Friday, July 17, 2026

यह लोकतंत्र का युग है

   


नई दिल्ली में 17 अगस्त, 1994 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित गया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या कहूं. प्रसंग ही ऐसा है. कुछ कहना भी मुश्किल है, लेकिन बिना कहे रहना भी मुश्किल है. औरों के सम्मान समारोहों में बोलना सरल है, अपने कार्यक्रम में शब्दों को ढूंढना भी कठिन है. मैं आभारी हूं उप राष्ट्रपति महोदय आपका, प्रधानमंत्री जी का, लोकसभा अध्यक्ष का, निर्णायकों का, पंडित गोविंद वल्लभ पंत समारोह ट्रस्ट का, जिन्होंने मुझे इस सम्मान के लिए चुना है.

मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं. मुझे अपनी कमियों का अहसास है. निर्णायकों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजरअंदाज करके मुझे निर्वाचित किया है. सदभाव में अभाव दिखाई नहीं देता है. यह देश बड़ा अदभुत है, बड़ा अनूठा है. किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनंदन किया जा सकता है. 

गत वर्ष यह सम्मान मेरे मित्र वरिष्ठ सांसद कामरेड इंद्रजीत जी गुप्त को दिया गया था. वे सब दृष्टियों से सम्मान के अधिकारी थे. मेरे बारे में यह बात नहीं कही जा सकती. अब उनके बाद मुझे सम्मान दिया जा रहा है. मुझे डर है कि कोई यह न समझे कि मैं उनके पीछे पड़ गया हूं.

स्वनामधन्य पंडित गोविंद वल्लभ पंत को मैंने निकट से देखा था. उनके संपर्क में आने का मुझे सौभाग्य मिला था, पहले लखनऊ में, फिर दिल्ली में. जब वे आधुनिक उत्तर प्रदेश के शिल्प का गठन कर रहे थे, तो मैं उनके शब्द-चित्रों का गठन किया करता था. उनका जैसा व्यक्तित्व था, वैसा ही कीर्तिमान स्थापित करने वाला कर्तृत्व था. उनका प्रकांड पांडित्य, उनकी वाग्मयी संसदपटुता, जिन गुणों का उल्लेख अध्यक्ष महोदय ने किया, व्यक्ति और घटना का सही मूल्यांकन करने की उनकी क्षमता, पैनी और दूर-दृष्टि परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय, सामंजस्य स्थापित करने की वृत्ति, स्वाधीनता के समर में और पुनर्निमाण के यज्ञ में ’उनकी भूमिका सदैव स्मरण की जाएगी. उनके नाम से जुड़े हुए इस पुरस्कार को पाकर मैं अपने को गौरान्वित समझता हूं. 

जब पंत जी केंद्र में आए, मैं संसद का सदस्य था, कभी राज्यसभा में और कभी लोकसभा में. वह काल बड़ा कठिन काल था, जब राज्यों के पुनर्गठन की विस्फोटक स्थिति थी, भाषा का विवाद खड़ा हो गया था. लेकिन पंत जी ने अपनी कुशलता, चतुरता और नीतिमत्ता से समस्याओं का समाधान किया. अगर मैं गलत नहीं हूं, तो जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर लोगों की राय लेने का प्रस्ताव रखने के कारण, हम जिस भंवर में फंस गए थे, उस भंवर में से अगर किसी ने दृढ़ता के साथ भारत को निकाला तो पंडित गोविंद वल्लभ पंत ने निकाला. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि कश्मीर की जनता की राय ली जा चुकी है. उसकी जनता ने भारत में मिलने का फैसला किया है. इसलिए फिर से जनमत संग्रह की बात ही नहीं उठती है. पाकिस्तान ने प्रस्ताव नहीं माने और वक्त पाकिस्तान के लिए रुका नहीं रहेगा, कालचक्र थमा नहीं रहेगा.

जब मैं पहली बार 1957 में लोकसभा सदस्य बना, तो उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. वे सदन के नेता भी थे. नियमित रूप से बैठकों में भाग लेते, उपस्थित रहते, चर्चा में योगदान देते, आवश्यकता होने पर हस्तक्षेप करते, प्रतिपक्ष का ध्यान रखते. स्पीकर को पूरा आदर करते. उनकी उपस्थिति मात्र से सदन की गरिमा बढ़ती थी. सब लोग रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित होते थे, प्रेरित होते थे. उस समय का एक प्रसंग मुझे याद है. मेरी स्मृति के आकाश में वह प्रसंग बिजली की तरह कौंध जाता है. पंडित जी के एक विश्वस्त सहायक थे श्री एम. ओ. मथाई. उन्होंने कुछ संसद सदस्यों के कुछ आचरण पर टिप्पणी की थी. स्वाभाविक है कि यह मामला सदन में उठाया जाता. सदन में सभी पक्षों ने इस पर आपत्ति की. विशेषाधिकार के उल्लंघन के प्रस्ताव दिए गए. सदन की अवमानना का मामला उठाया गया. मेरे प्रस्ताव को स्पीकर ने स्वीकार कर लिया. नेहरू जी सदन में थे. उन्होंने कहा, ’अध्यक्ष महोदय, यह विशेषाधिकार का मामला मालूम नहीं होता. यह एक इम्प्रोपरायटी है, अनौचित्य है, इस पहलू पर भी विचार कर लिया जाए.’  लेकिन सदन तैयार नहीं था. प्रतिपक्ष को भी यह बात पसंद नहीं आई. नेहरू जी ने सदन का मूड देखा, प्रतिपक्ष का तेवर देखा.  नेहरू जी ने इस सुझाव को मान लिया कि सारा मामला विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया जाए. उस समय पंडित नेहरू ने जो कुछ कहा था, मैं उसे उदधृत कर रहा हूं-

’जब सदन का एक महत्वपूर्ण सदस्य यह महसूस कर रहा हो कि कुछ न कुछ किया जाना चाहिए, तब बहुमत के लिए यह कतई उचित नहीं है कि सदन की इच्छा को दरकिनार कर दिया जाए. मेरे विचार से इस मामले को ताक पर रख देने का सुझाव उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे यह साफ झलकेगा कि मामले को किसी न किसी प्रकार दबाने का अथवा तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया गया है. यह अच्छी बात नहीं होगी कि इस प्रकार की भावना उत्पन्न की जाए.’

लोकतंत्र 51 और 49 का खेल नहीं है. लोकतंत्र मूल रूप में एक नैतिक व्यवस्था है. सदन या संसद यानी कानून की छोटी सी कचहरी नहीं है, जहां शब्दों की चीर-फाड़ की जाए. यह एक राजनीतिक मंच है. राजनीतिक शब्द का प्रयोग मैं संकुचित रूप में नहीं कर रहा हूं, बल्कि विराट अर्थ में कर रहा हूं, जिस मंच पर देश की 90 करोड़  जनता की आशाएं, अपेक्षाएं और कुंठाएं भी प्रतिबिम्बित होनी चाहिए, प्रतिध्वनि होनी चाहिए.

संविधान और कानून सबका अपना महत्व है, लेकिन अगर लोकतंत्र एक ढांचा मात्र बनकर रह जाए, एक कर्मकांड में बदल जाए, उसकी प्राणशक्ति घटती जाए, तो वहां कठिनाई पैदा हो जाती है. उस प्राणशक्ति को घटने न देना, यह हम सबकी जिम्मेदारी है. 

अभी दो दिन पहले हमने स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाई. हमने स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने की शपथ ली. हम देश को समृद्धि की ओर ले जाना चाहते हैं. बाहर की चुनौतियों का हम मिलकर सामना करते हैं, लेकिन घर के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन न होने पाए, उनका क्षरण न होने पाए, इसकी देखभाल की जरूरत है. जन प्रतिनिधियों की साख घटनी नहीं चाहिए. जन प्रतिनिधि संस्थाओं की विश्वसनीयता में कमी नहीं आनी चाहिए. हमारे लोकतंत्र का पौधा मजबूत है, लेकिन ऐसा न हो कि वह ऊपर-ऊपर तो बढ़ता जाए, पर उसकी जड़ें खोखली होती जाएं. यही कर्तव्य हमारे सामने है.

मैं आप सबको एक बार फिर हृदय से धन्यवाद देता हूं. प्रधानमंत्री के हाथों आज मैंने पुरस्कार स्वीकार किया है, इस पर जरूर टीका-टिप्पणी होगी. अब उससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन मुझे याद है, जब पहली बार संसद आया, तो बोलने के लिए समय नहीं मिल पाता था. पीछे की बेंचों पर बैठता था. एक बार नेहरू जी द्वारा सदन में लाए गए विदेश नीति संबंधी प्रस्ताव पर बोलना चाहता था, वे प्रतिवर्ष प्रस्ताव लाते थे, लेकिन स्पीकर साहब ने कहा कि समय नहीं है, आपकी पार्टी बहुत छोटी है, आपको मौन धारण करना चाहिए. इसके विरोध में मैं वाक-आउट कर गया. वाक-आउट का सिलसिला अभी भी चल रहा है. यह बात अलग है कि इस बार ज्यादा लंबा हो गया है. लेकिन वाक-आउट एक लोकतांत्रिक तरीका है, संसदीय आचरण का हिस्सा है. अब हम भीतर जाकर सदन की कार्रवाई में विघ्न डालें, उससे तो अच्छा है कि बाहर ही रहें. यह बात अलग है कि ज्यादा दिन बाहर नहीं रहना चाहिए, लेकिन कभी-कभी असहयोग करना आवश्यक हो जाता है. असहयोग का रास्ता गांधी जी ने दिखाया था. उस पर चलने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन वह रास्ता संसद में जाकर समाप्त होना चाहिए.

