है। सूखे के कारण बिजाई नहीं हो पाती, तो कभी सिंचाई के अभाव में खड़ी फसल सूख जाती है। इसके अतिरिक्त आगजनी भी फसल को राख कर देती है। ऐसी स्थिति में किसानों पर संकट के बादल छा जाते हैं। उनका जीवन आर्थिक समस्याओं से घिर जाता है। किसान ऋण लेकर बुआई करते हैं। अकसर उन्हें खाद, बीज और कीटनाशकों तक के लिए ऋण लेना पड़ता है। फसल नष्ट होने पर उन्हें उत्पाद की हानि तो होती ही है, साथ ही ऋण पर बढ़ता ब्याज उनके लिए एक बड़ा संकट बन जाता है। वे दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाते हैं। भुखमरी उन्हें तोड़ डालती है. ऐसे में कोई उपाय न देख किसान आत्महत्या तक कर लेते हैं। 

किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और आगजनी आदि के कारण नष्ट हुई फसल की हानि की भरपाई करने के लिए केंद्र सरकार ने एक योजना आरंभ की है, जिसका नाम है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। 
 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 13 जनवरी 2016 को फसल बीमा योजना का अनावरण किया। यह योजना उन किसानों पर प्रीमियम का बोझ कम करने में सहायता करेगी, जो अपनी खेती के लिए ऋण लेते हैं। यह योजना खराब मौसम से किसानों की रक्षा भी करेगी। बीमा दावे के निपटान की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने का निर्णय लिया गया है, ताकि किसान फसल बीमा योजना के संबंध में किसी समस्या का सामना न करें। यह योजना भारत के हर राज्य में संबंधित राज्य सरकारों के साथ मिलकर लागू की गई है। 

इस योजना के अनुसार किसानों द्वारा सभी खरीफ फसलों के लिए केवल 2 प्रतिशत एवं सभी रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत का एक समान प्रीमियम का भुगतान किया जाना है। वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के मामले में प्रीमियम केवल 5 प्रतिशत होगा। किसानों द्वारा भुगतान किए जाने वाले प्रीमियम की दरें बहुत ही कम हैं और शेष प्रीमियम का भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा, ताकि किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं में फसल हानि के लिए किसानों को पूर्ण बीमित राशि प्रदान की जाए। सरकारी सब्सिडी पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। भले ही शेष प्रीमियम 90 प्रतिशत हो, यह सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। इससे पहले प्रीमियम दर पर कैपिंग का प्रावधान था, जिससे किसानों को कम कम दावे का भुगतान होता था। अब इसे हटा दिया गया है और किसानों को बिना किसी कटौती के पूरी बीमित राशि का दावा मिलेगा। काफी हद तक प्रौद्योगिकी के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा। दावा भुगतान में होने वाली देरी को कम करने के लिए फसल काटने के डेटा को एकत्रित एवं अपलोड करने हेतु स्मार्ट फोन, रिमोट सेंसिंग ड्रोन और जीपीएस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। वर्ष 2016-2017 के बजट में प्रस्तुत योजना का आवंटन 5, 550 करोड़ रूपये का है। बीमा योजना को एक मात्र बीमा कंपनी, भारतीय कृषि बीमा कंपनी द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना,  राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना एवं संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना की एक प्रतिस्थापन योजना है और इसलिए इसे सेवा कर से छूट दी गई है।

इस योजना का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं, कीट और रोगों के परिणामस्वरूप अधिसूचित फसल में से किसी की विफलता की स्थिति में किसानों को बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता प्रदान करना है। कृषि में किसानों की सतत प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए उनकी आय को स्थायित्व देना है। किसानों को कृषि में नवाचार एवं आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में ऋण के प्रवाह को सुनिश्चित करना है।

इस योजना के तहत जिन किसानों को शामिल किया गया है, उनमें अधिसूचित क्षेत्रों में अधिसूचित फसल उगाने वाले पट्टेदार/ जोतदार किसानों सहित सभी किसान कवरेज के लिए पात्र हैं। गैर ऋणी किसानों को राज्य में प्रचलित के भूमि रिकार्ड अधिकार, भूमि कब्जा प्रमाण पत्र आदि आवश्यक दस्तावेजी प्रस्तुत करना आवश्यक हैं। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा अनुमति अधिसूचित लागू अनुबंध, समझौते के विवरण आदि अन्य संबंधित दस्तावेजों भी आवश्यक हैं। अनिवार्य घटक वित्तीय संस्थाओं से अधिसूचित फसलों के लिए मौसमी कृषि कार्यों के लिए ऋण लेने वाले सभी किसान अनिवार्यतः आच्छादित होंगे। स्वैच्छिक घटक गैर ऋणी किसानों के लिए योजना वैकल्पिक होगी।
योजना के तहत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/महिला किसानों की अधिकतम कवरेज सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किया जाएगा। इसके तहत बजट आबंटन और उपयोग संबंधित राज्य के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/सामान्य वर्ग द्वारा भूमि भूमि-धारण के अनुपात में होगा। पंचायती राज संस्थाओं को कार्यान्वयन एवं फसल बीमा योजनाओं पर किसानों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए शामिल किया जा सकता है।

यह योजना बड़े पैमाने पर आपदाओं के लिए प्रत्येक अधिसूचित फसल के लिए एक 'क्षेत्र दृष्टिकोण आधार' यानी परिभाषित क्षेत्रों पर लागू की जाएगी। यह धारणा है कि सभी बीमित किसान को बीमा की एक इकाई के रूप में एक फसल के लिए ’अधिसूचित क्षेत्र’ के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए, जो समान जोखिम का सामना करते हैं और काफी हद तक एक समान प्रति हेक्टेयर उत्पादन के लागत, प्रति हेक्टेयर तुलनीय कृषि आय और अधिसूचित क्षेत्र में जोखिम के कारण एक समान फसल हानि अनुभव करते हैं। अधिसूचित फसल के लिए बीमा की इकाई को जनसंख्या की दृष्टि से समरूप जोखिम वाले क्षेत्र से मिलान किया जा सकता है।
परिभाषित जोखिम के कारण स्थानीय आपदाओं और पोस्ट-हार्वेस्ट हानि के जोखिम के लिए, हानि के आकलन के लिए बीमा की इकाई प्रभावित व्यक्तिगत किसान का बीमाकृत क्षेत्र होगा।