यह लोकतंत्र का युग है. आज सारे संसार में एक लहर आई है. भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. दुनिया हमारी तरफ देख रही है. परीक्षा की इस घड़ी में विफल होने की गलती हम नहीं कर सकते. 

एक बार फिर मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं और मैं प्रयत्न करूंगा कि इस सम्मान के लायक अपने आचरण को बनाए रख सकूं. जब कभी मेरे पैर डगमगाएं, तो ’पंत सम्मान’ मुझे चेतावनी देता रहे, मुझे बताता रहे कि इस रास्ते पर डांवाडोल होने की गलती मैं न करूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

राजनीति में मर्यादा होनी चाहिए

    


महाराष्ट्र की पुणे नगरपालिका द्वारा 23 जनवरी, 1982 को आयोजित गौरव सम्मान समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- किन शब्दों में मैं अपने भावों को व्यक्त करूं. व्यक्त न करने का कारण या न कर पाने का कारण ये नहीं है कि मैं भावों से गदगद हो गया हूं. कारण ये है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि मेरा यह सम्मान किसलिए किया जा रहा है. मैं साठ वर्ष का हो गया हूं- क्या इसीलिए सम्मान हो रहा है? साठी बुद्धि नाठी. ये मराठी की म्हण (कहावत) है. हिंदी में इसका दूसरा चरण है साठा सो पाठा. लेकिन अगर मैं जीवित हूं, तो साठ साल का होने वाला हूं. और जीवन तो किसी के हाथ में नहीं है. पता नहीं, उमर बढ़ती है या घटती है. नाना साहब यहां बैठे हैं- वे अस्सी साल के हो गए हैं, उन्होंने स्वयं आपको बताया है. वे सम्मान के अधिकारी हैं. खरात साहब लेखनी के धनी हैं. उनका अभिनंदन किया जाए, तो स्वाभाविक है. मोरे साहब से तो मेरी मुलाकात हाल में ही हुई है. वे लोकसभा में हैं और मैं परलोक सभा में हूं. राज्यसभा को लोग पार्लियामेंट नहीं मानते. मुझसे मिलने आते हैं- कहते हैं हमें पार्लियामेंट देखनी है. मैं कहता हूं, मैं राज्यसभा देखने का प्रबंध कर सकता हूं. तो राज्यसभा नहीं, लोकसभा देखनी है. तो मैं उन्हें पूछता हूं कि मैं यहां क्या कर रहा हूं ? लेकिन यहां सबका भाषण सुनकर मुझे आनंद हुआ. सब दलों के प्रतिनिधियों ने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रवक्ताओं ने मुझे अपने स्नेह का पात्र समझा, ये मेरे लिए कुछ नहीं तो जीवन का पाथेय है. मैं इसे स्नेह कहूंगा- क्योंकि जब स्नेह होता, तो दोष छिप जाते हैं और जो गुण नहीं होते हैं, उनका आविष्कार भी किया जाता है. अब नानासाहब मेरी तारीफ में कुछ कहें यह अच्छा नहीं. मुझे अब उनकी जितनी उम्र पाने के लिए बीस साल और जीना पड़ेगा. और आने वाला कल क्या लेकर आएगा कोई नहीं जानता. सचमुच में व्यक्ति तब तक सम्मान का अधिकारी नहीं होता, जब तक कि जीवन की कथा का अंतिम परिच्छेद नहीं लिखा जाता. कब, कहां, कौन फिसल जाए ? जिंदगी की सफेद चादर पर कब, कहां, कौन सा दाग लग जाए. इसीलिए मैं इसे मानपत्र नहीं मानता. पुणे के नागरिकों को मुझसे आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं, मैं इसे उसकी अभिव्यक्ति मानता हूं. जब कभी मेरे पांव डगमगाने को होंगे, होंगे तो नहीं, अगर कर्तव्य के पथ पर कभी आकर्षण मुझे बांधकर कर्तव्य के पथ से हटाने की कोशिश करेगा, तो आपका मानपत्र मुझे ये चेतावनी देता रहेगा. यह चेतावनी देता रहेगा कि पुणे नगर के निवासियों की आशा और अपेक्षाओं पर पानी फेरने का काम कभी मत करना. 

मेरे लिए राजनीति सेवा का एक साधन है. परिवर्तन का माध्यम है. सत्ता सत्ता के लिए नहीं है. विरोध विरोध के लिए नहीं है. सत्ता सेवा के लिए है और विरोध सुधार के लिए- परिष्कार के लिए है. लोकशाही एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिना हिंसा के परिवर्तन लाया जा सकता है. आज सार्वजनिक जीवन में अस्पृश्यता बढ़ रही है, यह खेद का विषय है. लेकिन आज का समारोह मेरे मन में कुछ आशा जगाता है. मतभेद के बावजूद हम इकट्ठे हो सकते हैं. प्रामाणिक मतभेद रहेंगे. ’पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना’. और मतों की टक्कर में ही भविष्य का पथ प्रशस्त होगा, लेकिन मतभेद एक बात है और मनभेद दूसरी बात है. मतभेद होना चाहिए, मनभेद नहीं होना चाहिए. आखिर तो इस देश का हृदय एक होना चाहिए.

उस दिन संसद में खड़ा था भारत के संविधान की चर्चा करने के लिए. We the people of India.  संविधान में दलों का उल्लेख नहीं है. वैसे संसदीय लोकतंत्र में दल आवश्यक है, अनिवार्य है. संविधान के प्रथम पृष्ठ पर अगर किसी का उल्लेख है- We the people of India. We the citizens नहीं है. हम इस देश के लोग, भारत के जन. अलग-अलग प्रदेशों में रहने वाले, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग उपासना पद्धतियों का अवलम्बन करने वाले, मगर देश की मिट्टी के साथ अनन्य रूप से जुड़े हुए लोग. यहां की संस्कृति के उत्तराधिकारी और उसके संदेश वाहक हैं. कोई फॊर्म भर कर नागरिकता प्राप्त कर सकता है, मगर देश का आत्मीय बनने के लिए, देश का जन बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता है- मिट्टी की अनन्य संपत्ति आवश्यक है. मैं अमेरिका जाकर अमेरिका का नागरिक बन सकता हूं, मगर अमेरिकन नहीं बन सकता. इस राष्ट्रीयता का आधार संकुचित नहीं है, संकीर्ण है. स्मृतियां बदलती नहीं हैं. कुछ व्यवस्थाएं कालबाह्या जरूर हो जाती हैं.  वे त्याज्य बन जाती हैं. उन्हें छोड़ देना चाहिए. दिल्ली से हम पुणे आते हैं, तो गरम कपड़े छोड़ आते हैं. समय आने पर काया भी बदली जा सकती है, मगर जीवन मूल्यों की आत्मा परिवर्तित नहीं होनी चाहिए.

हम स्वाधीन हुए, हमने अपना संविधान बनाया. उसमें संशोधन की गुंजाइश है और संशोधन की व्यवस्था संविधान में ही है. उसमें व्यक्ति की स्वाधीनता की धारणा है. धार्मिक स्वतंत्रता है. व्यक्ति की महत्ता है. हमें लोकशाही चाहिए. लोकशाही को हम अक्षुण्ण रखेंगे. मगर स्वतंत्रता के साथ हमें संयम भी चाहिए. समता के साथ हमें ममता भी चाहिए. अधिकार के साथ कर्तव्य भी चाहिए. और जैसा कि मैंने पहले कहा कि सत्ता के साथ सेवा भी चाहिए. संविधान में हमारे कर्तव्यों का भी उल्लेख है. वह बाद में किया गया था. जिस पृष्ठभूमि में किया गया था, वह ठीक नहीं था. लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा हुआ है. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अगर हमारे कुछ अधिकार हैं, तो इस देश के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. अभी 26 जनवरी का त्यौहार आने वाला है. आज 23 जनवरी है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्मदिन है. मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता हूं. स्वतंत्रता संग्राम के सभी सेनानियों को हम श्रद्धा निवेदन करें. उनमें से जो जीवित हैं, हम उनका सम्मान करें.

महापौर महोदय, मैं आप से और आपके साथियों से कहना चाहूंगा- राजनीतिक नेताओं का ज्यादा सम्मान मत करिए. पहले ही वे जरूरत से ज्यादा रोशनी में रहते हैं. अब देखिए सारी रोशनी यहां जुटी हुई है और आप अंधेरे में बैठे हैं. राजनीति जीवन पर हावी हो गई है. सम्मान होना चाहिए काश्तकारों का, कलाकारों का, वैज्ञानिकों का, रचनात्मक कार्यकर्ताओं का, जो उपेक्षित हैं उनका. कुष्ठ रोगियों के लिए जो आश्रम चला रहे हैं, उनका अभिनंदन होना चाहिए. उनका वंदन होना चाहिए. जनरल वैद्य रिटायर होकर आए. मैं नहीं जानता पुणे महानगरपालिका ने उनका अभिनंदन किया था या नहीं. उनका अभिनंदन होना चाहिए. कैसा विचित्र संयोग है. घटनाचक्र किस तरह से वक्र हो सकता है. जो सेनापति रणभूमि में शत्रुओं के टैंको को भेदकर जीवित वापस चला आया, वह अपने देश में, अपने ही घर में, देश के कुछ गद्दारों के हाथों शहीद हुआ. मित्रों, हम परकीयों से परास्त नहीं हुए. हम तो अपनों से ही मार खाते रहे, मार खाते रहे. स्वर्गीय वैद्य का मरणोपरांत भी सत्कार हो सकता है- समारोह हो सकता है. आज मैंने अपनी सुरक्षा का काफी प्रबंध पाया. मगर कहीं यह सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. आज ये नौबत क्यों आ गई ? आम आदमी की सुरक्षा कहां है ? मैं पंजाब जाता हूं. अनेक दलों के कार्यकर्ता मारे गए. और सचमुच मैंने साठ वर्ष पूरे कर लिए, इसके लिए पंजाब के आतंकवादियों को भी धन्यवाद देता हूं. जिनकी लिस्ट में मेरा भी नाम है. और वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने में समर्थ हैं. आम आदमी सुरक्षा का अनुभव कैसे करता है ?

मित्रों, राजनीति को मूल्यों से नहीं जोड़ना चाहिए. यह मात्र सत्ता का खेल नहीं है. आज सचमुच में स्वस्थ परंपराएं डालने का अवसर है, जो दल केंद्र में सत्तारूढ़ है, वह अनेक प्रदेशों में प्रतिपक्ष में बैठा है. इससे वह प्रतिपक्ष के तकाजे को भी समझ सकता है और सत्ता के दायित्व को भी ठीक तरह से अनुभव कर सकता है. राजनीति में तो प्रतिस्पर्धा चलेगी.  लेकिन एक मर्यादा होनी चाहिए, एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए. इस लक्ष्मण रेखा का अगर उल्लंघन किया जाए, हर प्रश्न को अगर वोट से जोड़ा जाएगा, हर समस्या का विचार अगर चुनाव में हानि या लाभ की दृष्टि से किया जाएगा, तो कहीं ऐसा न हो, सारे पुरखों के बलिदानों पर पानी फिर जाए और एक दूसरे को मानपत्र देने की बजाय इतिहास कहीं हमारे लिए अपमान का पत्र छोड़कर न चला जाए. सचमुच में हम किसका सम्मान करें, किसे मानपत्र दें, कौन अधिकारी है.

किसी की आलोचना या दोषारोपण पर मैं भावुक होना नहीं चाहता. दो साल पहले सारे राष्ट्र में संताप की लहर जगी थी. हम चुनाव में परास्त हुए थे. हमने अपनी पराजय को स्वीकार किया था. आज निराशा क्यों मन में डेरा डाल रही है ? समस्याओं को मिलकर हल करना होगा. एक दूसरे की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं करना चाहिए. मतभेद रहेंगे. लेकिन ऐसी दीवार नहीं खड़ी होनी चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन का सारा तानाबाना तोड़ दे. जो सार्वजनिक जीवन में हैं उनके सामने निरंतर ये द्वंद्व चलता रहता है, यह श्रेय की साधना करें या प्रेय के पीछे दौड़ें ? कभी-कभी जो हितकर है, वह लोकप्रिय नहीं होता. बीमार को कड़वी दवा अच्छी नहीं लगती. लेकिन मरीज का भला चाहने वाला उसको मिठाई नहीं खिलाता. अगर हम लोकप्रियता के पीछे दौड़ें और चुनौतियों का विस्मरण करें, तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी लाभ की बलि चढ़ा दें, और व्यक्ति या दल का विचार करते हुए हम राष्ट्र के तकाजों को, आवश्यकताओं को भूल जाएं, तो आने वाला समय हमें कभी क्षमा नहीं करेगा.

महानगरपालिका हमारी स्वराज्य संस्थाओं का एक महत्वपूर्ण  अंग है. हमारा सामाजिक जीवन पांच स्तंभों पर खड़ा है. एक है परिवार, दूसरी पाठशाला, तीसरा पूजा गृह, चौथा धर्म और पांचवां पंचायत. ये पांच स्तंभ हैं. पंचदीप हैं, जो व्यक्ति के निर्माण में, व्यक्ति के विकास में, समाज के गठन में, समाज को धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. महानगरपालिका इसी महत्वपूर्ण पंचायत का एक महत्वपूर्ण स्थान है. अच्छा होता अगर हम कॊर्पोरेशन की जगह नगर पंचायत कहते, महानगर पंचायत कहते. ग्राम पंचायत, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, महानगर पंचायत. और असेम्बली को भी प्रदेश पंचायत कहा जा सकता था और पार्लियामेंट को राष्ट्रीय पंचायत.

महापौर महोदय, मुझे क्षमा करें, कॊर्पोरेशन को तो लोग अंग्रेजी में सही सही कह भी नहीं सकते. वे कभी कभी कह जाते हैं- करप्शन. एक जगह मैंने देखा वे कॊर्पोरेशन को कह रहे थे चोरपोरेशन-चोर्पोरेशन. मैंने कहा नहीं-नहीं, ये शुद्ध उच्चारण नहीं हैं, क्योंकि उच्चारण तो हम जानते हैं, पर हम कुछ और कहना चाहते हैं. पंचायत नाम अगर होता, तो इस तरह का भ्रम नहीं पैदा होता. हमारे जीवन से ज्यादा जुड़ जाता. हमने अपने संविधान में केंद्र और प्रदेशों के बीच अधिकारों का, साधनों का बंटवारा नहीं किया. ये काम होना चाहिए- ये काम संविधान में छूट गया है. पंचायत का चलते-चलते उल्लेख काफी है. क्या म्युनिसिपल कॊर्पोरेशन, म्युनिसिपलिटी और अन्य स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं प्रदेश सरकार की दया पर होनी चाहिए ? वह जब चाहे चुनाव करें, जब चाहें, चुनाव न करें. जब चाहे भंग कर दें, जब चाहे बहाल कर दें.

चुनाव का समय निश्चित होना चाहिए, अवधि तय होनी चाहिए. अधिकारों की व्याख्या होनी चाहिए, साधनों का ठीक तरह से बंटवारा होना चाहिए. शहर बढ़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं. रोजगार की तलाश में, औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप शहरीकरण हो रहा है-शहरों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं. नगर की सड़कें छोटी पड़ रही हैं, विद्यालयों में स्थान नहीं है, अस्पतालों में जगह नहीं है. पीने का पानी एक बड़ी समस्या बनने वाला है. क्या इसका दीर्घकालिक नियोजन आवश्यक नहीं ? पंचायत कहां से पूंजी लाए ?

अभी महापौर महोदय कह रहे थे, हमने कॊर्पोरेशन की तरफ से कुछ इमारतें बनाई हैं, दुकानें बनाई हैं. उनसे रुपया आने वाला है, कुछ किराया आएगा. तो मैंने उन्हें बधाई दी कि आप और ऐसे काम करिए. तब वे मुझसे कहने लगे कि इस बारे में थोड़ा सरकार से हमारी तरफ से कहिए. मैंने कहा- मेरे कहने की क्या जरूरत है ? अब तो आप स्वयं सरकार हैं. मगर एक बात मैं जानता हूं- सरकार के दरबार में महापौर की बात बड़ी मुश्किल से सुनी जाएगी, क्योंकि व्यवस्था ऐसी है, जो साधनों का ठीक तरह से बंटवारा नहीं करती. मध्य प्रदेश में ऒक्ट्रॊय खत्म हो गया. प्रदेश सरकार ने टैक्स लगा दिया, जो स्वयं इकट्ठा करती है और प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है कि कॊर्पोरेशन को- म्युनिसिपलिटीज को उसमें से उचित हिस्सा दे. मगर नहीं दे रही है. ग्वालियर का हमारा कॊर्पोरेशन मुश्किल में है. इंदौर में कठिनाई हो रही है. इसलिए मांग हो रही है कि ऒक्ट्रॊय खत्म मत करो. मैंने सुना है कि महाराष्ट्र में तो ऒक्ट्रॊय भी चल रहा है और टर्नओवर टैक्स भी चल रहा है. ऒक्ट्रॊय अगर खत्म कर दिया जाए, तो कॊर्पोरेशन का काम कैसे चलेगा ? क्या आमदनी के और साधन बढ़ने नहीं चाहिए ? कैसे बढ़ें ? सत्ता का विकेंद्रीकरण कीजिए. शक्तिशाली केंद्र मगर सत्ता का विकेंद्रीकरण. सुनने में अंतर्विरोध दिखाई देता है, मगर अंतर्विरोध नहीं है. और विकेंद्रीकरण संविधान सम्मत है. प्रशासन में नागरिकों की भागीदारी जरूरी है. केवल पांच साल में एक बार वोट देना पर्याप्त नहीं है. हर नागरिक प्रशासन में कैसे भागीदार बनेगा. इस पर विचार किया जा सकता है. 

स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में, स्वायत्त संस्थाओं में  जो चुनाव की पद्धति है, उसमें कुछ परिवर्तन की अपेक्षा है. अभी क्षेत्र के अनुसार प्रतिनिधि चुने जाते हैं. क्या इसमें धंधा लाया जा सकता है, व्यवसाय लाया जा सकता है ? क्या मजदूरों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है ? क्या किसानों के प्रतिनिधि के रूप में कोई आ सकते हैं ? सोशलिज्म के साथ क्या हम गिल्ड सोशलिज्म पर विचार कर सकते हैं ? ये विविधता से भरा हुआ समाज-बहुरंगी समाज, इसका कोई वर्ग अपने को उपेक्षित न समझे. शासन में भागीदार बनकर वह परिवर्तन प्रक्रिया में हिस्सा ले. सरकारिया कमीशन के सामने हमने इस तरह के विचार रखे. सारा विवाद खत्म हो गया मध्य प्रदेश और केंद्र के बीच. प्रदेशों को भी अधिक वित्तीय साधन मिलना चाहिए, लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि राष्ट्र जीवन के कार्यों में, विकास के कार्यों में, नगर को स्वच्छ रखने के काम में, इसको हरित रखने के काम में, नागरिकों का सक्रिय सहयोग कैसे प्राप्त होगा ? नागरिक चेतना कैसे जगाएं ? नगर को स्वच्छ, नगर को सुंदर बनाने का काम देकर जन अभियान का रूप कैसे दें ? हर चीज प्रशासन पर छोड़ दी जाती है. प्रशासन भी पंगु हो रहा है. क्या लोकशक्ति को जगाकर प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता है ? क्या ये संभव है कि प्रशासन को सबल भी किया जाए ? नागरिक मूक दर्शक न बनें, बल्कि नागरिक इस खंभे को टिकाने में भागीदार बनें, इस दृष्टि से विचार होना चाहिए.