बीमा कंपनियों के कार्यान्वयन पर समग्र नियंत्रण कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत किया जाएगा। मंत्रालय द्वारा नामित पैनल में शामिल भारतीय कृषि बीमा कंपनी और कुछ निजी बीमा कंपनियां वर्तमान में सरकार द्वारा प्रायोजित कृषि, फसल बीमा योजना में भाग लेंगी। निजी कंपनियों का चुनाव राज्यों के उपर छोड़ दिया गया है। पूरे राज्य के लिए एक बीमा कंपनी होगी। कार्यान्वयन एजेंसी का चुनाव तीन साल की अवधि के लिए किया जा सकता है, तथापि राज्य सरकार/केन्द्र शासित प्रदेश तथा संबंधित बीमा कंपनी यदि प्रासंगिक हो, तो शर्तों पर फिर से बातचीत करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह बीमा कंपनियों को किसानों के बीच सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विभिन्न कल्याणकारी गतिविधियों में प्रीमियम बचत से निवेश करने के माध्यम से विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए सुविधा प्रदान करेगा।

राज्य में योजना के कार्यक्रम की निगरानी के लिए संबंधित राज्य की मौजूदा फसल बीमा पर राज्य स्तरीय समन्वय समिति जिम्मेदार होगी। हालांकि कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति राष्ट्रीय स्तर पर इस योजना की निगरानी करेगी। किसानों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक फसली मौसम के दौरान प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कई निगरानी उपायों का पालन प्रस्तावित है, जैसे नोडल बैंकों के बिचौलिये आगे मिलान के लिए बीमित किसानों (ऋणी और गैर-ऋणी दोनों) की सूची अपेक्षित विवरण जैसे नाम, पिता का नाम, बैंक खाता नंबर, गांव, श्रेणी - लघु और सीमांत समूह, महिला, बीमित होल्डिंग, बीमित फसल, एकत्र प्रीमियम, सरकारी सब्सिडी आदि सॉफ्ट कॉपी में संबंधित शाखा से प्राप्त कर सकते हैं। इसे ई मंच तैयार हो जाने पर ऑनलाइन कर दिया जाएगा।
संबंधित बीमा कंपनियों से दावों की राशि प्राप्त करने के बाद, वित्तीय संस्थाओं/बैंकों को एक सप्ताह के भीतर दावा राशि लाभार्थियों के खाते में हस्तांतरण कर देना चाहिए। इसे किसानों के खातों में बीमा कंपनी द्वारा सीधे ऑनलाइन हस्तांतरित कर दिया जाएगा।
लाभार्थियों की सूची (बैंकवार एवं बीमित क्षेत्रवार) फसल बीमा पोर्टल एवं संबंधित बीमा कंपनियों की वेबसाइट पर अपलोड किया जा सकता है।
लगभग 5 प्रतिशत लाभार्थियों को क्षेत्रीय कार्यालयों/बीमा कंपनियों के स्थानीय कार्यालयों द्वारा सत्यापित किया जा सकता है, जो संबंधित जिला स्तरीय निगरानी समिति और राज्य सरकार/फसल बीमा पर राज्य स्तरीय समन्वय समिति को प्रतिक्रिया भेजेंगे।
बीमा कंपनी द्वारा सत्यापित लाभार्थियों में से कम से कम 10 प्रतिशत संबंधित जिला स्तरीय निगरानी समिति द्वारा प्रतिसत्यापित किए जाएंगे और वे अपनी प्रतिक्रिया राज्य सरकार को भेजेंगे।
लाभार्थियों में से 1 से 2 प्रतिशत का सत्यापन बीमा कंपनी के प्रधान कार्यालय/केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त स्वतंत्र एजेंसियों/राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति द्वारा किया जा सकता है और वे आवश्यक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेजेंगे। इसके अतिरिक्त पहले से ही चल रही फसल बीमा योजनाओं राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, मौसम आधारित फसल बीमा योजना, संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और नारियल पाम बीमा योजना के कार्यान्वयन और निगरानी की देखरेख कर रही है जिला स्तरीय निगरानी समिति इस नई
योजना के उचित प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होगी।

भारत सरकार ने योजनायों के बेहतर प्रशासन, समन्वय, जानकारी के समुचित प्रचार-प्रसार और पारदर्शिता के लिए एक बीमा पोर्टल आरंभ किया है। इसके साथ ही एक एंड्रॉयड आधारित फसल बीमा ऐप्प भी शुरू किया गया है, जिसे फसल बीमा, कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, ’प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अब तक जितनी योजनाएं थीं उनकी विशेषताओं को तो समाहित करती ही है लेकिन जो कमियां थीं, उनका प्रभावी समाधान देती है। अब तक की सबसे कम प्रीमियम दर, सरल टेक्नालॉजी जैसे मोबाइल फोन का उपयोग कर नुक़सान का त्वरित आंकलन, निश्चित समय सीमा में पूरे दावे का भुगतान। “यह एक ऐतिहासिक दिन है, मेरा विश्वास है किसानों के कल्याण से प्रेरित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाएगी। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: आपदाओं के दायरे को बढ़ाया गया - जल भराव, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान जैसी आपदाओं को सम्मिलित किया।”
इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए एक वरदान है। इससे प्राकृतिक आपदाओं या आगजनी के कारण नष्ट हुई फसल की हानि की भरपाई हो सकेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना : गांवों में उजियारा होगा


देश के अधिकतर गांवों में आज भी विद्युत संकट एक चुनौती बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं के बदलते आधार, जीवन स्तर में सुधार के कारण बिजली की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जिसके लिए ग्रामीण मूलभूत ढांचे में वृद्धि की आवश्यकता है। देश के ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि उपभोक्ताओं को आमतौर पर स्थानीय वितरण नेटवर्क से सेवाएं मिलती हैं। देश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों को अपर्याप्त विद्युत आपूर्ति का सामना करना पड़ रहा है। परिणामस्वरूप जन उपयोगी वितरण सेवाओं को लोड शेडिंग करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिसके कारण कृषि और गैर-कृषि उपभोक्ताओं के लिए विद्युत की आपूर्ति प्रभावित होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त विद्युत न मिलने के कारण कृषि कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इससे किसानों को बहुत हानि होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों की विद्युत समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए केन्द्र सरकार ने दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना बनाई है। इसका उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को निरंतर बिजली की आपूर्ति प्रदान करना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 नवंबर, 2014 को इसे प्रारंभ किया। इस योजना के अंतर्गत सरकार ने 1000 दिनों के भीतर 1 मई,  2018 तक 18,452 अविद्युतीकृत गांवों का विद्युतीकरण करने का निर्णय लिया है। इस योजना के लिए कुल 43 हजार 33 करोड़ के निवेश की आवश्यकता है। योजना की पूरी अवधि में केन्द्र सरकार 33 हजार 4 सौ 53 करोड़ रुपये की सहायता देगी। यह योजना मौजूदा राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को प्रतिस्थापित करेगी, किन्तु राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना की सुविधाओं को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना की नई योजना में सम्मिलित किया गया है और राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की बची हुई राशि को इसमें सम्मिलित किया जाएगा। यह योजना विद्युत मंत्रालय के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक है और बिजली की निर्बाध आपूर्ति की सुविधा को बेहतर बनाएगी। इसससे 24 घंटे बिजली की आपूर्ति में सहायता मिलेगी।

इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं गैर कृषि उपभोक्ताओं की आपूर्ति को सही तरीके से बहाल करने के लिए कृषि और गैर कृषि फीडरों का पृथक्करण किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रांसफार्मर / फीडरों / उपभोक्ताओं की नपाई सहित उप-पारेषण और वितरण की आधारभूत संरचना का सुदृढ़ीकरण एवं आवर्धन होगा। इसके अतिरिक्त राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत पहले से ही स्वीकृत माइक्रो ग्रिड और ऑफ ग्रिड वितरण नेटवर्क एवं ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजनाओं को पूरा किया जाना है।

मौजूदा राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में समाहित किया गया है। सभी डिस्कॉम इस योजना के तहत वित्तीय सहायता के पात्र हैं। इस योजना के अंतर्गत निजी डिस्कॉम और राज्य के विद्युत विभागों सहित सभी डिस्कॉम वित्तीय सहायता के पात्र हैं। डिस्कॉम ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने लिए विशिष्ट नेटवर्क की आवश्यकता को प्राथमिकता देंगे और योजना के तहत कवरेज के लिए परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करेंगे। ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड योजना के कार्यान्वयन और संचालन के लिए नोडल एजेंसी है। यह विद्युत मंत्रालय और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण को इस योजना के कार्यान्वयन पर वित्तीय और भौतिक दोनों प्रगति को दर्शाते हुए मासिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। समय-समय पर इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक सभी दिशा निर्देशों और स्वरूपों को अधिसूचित किया जाएगा। निगरानी समिति को प्रस्तुत करने से पूर्व विस्तृत परियोजना रिपोर्ट का मूल्यांकन करना होगा। स्वीकृति के लिए निगरानी समिति की बैठकों का आयोजन करने के लिए संबंधित सभी काम संचालित करना होगा। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के प्रस्तुतीकरण और परियोजनाओं के मासिक आय योजना को संधारित करने के लिए एक समर्पित वेब पोर्टल का विकास किया जाएगा। साथ ही कार्यों की गुणवत्ता सहित परियोजनाओं की भौतिक और वित्तीय प्रगति की निगरानी भी सुनिश्चित की जाएगी। 

इस योजना से ग्रामीणों विशेषकर किसानों को बहुत लाभ होगा। सभी गांवों और घरों का विद्युतीकरण किया जाएगा। किसानों को पर्याप्त विद्युत उपलब्ध होने से वे समय पर कृषि कार्य कर पाएंगे। समय पर खेतों की सिंचाई हो सकेगी, जिससे कृषि उपज में वृद्धि होगी। इसके साथ ही छोटे और कुटीर उद्यमों का विकास होगा और इससे रोजगार के नये अवसर उपलब्ध होंगे। विद्युत से स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग सेवाओं में सुधार होगा। विद्युत होगी, तो गांवों में रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन, इंटरनेट सेवाओं का भी विस्तार होगा। इसके अलावा स्कूलों, पंचायतों, अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों को भी पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी। बिजली पर्याप्त की उपलब्धता के कारण सामाजिक विकास होगा।  

निगरानी समिति परियोजनाओं को स्वीकृति देगी और इस योजना के कार्यान्वयन की निगरानी करेगी। योजना के अंतर्गत निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार इस योजना के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए विद्युत मंत्रालय, राज्य सरकार और डिस्कॉम के बीच उपयुक्त त्रिपक्षीय समझौते को निष्पादित किया जाएगा। राज्य विद्युत विभागों के मामलों में द्विपक्षीय समझौते को निष्पादित किया जाएगा।  परियोजना को टर्नकी आधार पर लागू किया जाएगा। खुली प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित मूल्य के आधार पर टर्नकी अनुबंध प्रदान किया जाएगा। निगरानी समिति द्वारा अनुमोदन की सूचना के तीन महीने के भीतर परियोजनाओं को सम्मानित किया जाना है। असाधारण परिस्थितियों में निगरानी समिति के अनुमोदन के साथ आंशिक टर्नकी / विभागीय आधार पर निष्पादन अनुमति दी जाएगी। इस योजना के अंतर्गत परियोजनाओं को कार्य पत्र जारी होने की तिथि से 24 महीने की अवधि के भीतर पूरा कर लिया जाना सुनिश्चत किया गया है।

इस योजना का अनुदान भाग विशेष श्रेणी के राज्यों के अलावा अन्य राज्यों के लिए 60 प्रतिशत (निर्धारित मील के पत्थर की उपलब्धि पर 75 प्रतिशत तक) और विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 85 प्रतिशत (निर्धारित मील के पत्थर की उपलब्धि पर 90 प्रतिशत तक) है। अतिरिक्त अनुदान के लिए मील के पत्थर योजना को समय पर पूरा करना, प्रति प्रक्षेपवक्र समग्र तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानि में कमी और राज्य सरकार द्वारा अनुदान का अग्रिम रिलीज हैं। सभी पूर्वोत्तर राज्यों सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित को विशेष राज्यों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया हैं।

इस परियोजना को मिशन मोड के आधार पर लिया गया है और विद्युतीकरण के लिए कार्यान्वयन सारणी को 12 महीने की समय सीमा में सीमित करना एवं ग्राम विद्युतीकरण प्रक्रिया को निगरानी के लिए निर्धारित समय सीमा के 12 चरणों के मील के पत्थर में विभाजित किया गया है। अप्रैल 2015 से 14 अगस्त, 2015 तक कुल 1654 गांवों को विद्युतीकृत किया गया और केन्द्र सरकार द्वारा मिशन मोड रूप में पहल करने के बाद 15 अगस्त, 2015 से 17 अप्रैल, 2016 तक 5689 अतिरिक्त गांवों को विद्युतीकृत किया गया। प्रगति में और तेजी लाने के लिए ग्राम विद्युत अभियंता के माध्यम से निगरानी की जा रही है एवं मासिक आधार पर प्रगति की समीक्षा, योजना और निगरानी की बैठक आयोजित की जा रही है। राज्य डिस्कॉम के साथ विद्युतीकरण के स्तर पर वाले गांवों की सूची साझा करने का कार्य भी चल रहा है। ऐसे गांवों की पहचान की जा रही है, जहां प्रगति में देरी हो रही है। 

वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत की आपूर्ति करने वाली वितरण कम्पनियों की वित्तीय हालत खराब होने के कारण वितरण नेटवर्क में निवेश कम हुआ है। विश्वसनीयता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आपूर्ति-वितरण नेटवर्क को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। बिजली वितरण की व्यावसायिक व्यवहारिकता में सुधार के लिए उपभोक्ताओं की सभी श्रेणियों की मीटरिंग करने की आवश्यकता है।
निसंदेह दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त विद्युत पहुंचाई जा सकेगी और ग्रामों में उजियारा हो जाएगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Wednesday, August 19, 2026

नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की क्षेत्रीय टोली बैठक सम्पन्न







लखनऊ। विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश की नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की क्षेत्रीय टोली की बैठक निराला नगर, लखनऊ में सम्पन्न हुई। बैठक के समापन सत्र में डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि विद्या भारती का उद्देश्य बालकों में भारत-केंद्रित शिक्षा का संचार, नैतिक मूल्यों का विकास और आध्यात्मिक भाव की जागृति करना है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है। भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कार, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से जुड़ी शिक्षा बालकों को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।

डॉ. मालवीय ने कहा कि नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में सत्य, अनुशासन, सेवा, संवेदना, कर्तव्यबोध और राष्ट्रनिष्ठा जैसे जीवन-मूल्यों का विकास किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विद्या भारती इसी दृष्टि के साथ शिक्षा को संस्कार और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।

बैठक में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा को विद्यालयों में अधिक प्रभावी एवं व्यवहारिक रूप से लागू करने, आचार्यों के प्रशिक्षण तथा विद्यार्थियों में भारतीय जीवन-दृष्टि के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई।

परम्परागत खेती विकास योजना : जैविक खेती से लहलहाएंगी फसलें

देश में प्राचीन काल से ही जैविक खेती की जाती रही है। भारत परम्परागत रूप से विश्व का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश है। अब भी देश के बहुत बड़े भू–भाग में परम्परागत ज्ञान के आधार पर जैविक खेती की जाती है। जैविक खादों पर आधारित पारम्परिक खेती को जैविक खेती कहा जाता है। बदलते समय के साथ कृषि भूमि कम होने लगी और बढ़ती जनसंख्या का भार सीमित कृष क्षेत्र पर आ गया। ऐसी स्थिति में अधिक से अधिक उत्पादन लेने की होड़ लग गई। रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा। इससे उत्पादन तो बढ़ गया, परंतु दिनों-दिन भूमि की उर्वरा शक्ति कम होने लगी। निसंदेह रासायनिक उर्वरकों के कारण उत्पादन बढ़ा, किन्तु इस तरह अधिक समय तक खेती नहीं की जा सकती। इसे देखते हुए पारम्परिक जैविक खेती और भी महत्वपूर्ण हो गई है। आज विश्व भर में जैविक खाद्य के लिए मांग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। जैविक खेती की तकनीक को बढ़ावा मिलने से देश इन खाद्य पदार्थों के विशाल निर्यात की संभावनाओं को साकार कर सकता है। इस सबको ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना शुरू की है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का एक सविस्तारित घटक है। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत जैविक खेती को क्लस्टर पद्धति और प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा वर्ष 2015-16 से एक नई परम्परागत कृषि विकास योजना का शुभारम्भ किया गया है। इस योजना का उद्देश्य जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण और विपणन को प्रोत्साहन करना है। इस योजना के अंतर्गत सम्मिलित घटक सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली या प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली को सुदृढ़ता प्रदान करने के तारतम्य में हैं। इसी दिशा में भारत सरकार कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा क्षेत्रीय परिषद के रूप में राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र गाजियाबाद से पंजीयन करवाकर, प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली लागू करने संबंधी कार्यवाही के लिए जिला आतमा (एटीएम) समितियों को अधिकृत किया गया है। योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये एवं तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। इन रुपयों का इस्तेमाल किसानों को जैविक खेती के बारे में बताने के लिए होने वाली बैठक, एक्सपोजर विजिट, प्रशिक्षण सत्र, ऑनलाइन पंजीकरण, मृदा परीक्षण, जैविक खेती व नर्सरी की जानकारी, लिक्विड बायोफर्टीलाइजर, लिक्विड बायो पेस्टीसाइड उपलब्ध कराने, नीम तेल, बर्मी कंपोस्ट और कृषि यंत्र आदि उपलब्ध कराने पर किया जाएगा। वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन एवं उपयोग, बायोफर्टीलाइजर और बायोपेस्टीसाइड के बारे में प्रशिक्षण, पंच गव्य के उपयोग और उत्पादन पर प्रशिक्षण आदि इसके साथ ही जैविक खेती से पैदा होने वाले उत्पाद की पैकिंग एवं परिवहन के लिए भी अनुदान दिया जाएगा।

इस योजना का उद्देश्य प्रमाणित जैविक खेती के माध्यम से वाणिज्यिक जैविक उत्पादन को बढ़ावा देना है। उपज को कीटनाशक मुक्त करके उपभोक्ता को पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। जैविक खेती से किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और व्यापारियों को भी बाजार उपलब्ध होगा। इसके साथ ही यह योजना उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधन जुटाने के लिए भी किसानों को प्रेरित करेगी। किसान प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करके भरपूर और उन्नत फसल उगा सकेंगे। 