मित्रों, हमारे  राष्ट्र जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. नाना साहब अभी मुझसे बातचीत कर रहे थे और आपने उनके भाषण में भी सुना होगा, जो उनके मन में एक दर्द है, एक पीड़ा है. एक टीस है. ये दर्द उन सबके दिल में है, जो देश का भला चाहते हैं. स्वतंत्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी पुणे में कह चुका हूं, स्वतंत्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना गलत होगा.  लेकिन हम जितना कर सकते थे, उतना नहीं कर पाए. जिस तरह से करना चाहिए, उस तरह से नहीं कर पाए. तो क्या हिम्मत हार जाएं ? निराश हो जाएं ? हमने सपने देखे थे, आज सपने टूट गए तो क्या हुआ ? हमें सपनों को उत्तराधिकार के रूप में नई पीढ़ी को सौंपकर जाना है. सपने भंग होने के बाद भी साबुत रहते हैं. सपने टूट जाने के बाद भी जुड़ जाते हैं. आने वाली पीढ़ी को हम कौन से सपने उत्तराधिकार के रूप में सौंप कर जाएं ? आज भी देश में नौजवानों का बहुमत है. उनमें कुछ करने की उमंग है, उत्साह है. वे कुछ करें. हमारा सहयोग उन्हें होगा, हमारा समर्थन उन्हें मिलेगा. हमारा आशीर्वाद उन्हें मिलेगा. लेकिन क्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो कल्याणकारी हो. हमारा चिंतन ऐसा होना चाहिए, जो उदात्त हो. राजकारण ऐसा होना चाहिए, जो हमारे  राष्ट्र जीवन के शाश्वत मूल्यों की वृद्धि कर सके. खरात साहब ने ठीक कहा, " अभी सामाजिक क्षेत्र में बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है." वे अभी सालूपुर का उल्लेख कर कहे थे. शायद आपको मालूम नहीं है कि सालूपुर में जो हत्याकांड हुआ था, उसमें जो अभियुक्त पकड़े गए, उन पर अभी तक मुकदमा नहीं चलाया गया है, क्योंकि प्रशासन गवाह ढूंढने में असमर्थ है. किसी को सजा नहीं मिली.

मैं उस दिन दिल्ली पहुंच गया था. हरिजन भाइयों का सामूहिक चिता में स्नान हो रहा था. एक ओर सूरज छुप रहा था, मानो सूरज शर्म से लाल मुंह करके भाग जाना चाहता था और दूसरी ओर सामूहिक चिता जल रही थी. क्या जन्म के कारण व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होगा ? सम्मान का अधिकार नहीं होगा ? किस मुंह से हम दक्षिण अफ्रीका में होने वाले रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाएं ? फिर भी उठा रहे हैं, उठाना चाहिए. लेकिन यहां तो रंग भी एक है, चमड़ी का रंग भी एक है, रक्त का रंग भी एक है. समाज को टुकड़ों में बांटकर, अलग-अलग खेमों में विभाजित करके, हम सारे संसार को एक परिवार मानते हैं. ऐसी ऊंची-ऊंची बातें नहीं कर सकते. और अगर करेंगे, तो इनका कोई असर नहीं होगा.

भगवान बुद्ध, महावीर, गांधी ने चाहे अहिंसा को परम धर्म माना हो. मनुष्य के जीवन में हिंसा का कोई मूल्य नहीं. पंजाब लहूलुहान पड़ा है. मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि वे पराये हैं. जो आतंकवादी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए. उनको अलग-थलग किया जाना चाहिए. इसीलिए मैंने शब्द प्रयोग किया- समता पर आधारित ममत्व. ममतायुक्त समता. कथनी और करनी में बढ़ता हुआ अंतर विश्व में भी हमारी विश्वसनीयता को कम कर रहा है. और देश के भीतर कदम-कदम पर कठिनाइयां पैदा कर रहा है. आवश्यकता इस बात की है कि हम समय की चुनौतियों को समझें और उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए साहस जुटाएं, विवेक जुटाएं, शक्ति जुटाएं और छोटे-छोटे मतभेदों को ताक पर रखकर, ये गणतंत्र चिरंजीवी हो इस तरह की व्यवस्था का विकास हो, इस तरह का प्रबंध करने की तैयारी हो. 

आपने  मुझे सम्मान का अधिकारी समझा, इसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं. मैंने प्रयत्न किया है कि सारे देश का चित्र अपने सामने रख कर काम करूं. मैं जनता सरकार में विदेश मंत्री बना, तब मैंने दो राजदूत प्रधानमंत्री की सलाह से नियुक्त किए. एक नाना साहब और दूसरे थे नानी पालखीवाला. दोनों किसी पार्टी के नहीं थे. श्री कैलाशचंद्र हमारे हाई-कमीश्नर होकर मॊरिशस में गए. मैंने ये कभी नहीं सोचा- ’ये वेगले आहेत, ये वेगले आहेत. आपल्याच पैकी नाही.’ ये आपल्याच पैकी काय ? और मैं उस दिन कश्मीरियों में बैठा था- तो कहने लगे, ये हमारी जाति वाले नहीं हैं- गैर जाति वाले हैं. अरे सब की एक ही जाति है. मनुष्य की एक ही जाति है. जाति जन्म से है. जन्म लेने की प्रक्रिया से है. सारे मनुष्य एक तरह से पैदा होते हैं और गधे दूसरी तरह से पैदा होते हैं. इसलिए जानवरों की अलग जाति है. और कहां मानव जाति का सपना. ’वसुधैव कुटुम्बकम’ और कहां दल, और दल में भी गुट. जनता पार्टी टूट गई- बड़ा दुख हुआ. मैं जानता हूं, हमारे कुछ मित्र इस दुख में सहभागी नहीं होंगे. वे सोचते हैं- टूट गया, तो अच्छा हुआ. मगर आप अपने को संभाल कर रखिए. ये टूटना इस देश की नियति हो गई है. बिखरना हमारा स्वभाव बन गया है. अकारण झगड़ा करना, ऐसा लगता है कि हमारे खून में घुस गया है.

आज भारत अगर चाहे, तो संसार में प्रथम पंक्ति का राष्ट्र बन सकता है. फिर मैं कहना चाहूंगा कि परकीय हमारे पैर नहीं खींच रहे. हम अपने ही पैरों में बेड़ियां डाले हैं. इन्हें हम तोड़ने का संकल्प करें. राष्ट्र को मिलन भूमि मानकर व्यक्ति से ऊपर उठकर जरूरत हो तो दल से ऊपर उठकर- ’तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें.’ व्यक्ति तो नहीं रहेगा. किसी ने मुझ से पूछा था- आपका सपना क्या है ? मैंने कहा- एक महान भारत की रचना. कहने लगे कि आपका सपना, क्या आपको भरोसा है कि आपके जीवन में पूरा हो पाएगा ? मैंने कहा- नहीं होगा, लेकिन सपना पूरा करने के लिए फिर से इस देश में जन्म लेना पड़ेगा. मैं जन्म-मरण के चक्र से छूटना चाहता हूं. लेकिन अगर मेरे देश की हालत सुधरती नहीं है, भारत एक महान-दिव्य-भव्य राष्ट्र नहीं बनता है, अगर हर व्यक्ति के लिए हम गरिमा की, स्वतंत्रता की गारंटी नहीं कर सकते, अगर विविधताओं को बनाए रखते हुए एकता की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर दूसरा जन्म लेकर भी जूझने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.

मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं. परमात्मा मुझे शक्ति दे. आपने मुझ से जो आशाएं प्रकट की हैं, मैं उनको पूरा करने के लिए बल जुटा सकूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

राजनीति में मर्यादा होनी चाहिए

   


महाराष्ट्र की पुणे नगरपालिका द्वारा 23 जनवरी, 1982 को आयोजित गौरव सम्मान समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- किन शब्दों में मैं अपने भावों को व्यक्त करूं. व्यक्त न करने का कारण या न कर पाने का कारण ये नहीं है कि मैं भावों से गदगद हो गया हूं. कारण ये है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि मेरा यह सम्मान किसलिए किया जा रहा है. मैं साठ वर्ष का हो गया हूं- क्या इसीलिए सम्मान हो रहा है? साठी बुद्धि नाठी. ये मराठी की म्हण (कहावत) है. हिंदी में इसका दूसरा चरण है साठा सो पाठा. लेकिन अगर मैं जीवित हूं, तो साठ साल का होने वाला हूं. और जीवन तो किसी के हाथ में नहीं है. पता नहीं, उमर बढ़ती है या घटती है. नाना साहब यहां बैठे हैं- वे अस्सी साल के हो गए हैं, उन्होंने स्वयं आपको बताया है. वे सम्मान के अधिकारी हैं. खरात साहब लेखनी के धनी हैं. उनका अभिनंदन किया जाए, तो स्वाभाविक है. मोरे साहब से तो मेरी मुलाकात हाल में ही हुई है. वे लोकसभा में हैं और मैं परलोक सभा में हूं. राज्यसभा को लोग पार्लियामेंट नहीं मानते. मुझसे मिलने आते हैं- कहते हैं हमें पार्लियामेंट देखनी है. मैं कहता हूं, मैं राज्यसभा देखने का प्रबंध कर सकता हूं. तो राज्यसभा नहीं, लोकसभा देखनी है. तो मैं उन्हें पूछता हूं कि मैं यहां क्या कर रहा हूं ? लेकिन यहां सबका भाषण सुनकर मुझे आनंद हुआ. सब दलों के प्रतिनिधियों ने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रवक्ताओं ने मुझे अपने स्नेह का पात्र समझा, ये मेरे लिए कुछ नहीं तो जीवन का पाथेय है. मैं इसे स्नेह कहूंगा- क्योंकि जब स्नेह होता, तो दोष छिप जाते हैं और जो गुण नहीं होते हैं, उनका आविष्कार भी किया जाता है. अब नानासाहब मेरी तारीफ में कुछ कहें यह अच्छा नहीं. मुझे अब उनकी जितनी उम्र पाने के लिए बीस साल और जीना पड़ेगा. और आने वाला कल क्या लेकर आएगा कोई नहीं जानता. सचमुच में व्यक्ति तब तक सम्मान का अधिकारी नहीं होता, जब तक कि जीवन की कथा का अंतिम परिच्छेद नहीं लिखा जाता. कब, कहां, कौन फिसल जाए ? जिंदगी की सफेद चादर पर कब, कहां, कौन सा दाग लग जाए. इसीलिए मैं इसे मानपत्र नहीं मानता. पुणे के नागरिकों को मुझसे आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं, मैं इसे उसकी अभिव्यक्ति मानता हूं. जब कभी मेरे पांव डगमगाने को होंगे, होंगे तो नहीं, अगर कर्तव्य के पथ पर कभी आकर्षण मुझे बांधकर कर्तव्य के पथ से हटाने की कोशिश करेगा, तो आपका मानपत्र मुझे ये चेतावनी देता रहेगा. यह चेतावनी देता रहेगा कि पुणे नगर के निवासियों की आशा और अपेक्षाओं पर पानी फेरने का काम कभी मत करना. 

मेरे लिए राजनीति सेवा का एक साधन है. परिवर्तन का माध्यम है. सत्ता सत्ता के लिए नहीं है. विरोध विरोध के लिए नहीं है. सत्ता सेवा के लिए है और विरोध सुधार के लिए- परिष्कार के लिए है. लोकशाही एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिना हिंसा के परिवर्तन लाया जा सकता है. आज सार्वजनिक जीवन में अस्पृश्यता बढ़ रही है, यह खेद का विषय है. लेकिन आज का समारोह मेरे मन में कुछ आशा जगाता है. मतभेद के बावजूद हम इकट्ठे हो सकते हैं. प्रामाणिक मतभेद रहेंगे. ’पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना’. और मतों की टक्कर में ही भविष्य का पथ प्रशस्त होगा, लेकिन मतभेद एक बात है और मनभेद दूसरी बात है. मतभेद होना चाहिए, मनभेद नहीं होना चाहिए. आखिर तो इस देश का हृदय एक होना चाहिए.

उस दिन संसद में खड़ा था भारत के संविधान की चर्चा करने के लिए. We the people of India.  संविधान में दलों का उल्लेख नहीं है. वैसे संसदीय लोकतंत्र में दल आवश्यक है, अनिवार्य है. संविधान के प्रथम पृष्ठ पर अगर किसी का उल्लेख है- We the people of India. We the citizens नहीं है. हम इस देश के लोग, भारत के जन. अलग-अलग प्रदेशों में रहने वाले, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग उपासना पद्धतियों का अवलम्बन करने वाले, मगर देश की मिट्टी के साथ अनन्य रूप से जुड़े हुए लोग. यहां की संस्कृति के उत्तराधिकारी और उसके संदेश वाहक हैं. कोई फॊर्म भर कर नागरिकता प्राप्त कर सकता है, मगर देश का आत्मीय बनने के लिए, देश का जन बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता है- मिट्टी की अनन्य संपत्ति आवश्यक है. मैं अमेरिका जाकर अमेरिका का नागरिक बन सकता हूं, मगर अमेरिकन नहीं बन सकता. इस राष्ट्रीयता का आधार संकुचित नहीं है, संकीर्ण है. स्मृतियां बदलती नहीं हैं. कुछ व्यवस्थाएं कालबाह्या जरूर हो जाती हैं.  वे त्याज्य बन जाती हैं. उन्हें छोड़ देना चाहिए. दिल्ली से हम पुणे आते हैं, तो गरम कपड़े छोड़ आते हैं. समय आने पर काया भी बदली जा सकती है, मगर जीवन मूल्यों की आत्मा परिवर्तित नहीं होनी चाहिए.

हम स्वाधीन हुए, हमने अपना संविधान बनाया. उसमें संशोधन की गुंजाइश है और संशोधन की व्यवस्था संविधान में ही है. उसमें व्यक्ति की स्वाधीनता की धारणा है. धार्मिक स्वतंत्रता है. व्यक्ति की महत्ता है. हमें लोकशाही चाहिए. लोकशाही को हम अक्षुण्ण रखेंगे. मगर स्वतंत्रता के साथ हमें संयम भी चाहिए. समता के साथ हमें ममता भी चाहिए. अधिकार के साथ कर्तव्य भी चाहिए. और जैसा कि मैंने पहले कहा कि सत्ता के साथ सेवा भी चाहिए. संविधान में हमारे कर्तव्यों का भी उल्लेख है. वह बाद में किया गया था. जिस पृष्ठभूमि में किया गया था, वह ठीक नहीं था. लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा हुआ है. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अगर हमारे कुछ अधिकार हैं, तो इस देश के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. अभी 26 जनवरी का त्यौहार आने वाला है. आज 23 जनवरी है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्मदिन है. मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता हूं. स्वतंत्रता संग्राम के सभी सेनानियों को हम श्रद्धा निवेदन करें. उनमें से जो जीवित हैं, हम उनका सम्मान करें.

महापौर महोदय, मैं आप से और आपके साथियों से कहना चाहूंगा- राजनीतिक नेताओं का ज्यादा सम्मान मत करिए. पहले ही वे जरूरत से ज्यादा रोशनी में रहते हैं. अब देखिए सारी रोशनी यहां जुटी हुई है और आप अंधेरे में बैठे हैं. राजनीति जीवन पर हावी हो गई है. सम्मान होना चाहिए काश्तकारों का, कलाकारों का, वैज्ञानिकों का, रचनात्मक कार्यकर्ताओं का, जो उपेक्षित हैं उनका. कुष्ठ रोगियों के लिए जो आश्रम चला रहे हैं, उनका अभिनंदन होना चाहिए. उनका वंदन होना चाहिए. जनरल वैद्य रिटायर होकर आए. मैं नहीं जानता पुणे महानगरपालिका ने उनका अभिनंदन किया था या नहीं. उनका अभिनंदन होना चाहिए. कैसा विचित्र संयोग है. घटनाचक्र किस तरह से वक्र हो सकता है. जो सेनापति रणभूमि में शत्रुओं के टैंको को भेदकर जीवित वापस चला आया, वह अपने देश में, अपने ही घर में, देश के कुछ गद्दारों के हाथों शहीद हुआ. मित्रों, हम परकीयों से परास्त नहीं हुए. हम तो अपनों से ही मार खाते रहे, मार खाते रहे. स्वर्गीय वैद्य का मरणोपरांत भी सत्कार हो सकता है- समारोह हो सकता है. आज मैंने अपनी सुरक्षा का काफी प्रबंध पाया. मगर कहीं यह सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. आज ये नौबत क्यों आ गई ? आम आदमी की सुरक्षा कहां है ? मैं पंजाब जाता हूं. अनेक दलों के कार्यकर्ता मारे गए. और सचमुच मैंने साठ वर्ष पूरे कर लिए, इसके लिए पंजाब के आतंकवादियों को भी धन्यवाद देता हूं. जिनकी लिस्ट में मेरा भी नाम है. और वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने में समर्थ हैं. आम आदमी सुरक्षा का अनुभव कैसे करता है ?

मित्रों, राजनीति को मूल्यों से नहीं जोड़ना चाहिए. यह मात्र सत्ता का खेल नहीं है. आज सचमुच में स्वस्थ परंपराएं डालने का अवसर है, जो दल केंद्र में सत्तारूढ़ है, वह अनेक प्रदेशों में प्रतिपक्ष में बैठा है. इससे वह प्रतिपक्ष के तकाजे को भी समझ सकता है और सत्ता के दायित्व को भी ठीक तरह से अनुभव कर सकता है. राजनीति में तो प्रतिस्पर्धा चलेगी.  लेकिन एक मर्यादा होनी चाहिए, एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए. इस लक्ष्मण रेखा का अगर उल्लंघन किया जाए, हर प्रश्न को अगर वोट से जोड़ा जाएगा, हर समस्या का विचार अगर चुनाव में हानि या लाभ की दृष्टि से किया जाएगा, तो कहीं ऐसा न हो, सारे पुरखों के बलिदानों पर पानी फिर जाए और एक दूसरे को मानपत्र देने की बजाय इतिहास कहीं हमारे लिए अपमान का पत्र छोड़कर न चला जाए. सचमुच में हम किसका सम्मान करें, किसे मानपत्र दें, कौन अधिकारी है.