परम्परागत कृषि विकास योजना पहली व्यापक योजना है, जिसका कार्यान्वयन प्रति 20 हैक्टेयर के क्लस्टर आधार पर राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। किसान हित समूहों को जैविक खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। क्लस्टर के अंतर्गत किसानों को अधिकतम एक हैक्टेयर तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। जैविक खेती का काम शुरू करने के लिए 50 या उससे अधिक ऐसे किसान एक क्लस्टर बनाएंगे, जिनके पास 50 एकड़ भूमि होगी। इस तरह तीन वर्षों के दौरान जैविक खेती के तहत 10 हजार क्लस्टर बनाए जाएंगे, जो पांच लाख एकड़ के क्षेत्र को कवर करेंगे। प्रमाणीकरण पर व्यय के लिए किसानों पर कोई भार या दायित्व नहीं होगा। फसलों की बुआई के लिए, बीज खरीदने और उपज को बाजार में पहुंचाने के लिए हर किसान को तीन वर्षों में प्रति एकड़ 20 हजार रुपये दिए जाएंगे। परम्परागत संसाधनों का उपयोग करके जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा और जैविक उत्पादों को बाजार के साथ जोड़ा जाएगा। यह किसानों को शामिल करके घरेलू उत्पादन और जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण को बढ़ाएगा। 

उल्लेखनीय है कि देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती हो रही है, जिसमे परंपरागत कृषि विकास योजना से 3,60,400 किसान को लाभ पहुंचा है। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों में जैविक कृषि के अंतर्गत 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। नवंबर, 2017 तक 45863 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक योग्य क्षेत्र में परिवर्तित किया जा चुका है और 2406 किसान समूहों का गठन कर लिया गया है, 2500 किसान हित समूह लक्ष्य के मुकाबले 44064 किसानों को योजना से जोड़ा जा चुका है। 

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के अनुसार विश्व के कुछ वैज्ञानिक इसे 'डिफाल्ट ऑर्गेनिक' कहते हैं, लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि जो किसान परंपरागत रूप से जैविक खेती कर रहे हैं, यह उनकी मजबूरी नहीं, उनकी पसंद है। बेहद गहरी समझ के साथ वे इस रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं। आज, वे रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते तो यह उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर ऐसा न करने का निर्णय किया है। इसलिए उनकी इस खेती की विधि को 'बाई डिफाल्ट' नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले कुछ दशकों में खेतों में रासायनिक खाद के अंधाधुंध उपयोग ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि इस तरह हम कितने दिन खेती कर सकेंगे? रासायनिक खाद युक्त खेती से पर्यावरण के साथ सामाजिक-आर्थिक और उत्पादन से जुड़े मुद्दे भी हैं, जो हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। अब देश में खाद्य आपूर्ति की कोई समस्या नही है, लेकिन देश की बढ़ती जनसंख्या को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण चुनौती का कार्य अभी शेष है, हमारी निर्भरता रासायनिक खेती पर हो गई है, जिसमें हम रासायनिक उर्वरक, कीट-रोग नाशी एवं अन्य रसायनों का प्रयोग करके उत्पादन तो बढ़ गया, लेकिन अनियंत्रित उपयोग से असुरक्षित खाद्यान्न उत्पन्न करने की समस्या पनप गई है।

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के अनुसार परम्परागत खेती विकास योजना के अधीन 29 राज्यों और एक संघ राज्य क्षेत्र की वार्षिक कार्य योजना 7186 क्लस्टर विकसित करने के लिए कुल 511.76 करोड़ रूपये के कुल परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है, जिसमें से वर्ष 2015-16 के दौरान राज्यो को 226 करोड़ रूपये निर्मुक्त किए गए। वर्ष 2016-17 के दौरान उपयोग में लाए जाने के लिए 2814 कलस्टरों के निर्माण के लिए 10 हजार कलस्टरों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केन्द्रीय प्रोयोजित योजना के रूप में परम्परागत कृषि विकास योजना के लिए वर्ष 2016-17 के लिए 297 रूपये की राशि आवंटित की गई।

उत्तर प्रदेश में परम्परागत कृषि विकास योजना वर्ष 2015-16 से प्रारंभ हुई और 28750 एकड़ मे 28750 किसान को लाभ पहुंचा है। केन्द्र सरकार की परम्परागत खेती विकास योजना के अंतर्गत पथम चरण में बुंदेलखंड के सभी जिलों समेत उत्तर प्रदेश के 15 जिलों को इसमें शामिल किया गया है। पहले चरण में यह योजना तीन वित्तीय वर्ष के लिए बनाई गई है। इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए गैर सरकारी संगठन का चयन किया गया है। क्लस्टर को जैविक खेती की पूरी जानकारी के साथ-साथ बेहतर क्रियान्वयन की तकनीक और तमाम संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। पूरे प्रदेश में 28,750 एकड़ भूमि का चयन किया गया और 575 क्लस्टर बनाए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए  जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये व तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की मदद प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। 
किसानों के जैविक उत्पादों के विपणन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पांच लाख रुपये प्रति जनपद को देकर बिक्री केन्द्र खुलवा रही है। इस योजना के तहत वर्ष 2015-16 में केन्द्र ने उत्तर प्रदेश को 2052.20 करोड़ की राशि दी, लेकिन इसमें से खर्च केवल 1075.692 करोड़ रुपये हुए। वर्ष 2016-17 में केन्द्र अब तक इस मद में उत्तर प्रदेश को 1270.64 करोड़ रुपये दे चुका है।

कृषि मंत्री के अनुसार वर्ष 2016 में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत उत्तराखंड में गंगा की धारा से लेकर पश्चिम बंगाल तक 1657 ग्राम पंचायतों में नमामि गंगे परियोजना के तहत परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1657 क्लस्टर में जैविक खेती विकसित की जाएगी। इस परियोजना के अंतर्गत कृषि मंत्रालय क्लस्टर निर्माण के साथ एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और माइक्रो सिचाई तकनीक पर प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराएगा। 

यदि हम इन रासायनिक आदानो के अंधाधुंध प्रयोग द्वारा पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों का विश्लेषण करें, तो पता चलेगा कि इन सारे रासायनिक पदार्थों का बड़ा भाग मिट्टी, भू-जल, हवा और पौधों में समाविष्ट हो जाता है। ये रसायन छिडकाव के समय वायु के साथ दूर तक अन्य पौधों को प्रदूषित कर देते हैं। भूमि में प्रवेश करने वाले ये रसायन भू-जल में मिलकर, पानी के अन्य स्रोतो को भी प्रदूषित कर देते हैं। रसायनों के दुष्प्रभाव से विश्व में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, और मानवों पर भी गंभीर दुष्प्रभाव देखे गए हैं। धरती मां के स्वास्थ्य, सतत उत्पादन, आमजन को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान के लिए जैविक कृषि आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता है।

निसंदेह जैविक खेती से न केवल भूमि की उर्वरता बनी रहेगी, अपितु खाद्यान्न भी विषैले होने से बच जाएंगे.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : हर खेत को मिलेगा पानी


जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। हर प्राणी को जीवित रहने के लिए जल चाहिए। खेती-किसानी के लिए भी जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। देश के अधिकतर किसानों को अपनी फसल की संचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। देश के अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र को ही होती है। इसके कारण इन क्षेत्रों में सूखे की समस्या है। इनमें देश का उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण के पठार सम्मिलित हैं। लगातार गिरते भू-जल स्तर ने भी सिंचाई जल संकट उत्पन्न कर दिया है। देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत में सिंचाई सुविधा नहीं है। 

खराब मानसून से किसानी को राहत पहुचाने के लिए प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्य देश के हर खेत तक किसी न किसी माध्यम से सिंचाई सुविधा सुनिश्चित करना है, ताकि जल का अधिक से अधिक सदुपयोग कर अधिक फसल ली जा सके। इसमें पांच वर्षों 2015-16 से 2019-20 के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया गया है। इस निवेश से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना कार्यक्रम में पूरी आपूर्ति श्रंखला अर्थात जल स्त्रोत, वितरण नेटवर्क तथा फार्म स्तर के अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित करके एकीकृत विकास की कल्पना की गई हैं। वर्ष 2015-16 के दौरान लघु सिंचाई के तहत 8.0 लाख हेक्टेयर क्षेत्र लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। दिसंबर 2019 तक 99 मुख्य और माध्यम सिंचाई को मिशन मोड़ में पूरा किए जाने का भी निर्णय लिया गया हैं। इसके अतिरिक्त 76.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचाई के अंतर्गत लाया जा सकेगा। इससे सिंचाई में निवेश में एकरूपता लाई जा सकेगी। ’हर खेत को पानी’ के अंतर्गत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए, खेतों में ही जल को इस्तेमाल करने की दक्षता को बढ़ाना देना है, ताकि पानी के अपव्यय को कम किया जा सके। साथ ही सही सिंचाई और पानी को बचाने की तकनीक को अपनाना जा सके। इसके अतिरिक्त इसके माध्यम से सिंचाई में निवेश को आकर्षित करने का भी प्रयास किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 में रुपये 125.17 करोड़ की लागत से 23 बड़े और माध्यम सिंचाई परियोजनाओं को पूरा किए जाने का निर्णय लिया गया था। लगभग 20 हजार करोड़ की धनराशि से नाबार्ड में एक लम्बी अवधि सिंचाई कोष का सर्जन किया जाएगा।  

इस योजना के उद्देश्यों की उपलब्धि के लिए विशेषकर तीन मंत्रालयों जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा कृषि मंत्रालय के सहभागिता द्वारा विभिन्न कार्यक्रम चलाए जाते हैं। समेकित पनधारा प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण विकास मंत्रालय मुख्य रूप से मृदा एवं जल संरक्षण के लिए छोटे तालाब, जल संचयन संरचना के साथ-साथ छोटे बांधों तथा सम्मोच्च मेढ़ निर्माण आदि कार्यों का क्रियान्वयन राज्य सरकार के माध्यम से करेगा। इसके लिए वर्ष 2015-16 में 1500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय संरक्षित जल को खेत तक पहुंचाने के लिए नाली इत्यादि विकास के साथ-साथ त्वरित सिंचाई लाभ संबंधी कार्यक्रम समयबद्ध तरीके से पूर्ण करेगा। इसके अंतर्गत निम्न स्तर पर जल निकाय सृजन, नदियों में लिफ्ट सिंचाई योजना, जल वितरण नेटवर्क तथा उपलब्ध जलस्रोतों के मरम्मत, पुन: भंडारण तथा सृजन का कार्य मुख्य रूप से किया जाएगा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत पांच लाख कृषि तालाबों और कुओं का निर्माण प्रस्तावित है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत पांच लाख कृषि तालाबों और कुओ का निर्माण प्रस्तावित है। इन कार्यों के लिए वर्ष 2015-16 के लिए 2000 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है। 

कृषि मंत्रालय, कृषि एवं सहकारिता विभाग, वर्षाजल संरक्षण, जल बहाव नियंत्रण कार्य, जल उपलब्धता के अनुसार फसल उत्पादन, कृषि वानिकी, चारागाह विकास के साथ-साथ कृषि जीविकोपार्जन के विभिन्न कार्यक्रमों को भी चलाया जाएगा। जल प्रयोग क्षमता बढ़ाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई योजना ड्रिप, स्प्रिंकलर, रेनगन आदि का उपयोग विभिन्न फसलों की सिंचाई के लिए किया जाएगा। इस सभी कार्यक्रमों को चलाने के लिए वर्ष 2015-16 के लिए 1800 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। इस योजना के अंतर्गत कृषि-जलवायु की दशाओं और पानी की उपलब्धता के आधार पर जिला और राज्य स्तरीय योजनाएं बनाई जाएंगी। इसके अंतर्गत हर खेत तक सिंचाई जल पहुंचाने के लिए योजनाएं बनाने एवं उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया में राज्यों को अधिक स्वायत्ता तथा धन के इस्तेमाल की सुविधा दी गई है। इस योजना में केंद्र 75 प्रतिशत अनुदान देगा और 25 प्रतिशत खर्च राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र और पर्वतीय राज्यों में केंद्र का अनुदान 90 प्रतिशत तक होगा। 