किसी की आलोचना या दोषारोपण पर मैं भावुक होना नहीं चाहता. दो साल पहले सारे राष्ट्र में संताप की लहर जगी थी. हम चुनाव में परास्त हुए थे. हमने अपनी पराजय को स्वीकार किया था. आज निराशा क्यों मन में डेरा डाल रही है ? समस्याओं को मिलकर हल करना होगा. एक दूसरे की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं करना चाहिए. मतभेद रहेंगे. लेकिन ऐसी दीवार नहीं खड़ी होनी चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन का सारा तानाबाना तोड़ दे. जो सार्वजनिक जीवन में हैं उनके सामने निरंतर ये द्वंद्व चलता रहता है, यह श्रेय की साधना करें या प्रेय के पीछे दौड़ें ? कभी-कभी जो हितकर है, वह लोकप्रिय नहीं होता. बीमार को कड़वी दवा अच्छी नहीं लगती. लेकिन मरीज का भला चाहने वाला उसको मिठाई नहीं खिलाता. अगर हम लोकप्रियता के पीछे दौड़ें और चुनौतियों का विस्मरण करें, तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी लाभ की बलि चढ़ा दें, और व्यक्ति या दल का विचार करते हुए हम राष्ट्र के तकाजों को, आवश्यकताओं को भूल जाएं, तो आने वाला समय हमें कभी क्षमा नहीं करेगा.

महानगरपालिका हमारी स्वराज्य संस्थाओं का एक महत्वपूर्ण  अंग है. हमारा सामाजिक जीवन पांच स्तंभों पर खड़ा है. एक है परिवार, दूसरी पाठशाला, तीसरा पूजा गृह, चौथा धर्म और पांचवां पंचायत. ये पांच स्तंभ हैं. पंचदीप हैं, जो व्यक्ति के निर्माण में, व्यक्ति के विकास में, समाज के गठन में, समाज को धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. महानगरपालिका इसी महत्वपूर्ण पंचायत का एक महत्वपूर्ण स्थान है. अच्छा होता अगर हम कॊर्पोरेशन की जगह नगर पंचायत कहते, महानगर पंचायत कहते. ग्राम पंचायत, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, महानगर पंचायत. और असेम्बली को भी प्रदेश पंचायत कहा जा सकता था और पार्लियामेंट को राष्ट्रीय पंचायत.

महापौर महोदय, मुझे क्षमा करें, कॊर्पोरेशन को तो लोग अंग्रेजी में सही सही कह भी नहीं सकते. वे कभी कभी कह जाते हैं- करप्शन. एक जगह मैंने देखा वे कॊर्पोरेशन को कह रहे थे चोरपोरेशन-चोर्पोरेशन. मैंने कहा नहीं-नहीं, ये शुद्ध उच्चारण नहीं हैं, क्योंकि उच्चारण तो हम जानते हैं, पर हम कुछ और कहना चाहते हैं. पंचायत नाम अगर होता, तो इस तरह का भ्रम नहीं पैदा होता. हमारे जीवन से ज्यादा जुड़ जाता. हमने अपने संविधान में केंद्र और प्रदेशों के बीच अधिकारों का, साधनों का बंटवारा नहीं किया. ये काम होना चाहिए- ये काम संविधान में छूट गया है. पंचायत का चलते-चलते उल्लेख काफी है. क्या म्युनिसिपल कॊर्पोरेशन, म्युनिसिपलिटी और अन्य स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं प्रदेश सरकार की दया पर होनी चाहिए ? वह जब चाहे चुनाव करें, जब चाहें, चुनाव न करें. जब चाहे भंग कर दें, जब चाहे बहाल कर दें.

चुनाव का समय निश्चित होना चाहिए, अवधि तय होनी चाहिए. अधिकारों की व्याख्या होनी चाहिए, साधनों का ठीक तरह से बंटवारा होना चाहिए. शहर बढ़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं. रोजगार की तलाश में, औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप शहरीकरण हो रहा है-शहरों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं. नगर की सड़कें छोटी पड़ रही हैं, विद्यालयों में स्थान नहीं है, अस्पतालों में जगह नहीं है. पीने का पानी एक बड़ी समस्या बनने वाला है. क्या इसका दीर्घकालिक नियोजन आवश्यक नहीं ? पंचायत कहां से पूंजी लाए ?

अभी महापौर महोदय कह रहे थे, हमने कॊर्पोरेशन की तरफ से कुछ इमारतें बनाई हैं, दुकानें बनाई हैं. उनसे रुपया आने वाला है, कुछ किराया आएगा. तो मैंने उन्हें बधाई दी कि आप और ऐसे काम करिए. तब वे मुझसे कहने लगे कि इस बारे में थोड़ा सरकार से हमारी तरफ से कहिए. मैंने कहा- मेरे कहने की क्या जरूरत है ? अब तो आप स्वयं सरकार हैं. मगर एक बात मैं जानता हूं- सरकार के दरबार में महापौर की बात बड़ी मुश्किल से सुनी जाएगी, क्योंकि व्यवस्था ऐसी है, जो साधनों का ठीक तरह से बंटवारा नहीं करती. मध्य प्रदेश में ऒक्ट्रॊय खत्म हो गया. प्रदेश सरकार ने टैक्स लगा दिया, जो स्वयं इकट्ठा करती है और प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है कि कॊर्पोरेशन को- म्युनिसिपलिटीज को उसमें से उचित हिस्सा दे. मगर नहीं दे रही है. ग्वालियर का हमारा कॊर्पोरेशन मुश्किल में है. इंदौर में कठिनाई हो रही है. इसलिए मांग हो रही है कि ऒक्ट्रॊय खत्म मत करो. मैंने सुना है कि महाराष्ट्र में तो ऒक्ट्रॊय भी चल रहा है और टर्नओवर टैक्स भी चल रहा है. ऒक्ट्रॊय अगर खत्म कर दिया जाए, तो कॊर्पोरेशन का काम कैसे चलेगा ? क्या आमदनी के और साधन बढ़ने नहीं चाहिए ? कैसे बढ़ें ? सत्ता का विकेंद्रीकरण कीजिए. शक्तिशाली केंद्र मगर सत्ता का विकेंद्रीकरण. सुनने में अंतर्विरोध दिखाई देता है, मगर अंतर्विरोध नहीं है. और विकेंद्रीकरण संविधान सम्मत है. प्रशासन में नागरिकों की भागीदारी जरूरी है. केवल पांच साल में एक बार वोट देना पर्याप्त नहीं है. हर नागरिक प्रशासन में कैसे भागीदार बनेगा. इस पर विचार किया जा सकता है. 

स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में, स्वायत्त संस्थाओं में  जो चुनाव की पद्धति है, उसमें कुछ परिवर्तन की अपेक्षा है. अभी क्षेत्र के अनुसार प्रतिनिधि चुने जाते हैं. क्या इसमें धंधा लाया जा सकता है, व्यवसाय लाया जा सकता है ? क्या मजदूरों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है ? क्या किसानों के प्रतिनिधि के रूप में कोई आ सकते हैं ? सोशलिज्म के साथ क्या हम गिल्ड सोशलिज्म पर विचार कर सकते हैं ? ये विविधता से भरा हुआ समाज-बहुरंगी समाज, इसका कोई वर्ग अपने को उपेक्षित न समझे. शासन में भागीदार बनकर वह परिवर्तन प्रक्रिया में हिस्सा ले. सरकारिया कमीशन के सामने हमने इस तरह के विचार रखे. सारा विवाद खत्म हो गया मध्य प्रदेश और केंद्र के बीच. प्रदेशों को भी अधिक वित्तीय साधन मिलना चाहिए, लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि राष्ट्र जीवन के कार्यों में, विकास के कार्यों में, नगर को स्वच्छ रखने के काम में, इसको हरित रखने के काम में, नागरिकों का सक्रिय सहयोग कैसे प्राप्त होगा ? नागरिक चेतना कैसे जगाएं ? नगर को स्वच्छ, नगर को सुंदर बनाने का काम देकर जन अभियान का रूप कैसे दें ? हर चीज प्रशासन पर छोड़ दी जाती है. प्रशासन भी पंगु हो रहा है. क्या लोकशक्ति को जगाकर प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता है ? क्या ये संभव है कि प्रशासन को सबल भी किया जाए ? नागरिक मूक दर्शक न बनें, बल्कि नागरिक इस खंभे को टिकाने में भागीदार बनें, इस दृष्टि से विचार होना चाहिए.