राष्ट्रीय स्तर पर पीएमकेएसवाई योजना की निगरानी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सभी संबंधित मंत्रालयों के मंत्रियों के साथ एक अंतर मंत्रालयी राष्ट्रीय संचालन समिति द्वारा की जाएगी। कार्यक्रम के कार्यान्वयन संसाधनों के आवंटन, अंतर मंत्रालयी समन्वय, निगरानी और प्रदर्शन के आकलन के लिए नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय कार्यकारी समिति गठित की जाएगी। राज्य के स्तर पर योजना का कार्यान्वयन संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय स्वीकृति देने वाली समिति द्वारा किया जाएगा। इस समिति के पास परियोजना को स्वीकति देने और योजना की प्रगति की निगरानी करने का पूरा अधिकार होगा। कार्यक्रम को और बेहतर ढंग से लागू करने के लिए जिला स्तर पर जिला स्तरीय समिति भी होगी। इस योजना के अंतर्गत उन कार्यकर्मों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जाता है, जिनसे किसानों को लाभ होता है। किसान अपनी सुविधानुसार बेहतर सिंचाई जल योजना अपना सकते हैं। वे ड्रिप, स्प्रिकलर सिंचाई योजनाओं आदि उपयोग कर सकते हैं। किसानों को इन तकनीकों की जानकारी अपने जिले के कृषि/बागवानी अधिकारी से प्राप्त हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त किसान टोल फ्री किसान कॉल सेंटर 1800-180-1551 से भी जानकारी ले सकते हैं। कृषि समन्वय एवं किसान कल्याण विभाग को वर्ष 2016-17 में सूक्ष्म सिंचाई के लिए 2340 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया हैं, जो वर्ष 2015-16 के 1550 करोड़ रुपये के बजट से 51 प्रतिशत अधिक हैं।

इस योजना के अंतर्गत “हर खेत को पानी” यानि प्रत्येक किसान के खेत मे सिंचाई की सुविधा और फसल की ‘जल उपयोग दक्षता’ को बढाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। सरकार जल संरक्षण और क्षेत्रीय स्तर पर सिंचाई के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने तथा इसके प्रबंधन के लिए प्रतिबद्ध है। सुनिश्चित सिंचाई के तहत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार, खेत में पानी के संरक्षण के लिए इसकी उपयोग दक्षता में सुधार, परिशुद्ध सिंचाई तथा पानी के बचत के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, जलवाही स्तर के पुनर्भरण बढ़ाने, अर्धशहरी कृषि के लिए नगरपालिका के अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग की व्यवहार्यता की खोज तथा टिकाऊ और स्थाई जल संरक्षण के उपायों को लागू करने पर बल दिया जा रहा है, जिससे सिंचाई परियोजनाओं मे निजी निवेश भी अधिक से अधिक आकर्षित हो रहे है।

उल्लेखनीय है कि भारत में विश्व की आबादी की 17 प्रतिशत जनसंख्या तथा 11.3 प्रतिशत पशुधन निवास करते हैं, जबकि देश में विश्व का मात्र 4 प्रतिशत जल संसाधन उपलब्ध है। ऐसे में देश के समक्ष इतनी बड़ी मानव आबादी तथा पशुधन को पानी की आपूर्ति करने की अभूतपूर्व चुनौती है। ऐसे में समुचित जल प्रबंधन करके ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। सरकार द्वारा समय-समय पर जल संरक्षण से संबंधित कार्यकर्मों का भी आयोजन कराया जाता है, ताकि लोगों में जल संरक्षण और जल प्रबंधन के प्रति जागरुकता पैदा की जा सके। निसंदेह, बेहतर जल प्रबंधन से ही जल संकट से उबरा जा सकता है और संरक्षण भी किया जा सकता है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना : स्वस्थ धरा से होगा खेत हराभरा


उपजाऊ कृषि भूमि से ही अच्छी फसल मिलती है, लेकिन उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण कृषि भूमि निरंतर बंजर होती जा रही है। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो गई है। मिट्टी की उत्पादन क्षमता कम होने लगी है। इसका सीधा प्रभाव कृषि उत्पाद पर पड़ रहा है। उत्तराखंड के देहरादून स्थित मृदा जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के अनुसार एश में पिछले कुछ वर्षों में उर्वरकों, कीटनाशकों और कीटनाशक दवाइयों के अत्यधिक प्रयोग के कारण प्रत्येक वर्ष 5334 लाख टन मिट्टी नष्ट हो रही है। दूसरे शब्दों में औसतन 16.4 टन प्रति हेक्टेयर उपजाऊ मिट्टी प्रत्येक वर्ष समाप्त हो रही है। कृषि जगत के लिए यह बहुत चिंता का विषय है, क्योंकि जब मिट्टी ही नहीं होगी, तो खेती कैसे होगी।

ऐसी स्थिति में नियमित अंतरालों पर मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में आकलन करने की आवश्यकता है, ताकि मिट्टी में पहले से ही मौजूद पोषक तत्वों का लाभ उठाते हुए किसान अपेक्षित पोषक तत्वों का प्रयोग सुनिश्चित कर सकें। केंद्र सरकार राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना नामक योजना चला रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 फरवरी, 2015 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ में इस योजना का शुभारंभ किया था। उन्होंने ’स्वस्थ धरा, खेत हरा’ का नारा दिया है, जिसका अर्थ स्वस्थ भूमि और हरित खेत है। उन्होंने पूरे देश में कृषि क्षेत्र में मिट्टी के स्वास्थ्य पर ध्यान देने का आह्वान किया, ताकि उतपादका बढ़ाई जा सके और समृद्धि लाई जा सके। स्वथ्य भूमि के लिए उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता है। उन्होंने वंदे मातरम गान की चर्चा करते हुए कहा कि भूमि को सुजलाम-सुफलाम बनाने के लिए मिट्टी का पोषण आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना इस दिशा में लाई गई है। उन्होंने मिट्टी के नियमित परीक्षण का आह्वान करते हुए कहा कि छोटे शहरों में भी उद्यमी मृदा परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित कर सकते हैं। 

उल्लेखनीय है कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिशन के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। इस कार्ड में खेतों के लिए अपेक्षित पोषण/ उर्वरकों के बारे में फसलवार सिफारिशें की जाएंगी, ताकि किसान उपयुक्त आदानों का उपयोग करते हुए उत्पादकता में सुधार कर सकें। फसल के लिए सबसे आवश्यक तत्व मिट्टी है। यदि मिट्टी की गुणवत्ता ही सही नहीं होगी, तो फ़सल भी उन्नत और भरपूर नहीं हो सकती। इसलिए सरकार ने किसानों के लिए यह कार्ड जारी किया है। इस योजना के अंतर्गत तीन वर्ष के अंदर पूरे भारत में लगभग 14 करोड़ किसानों को यह कार्ड जारी करने का उद्देश्य रखा गया है। इसके लिए अलग से 568.54 करोड़ रूपये का बजट भी रखा गया है।  