मित्रों, हमारे  राष्ट्र जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. नाना साहब अभी मुझसे बातचीत कर रहे थे और आपने उनके भाषण में भी सुना होगा, जो उनके मन में एक दर्द है, एक पीड़ा है. एक टीस है. ये दर्द उन सबके दिल में है, जो देश का भला चाहते हैं. स्वतंत्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी पुणे में कह चुका हूं, स्वतंत्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना गलत होगा.  लेकिन हम जितना कर सकते थे, उतना नहीं कर पाए. जिस तरह से करना चाहिए, उस तरह से नहीं कर पाए. तो क्या हिम्मत हार जाएं ? निराश हो जाएं ? हमने सपने देखे थे, आज सपने टूट गए तो क्या हुआ ? हमें सपनों को उत्तराधिकार के रूप में नई पीढ़ी को सौंपकर जाना है. सपने भंग होने के बाद भी साबुत रहते हैं. सपने टूट जाने के बाद भी जुड़ जाते हैं. आने वाली पीढ़ी को हम कौन से सपने उत्तराधिकार के रूप में सौंप कर जाएं ? आज भी देश में नौजवानों का बहुमत है. उनमें कुछ करने की उमंग है, उत्साह है. वे कुछ करें. हमारा सहयोग उन्हें होगा, हमारा समर्थन उन्हें मिलेगा. हमारा आशीर्वाद उन्हें मिलेगा. लेकिन क्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो कल्याणकारी हो. हमारा चिंतन ऐसा होना चाहिए, जो उदात्त हो. राजकारण ऐसा होना चाहिए, जो हमारे  राष्ट्र जीवन के शाश्वत मूल्यों की वृद्धि कर सके. खरात साहब ने ठीक कहा, " अभी सामाजिक क्षेत्र में बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है." वे अभी सालूपुर का उल्लेख कर कहे थे. शायद आपको मालूम नहीं है कि सालूपुर में जो हत्याकांड हुआ था, उसमें जो अभियुक्त पकड़े गए, उन पर अभी तक मुकदमा नहीं चलाया गया है, क्योंकि प्रशासन गवाह ढूंढने में असमर्थ है. किसी को सजा नहीं मिली.

मैं उस दिन दिल्ली पहुंच गया था. हरिजन भाइयों का सामूहिक चिता में स्नान हो रहा था. एक ओर सूरज छुप रहा था, मानो सूरज शर्म से लाल मुंह करके भाग जाना चाहता था और दूसरी ओर सामूहिक चिता जल रही थी. क्या जन्म के कारण व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होगा ? सम्मान का अधिकार नहीं होगा ? किस मुंह से हम दक्षिण अफ्रीका में होने वाले रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाएं ? फिर भी उठा रहे हैं, उठाना चाहिए. लेकिन यहां तो रंग भी एक है, चमड़ी का रंग भी एक है, रक्त का रंग भी एक है. समाज को टुकड़ों में बांटकर, अलग-अलग खेमों में विभाजित करके, हम सारे संसार को एक परिवार मानते हैं. ऐसी ऊंची-ऊंची बातें नहीं कर सकते. और अगर करेंगे, तो इनका कोई असर नहीं होगा.

भगवान बुद्ध, महावीर, गांधी ने चाहे अहिंसा को परम धर्म माना हो. मनुष्य के जीवन में हिंसा का कोई मूल्य नहीं. पंजाब लहूलुहान पड़ा है. मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि वे पराये हैं. जो आतंकवादी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए. उनको अलग-थलग किया जाना चाहिए. इसीलिए मैंने शब्द प्रयोग किया- समता पर आधारित ममत्व. ममतायुक्त समता. कथनी और करनी में बढ़ता हुआ अंतर विश्व में भी हमारी विश्वसनीयता को कम कर रहा है. और देश के भीतर कदम-कदम पर कठिनाइयां पैदा कर रहा है. आवश्यकता इस बात की है कि हम समय की चुनौतियों को समझें और उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए साहस जुटाएं, विवेक जुटाएं, शक्ति जुटाएं और छोटे-छोटे मतभेदों को ताक पर रखकर, ये गणतंत्र चिरंजीवी हो इस तरह की व्यवस्था का विकास हो, इस तरह का प्रबंध करने की तैयारी हो. 

आपने  मुझे सम्मान का अधिकारी समझा, इसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं. मैंने प्रयत्न किया है कि सारे देश का चित्र अपने सामने रख कर काम करूं. मैं जनता सरकार में विदेश मंत्री बना, तब मैंने दो राजदूत प्रधानमंत्री की सलाह से नियुक्त किए. एक नाना साहब और दूसरे थे नानी पालखीवाला. दोनों किसी पार्टी के नहीं थे. श्री कैलाशचंद्र हमारे हाई-कमीश्नर होकर मॊरिशस में गए. मैंने ये कभी नहीं सोचा- ’ये वेगले आहेत, ये वेगले आहेत. आपल्याच पैकी नाही.’ ये आपल्याच पैकी काय ? और मैं उस दिन कश्मीरियों में बैठा था- तो कहने लगे, ये हमारी जाति वाले नहीं हैं- गैर जाति वाले हैं. अरे सब की एक ही जाति है. मनुष्य की एक ही जाति है. जाति जन्म से है. जन्म लेने की प्रक्रिया से है. सारे मनुष्य एक तरह से पैदा होते हैं और गधे दूसरी तरह से पैदा होते हैं. इसलिए जानवरों की अलग जाति है. और कहां मानव जाति का सपना. ’वसुधैव कुटुम्बकम’ और कहां दल, और दल में भी गुट. जनता पार्टी टूट गई- बड़ा दुख हुआ. मैं जानता हूं, हमारे कुछ मित्र इस दुख में सहभागी नहीं होंगे. वे सोचते हैं- टूट गया, तो अच्छा हुआ. मगर आप अपने को संभाल कर रखिए. ये टूटना इस देश की नियति हो गई है. बिखरना हमारा स्वभाव बन गया है. अकारण झगड़ा करना, ऐसा लगता है कि हमारे खून में घुस गया है.

आज भारत अगर चाहे, तो संसार में प्रथम पंक्ति का राष्ट्र बन सकता है. फिर मैं कहना चाहूंगा कि परकीय हमारे पैर नहीं खींच रहे. हम अपने ही पैरों में बेड़ियां डाले हैं. इन्हें हम तोड़ने का संकल्प करें. राष्ट्र को मिलन भूमि मानकर व्यक्ति से ऊपर उठकर जरूरत हो तो दल से ऊपर उठकर- ’तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें.’ व्यक्ति तो नहीं रहेगा. किसी ने मुझ से पूछा था- आपका सपना क्या है ? मैंने कहा- एक महान भारत की रचना. कहने लगे कि आपका सपना, क्या आपको भरोसा है कि आपके जीवन में पूरा हो पाएगा ? मैंने कहा- नहीं होगा, लेकिन सपना पूरा करने के लिए फिर से इस देश में जन्म लेना पड़ेगा. मैं जन्म-मरण के चक्र से छूटना चाहता हूं. लेकिन अगर मेरे देश की हालत सुधरती नहीं है, भारत एक महान-दिव्य-भव्य राष्ट्र नहीं बनता है, अगर हर व्यक्ति के लिए हम गरिमा की, स्वतंत्रता की गारंटी नहीं कर सकते, अगर विविधताओं को बनाए रखते हुए एकता की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर दूसरा जन्म लेकर भी जूझने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.

मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं. परमात्मा मुझे शक्ति दे. आपने मुझ से जो आशाएं प्रकट की हैं, मैं उनको पूरा करने के लिए बल जुटा सकूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Wednesday, July 15, 2026

जनप्रतिनिधि शासन का प्रशिक्षण लें

   


महाराष्ट्र के मुंबई के समीप  7 जनवरी, 2003 को केशव सृष्टि म्हालगी प्रबोधिनी के प्रशिक्षण केंद्र के लोकार्पण समारोह को  संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बात पर बल दिया कि जनप्रतिनिधियों को शासन चलाने से संबंधित प्रशिक्षण लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि रामभाऊ म्हालगी के संबंध में एक प्रसंग याद आ रहा है. उन्होंने जब लोकसभा में पंचवर्षीय योजना के संबंध में भाषण दिया, उस पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री यशवंत चव्हाण ने बहस का उत्तर देते हुए एक वाक्य में सारी चर्चा को समाप्त करने का प्रयास किया था. तब उन्होंने रामभाऊ के भाषण की ओर संकेत करते हुए कहा था- उनके वे शब्द मुझे अभी तक याद हैं, मैं दोहराता हूं कि ’नियोजन ह्या मंडलींचा विषय नाहीं.’ नियोजन से जनसंघ वालों का कोई संबंध नहीं है. उस दिन मुझे लगा और रामभाऊ ने भी अनुरोध किया, हम राजनीति में आ गए हैं, राष्ट्र की सेवा हमारा लक्ष्य है, अगर हम चुनाव लड़ेंगे, सत्ता में आने का प्रयास करेंगे, इसके लिए हमें सभी विषयों की जानकारी प्राप्त करनी होगी, शासन चलाने का एक तरह से प्रशिक्षण लेना होगा. 

राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन चलाने वाली सरकारी यंत्रणा, जिसे आप ’ब्यूरोक्रेसी’ कह सकते हैं, उसमें खाई बढ़ती जा रही है. लोकप्रियता एकमात्र निष्कर्ष है. मतदाता किसका समर्थन करेंगे, यह कह नहीं सकते. लेकिन जो भी चुनकर आएगा, वह अगर शासन चलाने के मामले में, राजकाज चलाने के मामले में बिल्कुल अनभिज्ञ होगा, तो लोकतंत्र, जड़ शासनतंत्र में बदल जाएगा. शासन चलाने की जो पद्धति है, उसमें अगर परिवर्तन किया जाए, तो बात अलग है, लेकिन बड़ी मात्रा में आज चुने हुए राजनीतिक नेताओं को ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर रहना पड़ता है. ब्यूरोक्रेसी का काम है कि वह सहायक हो, जानकारी दे, अपनी सलाह भी दे, लेकिन उस सलाह को नाप तौलकर व्यवहार में लाने की जिम्मेदारी राजनीतिक नेताओं की है. मैं देखता हूं कि यह जिम्मेदारी घट रही है. जो लोग राजनीति में जाना चाहते हैं या जो उसके लिए तैयार हो रहे हैं, वे बौद्धिक दृष्टि से अपने को समृद्ध कर रहे हैं, तैयार कर रहे हैं, ऐसा दृश्य हमें दिखाई नहीं देता. शायद ’प्रबोधिनी’ ये पहला प्रयास है अपने ढंग का. और इसलिए मैं इसका स्वागत करता हूं. प्रशिक्षण का रूप क्या हो, उसका विवरण क्या हो, ये प्रबोधिनी तय करेगी. ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. शासन भी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. 