सरकार बंजर हो रही भूमि के प्रति अत्यधिक गंभीर है। इस योजना के अंतर्गत मिट्टी के नमूने का पूरी तरह से निरिक्षण किया जाएगा। पूरा निरिक्षण करने के बाद मृदा स्वास्थ्य कार्ड में रिपोर्ट तैयार की जाएगी। सबसे पहले अलग-अलग खेतों की मिट्टी के नमूनों को एकत्रित किया जाएगा। इसके बाद इसे लैब में परिक्षण के लिए भेजा जाएगा और लैब के अंदर विशेषज्ञ इसकी अच्छी तरत से जांच करेंगे। इसके बाद विशेषज्ञ कांच के परिणाम का विश्लेषण करेंगे। फिर वे विभिन्न मिट्टी के नमूनों के गुणों और कमियों की सूची बनाएंगे। यदि मिट्टी में कुछ कमी है, तो उसके सुधार के लिए सुझाव देंगे और उसकी एक सूची बनाएंगे। इसके बाद सरकार किसानों के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड में पूरी जानकारी छापेगी। यह जानकारी इस तरीके से दी जाएगी, जिससे किसान इसे आसानी से अच्छी तरह से समझ सकें। फिर किसानों को एक मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिया जाएगा, जिसमें किसानों के भूमि की मिट्टी की विशेषताओं के बारे में जानकारी होगी कि मिट्टी की कार्यात्मक विशेषताएं क्या हैं, मिट्टी में पानी और विभिन्न पोषक तत्वों की उपलब्धता कैसी है। यदि मिट्टी में अतिरिक्त गुण पाए जाते हैं, तो कार्ड में उसकी अलग सूची दी जाएगी। कुछ सुधार के उपाय बताए जाएंगे, जिससे किसान अपनी मिट्टी की कमियों को सुधारने के लिए आवश्यक उपाय कर सकें। उन्हें एक सूची दी जाएगी कि उनकी भूमि में किस प्रकार की फसल अच्छे से उग सकती है, जिससे उन्हें अधिकतम लाभ हो। इसके अतिरिक्त उन्हें यह भी बताया जाएगा कि उनके खेत की मिट्टी में क्या सुधार करने की आवश्यकता है। वास्तव में मृदा स्वास्थ्य कार्ड, एक प्रकार का रिपोर्ट कार्ड है, जो मिट्टी के गुण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेगा। यह मिट्टी के प्रकार के बारे में, पोषक तत्व सामग्री, आवश्यक खाद, फसल के लिए उपयुक्त तापमान और वर्षा की स्थिति आदि के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराएगा। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खाद के उपयोग से मिट्टी के आधार और संतुलन को बढ़ावा देना है, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पाद प्राप्त हो सके। यह रिपोर्ट किसानों को उनके खेत या भूमि के लिए तीन वर्ष में एक बार दी जाएगी। 

यह योजना किसानों के लिए बहुत ही लाभदायक है। देश के कई राज्यों में किसानों को उनकी मिट्टी के बारे में रिपोर्ट पहले से ही दी जा रही थी। कुछ किसान शिक्षित थे, जो अपनी मिट्टी के गुण-दोषों को अच्छे समझ सकते थे। लेकिन देश में ऐसे बहुत से अशिक्षित किसान है, जो यह नहीं जानते कि उनके खेत की मिट्टी किस प्रकार की है। उन्हें अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए किस तरह की फसलों को विकसित करना चाहिए। इसलिए पूरे देश में इस योजना को लागू करना अत्यधिक आवश्यक था। इस योजना के कारण अब किसान मिट्टी की प्रकृति की जानकारी के साथ यह भी समझ पाएंगे कि उन्हें कौन-सी फसल उगानी चाहिए, उर्वरक और कीटनाशक की संतुलित मात्रा क्या होनी चाहिए। अधिकतर किसान अपने अनुभव के आधार पर ही मिट्टी के गुण-दोष, फसलों का बढ़ना आदि जानते हैं। मगर अधिकतर किसान यह नहीं जानते कि मिट्टी की स्थिति को कैसे सुधारा जा सकता है। इसके कारण उन्हें समस्या का सामना करना पड़ता है. 

किसानों की मदद के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड एप लांच किया गया है। इस ऐप से क्षेत्र स्तर के कार्यकर्ताओं को लाभ होगा। नमूना संग्रह के समय खेत से नमूना पंजीकरण विवरण इकट्ठा करने में यह मोबाइल ऐप स्वचालित रूप से जीआईएस समन्वय को एकत्रित करता है और उस स्थान को इंगित करता है, जहां से क्षेत्र के कार्यकर्ताओं द्वारा मिटटी का नमूना लिया जाता है। यह ऐप राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए विकसित अन्य जियोटैंगिग ऐप की तरह काम करता है। ऐप में किसानों के नाम, आधार कार्ड नंबर, मोबाइल नंबर, लिंग, पता, फसल विवरण आदि दर्ज होता है। इसके अतिरिक्त स्वायल हेल्थ कार्ड पोर्टल को अब समेकित उर्वरक प्रबंधन सिस्टम से जोड़ दिया गया है और मृदा स्वास्थ्य कार्ड सिफारिश के अनुसार उर्वरकों के वितरण का कार्य पॉयलेट आधार पर कई जिलों में शुरू कर दिया गया है। 
उल्लेखनीय है कि शुरू में मृदा स्वास्थ्य कार्ड 14 स्थानीय भाषाओं में तैयार किए जा रहे थे, लेकिन अब कुमाऊनी, गढ़वाली, खासी, गारो जैसी स्थानीय बोलियों में भी कार्ड तैयार किए जा रहे हैं, ताकि इन बोलियों को बोलने वाले किसानों को उनकी अपनी बोली में कार्ड मिल सकें।

नियमित रूप से मिट्टी की जांच होने से किसानों को लम्बे समय तक मिट्टी को स्वस्थ रखने का रिकॉर्ड पाने में सहायता मिलेगी। इसके अनुसार वे इसका अध्ययन कर अलग मिट्टी के प्रबंधन के तरीकों के परिणामों का मुल्यांकन कर सकेंगे। यह कार्ड किसानों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इससे किसान अपने खेत की मिट्टी को सुधार सकेंगे। उर्वरकों और केटनाशकों की संतुलित मात्रा का प्रयोग करते हुए अधिक पैदावार ले सकेंगे। समय पर खेत की मिट्टी का उपचार होने के कारण कृषि भूमि बंजर होने से भी बच जाएगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना : किसानों को आस बंधी

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां अधिकतक ग्रामीण कृषि पर आश्रित हैं। कृषि किसानों का मुख्य व्यवसाय है, परंतु प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं अथवा ...