लोकतंत्र में सत्ता का विभाजन होगा. एक्जक्यूटिव हैं, लेजिस्लेचर हैं और ज्यूडिशियरी की एक अलग भूमिका है. अब जिन्होंने अपने को उसके लिए तैयार नहीं किया है, उनसे यह आशा तो की ही जाती है कि राजनीतिज्ञ सत्ता में आने के बाद जल्दी से जल्दी अपने को तैयार करें. लेकिन तैयारी की कोई पृष्ठभूमि चाहिए. यही कठिनाई होती है. शासन जीवन के सभी क्षेत्रों में फैल रहा है. और भले ही हम कहें कि शासन में विकार कम होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है, संकुचित होती जा रही है. और आख़िर में वह थोड़े से चोटी के लोगों पर निर्भर करती है. उसमें जिन्होंने ट्रेनिंग ली है, इस अर्थ में उन्होंने नौकरी करने के लिए वह रास्ता चुना, उनमें और जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में आमना-सामना होता है, तो फिर ये अनुभव होता है कि जनप्रतिनिधि जितने तैयार होने चाहिए, उतने नहीं हैं. अभी तक ऐसा प्रयास नहीं हुआ था, वह हो रहा है और बड़ी अच्छी बात है. 

लोकसभा की आप डिबेट कभी सुनें जाकर. सदस्यों को समय नहीं मिलता, ये शिकायत होती रहती है, लेकिन उन्हें जब समय मिलता है तब वे क्या बोलते हैं मालूम नहीं. वे इसकी तरफ ध्यान नहीं देते, तैयारी नहीं करते. अब काम, कमीटियों में होता है, कमीटियों में उपस्थिति नहीं होती. तैयार होकर सदस्य नहीं आते. उनकी रुचि भी नहीं होती. जब तैयार होने की पृष्ठभूमि नहीं होती, इसलिए ऐसी ट्रेनिंग के लिए जनप्रतिनिधियों में रुचि पैदा होना भी जरूरी है. उनमें विषय को समझने की तैयारी हो, और फिर उसके अनुसार काम लेने की तैयारी हो. मैं समझता हूं कि प्रबोधिनी इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है. यहीं कहीं केशव सृष्टि है. मुझे इस नई सृष्टि को देखकर बड़ा आनंद हुआ है. यहां आने तक मुझे यह कल्पना नहीं थी कि इस सृष्टि का रूप क्या है ? जो कुछ आज मैंने देखा, मुझे आश्चर्य है, सुखद आश्चर्य है. अब कोई यह नहीं कहेगा कि नियोजन या मंडलींचा विषय नाही. उस विश्वास के अनुरूप  हम शासन के हर एक अंग को किस तरह से चला सकते हैं, किस तरह से सही परिणाम पा सकते हैं, इस दृष्टि से विचार करने की जरूरत है. और मैं समझ रहा हूं कि जो भी इस दिशा में प्रयास हुआ है, वह प्रशंसनीय है. बड़ी संख्या में हमारे कार्यकर्ता इसका लाभ उठाएं, प्रशिक्षित हों. पहले शिक्षित हों, फिर प्रशिक्षित हों, परंतु अभी तो ’शिक्षा’ ही शुरू नहीं हुई है. ये शिक्षा मराठी वाली शिक्षा नहीं है. ’शिक्षण’ अभी तो शिक्षण ही शुरू नहीं हुआ है. इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई है. लेकिन अब आवश्यकता का अनुभव हो रहा है. यह अभाव था. जो खल रहा है. और जो सत्ता में बैठे हैं, उनको तो ये अभाव ज्यादा खलेगा.

जो सत्ता में हैं, जो बाद में सत्ता में जाएंगे, उन्हें यह अभाव न खले, इसके लिए उन्हें अपने आप को अभी से तैयार करने की जरूरत है. यही प्रयास हो रहा है, बड़ी प्रसन्नता है. मैं सफलता की कामना करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए

   


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 20 फरवरी, 1999 को बस से लाहौर की यात्रा प्रारंभ की थी. वे 22 सदस्यों वाला एक प्रतिनिधिमंडल भी अपने साथ लेकर गए थे, जिनमें देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हस्तियां सम्मिलित थीं. लाहौर के ऐतिहासिक किले में अटलजी के सम्मान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भोज दिया था. इस अवसर पर उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कल आए थे, आज जा रहे हैं, दुनिया का यही तरीका है. लेकिन मैं अकेला नहीं जा रहा हूं. आया भी अकेला नहीं था. मेरे साथ एक प्रतिनिधिमंडल आया है, एक डेलीगेशन आया है. भारत के चुने हुए लोग. अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कमाने वाले मेरे साथ आए हैं. मुझे 24 घंटे मिले. लेकिन इन 24 घंटों में मुझे ऐसा लगता है कि दिल्ली और लाहौर  की दूरी कुछ कम हो गई है. हम कुछ नजदीक आ गए हैं. कुछ भरोसा बढ़ गया है. साथ मिलकर चलने के लिए कदम में कुछ तेजी आ गई है.

जैसा मैंने कल कहा था, मैं जानबूझ कर बस से आना चाहता था. पहले इरादा बाघा की सीमा से मियां साहब से मिलकर वापस जाने का था. उन्होंने कहा ऐसा नहीं हो सकता, दरवाजे से लौट जाएं ये भी कोई बात हुई. घर के भीतर तक आना चाहिए. लाहौर की कई यादें मेरे दिमाग में हैं. मैं पहली बार नहीं आया हूं और आखिरी बार भी नहीं आया हूं. पहली दफा जब मैं आया. अंग्रेजों का राज था. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. हाई स्कूल का विद्यार्थी था. उस समय अनारकली देखी थी. बाद में जब वजीरे-खारजा बनने के बाद आया, तो रात में पंजाब के गवर्नर साहब से मैंने कहा था कि मेरा जो ऒफिशियल प्रोग्राम है, उसमें अनारकली जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती. मगर अनारकली जाए बिना मैं कैसे दिल्ली वापस जा सकता हूं. रात में मेरे लिए अनारकली जाने का खास इंतजाम किया गया था. इस बार मैं नहीं गया, क्योंकि और नई कलियां खिल गई हैं. 

24 घंटे के भीतर हमने कुछ फैसले किए हैं, अच्छे फैसले किए हैं. मुझे भरोसा है आपको पसंद आएंगे. दुनिया हैरान है और हम भी कभी-कभी सोच-सोच कर संकोच में पड़ जाते हैं कि आखिर हम दौड़ क्यों रहे हैं ? कल मियां साहब ने भी यह सवाल उठाया था. यह सवाल हम सबको कुरेदता है. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है. साम्राज्यवाद समाप्त हो गया. कहते हैं वह ऐसा राज था, जिसमें सूरज नहीं डूबता था. मगर सूरज के देखते-देखते वह राज डूब गया. बेड़ियां टूट गईं. हथकड़ियां छूट गईं. जब तक हम पराधीन थे, गुलाम थे, यह कहकर अपना मन बहला लिया करते थे कि जब हम आजाद हो जाएंगे, तो ये करेंगे वो करेंगे. हर बात के लिए हम कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते थे. 

आज दुनिया कोई बहाना सुनने को तैयार नहीं है. आज हमारा मन भी नया बहाना गढ़ने को तैयार नहीं है. भगवान का दिया सबकुछ है. प्रकृति ने दौलत लुटाई है यहां. इतनी बड़ी आबादी है, जनबल है. मेहनती किसान है. पसीना बहाने वाला मजदूर है. थोड़ी-सी आमदनी में घर को कुशलता से चलाने वाली गृहणी है. विज्ञान और टेक्नोलॊजी पर प्रभुत्व जमाने वाले नौजवान हैं. फिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं ? कल प्रधानमंत्री जी ने मेरी कविता की कुछ पंक्तियां, कुछ लाइनें उद्धृत कीं. ’जंग न होने देंगे.’ यह कविता वजीर बनने के बाद नहीं लिखी गई है, पहले लिखी गई थी.
भारत-पाकिस्तान पड़ौसी साथ-साथ रहना है
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा है
रूसी बम हो या अमरीकी, खून एक बहना है
जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे
जंग न होने देंगे

मगर इसके पहले एक छंद मैं आपके सामने रखना चाहता हूं.

क्यों हमें जंग रोकना है ?
क्यों हमें ऐसे हालात पैदा करने हैं
जिनमें जंग न हो, अमन हो
शांति बने रहे, हथियारों पर भी खर्चा न हो
जितनी जरूरत का है, उतना ही हो

उस समय मैंने लिखा था-
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी

इस दुनिया में जिंदगी से बढ़कर क्या नियामत हो सकती है, जिंदगी से बढ़कर और क्या वरदान हो सकता है. कभी-कभी हम जिंदा हैं, तो शायद यह नहीं समझते कि जिंदगी कितनी कीमती है. जिंदगी कितनी अनमोल है.

हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
सृजन माइने निर्माण
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से

ऐसा नहीं कि हम निठल्ले बैठे हैं. निठल्ला बैठना भी नहीं चाहिए. हम जूझेंगे, लेकिन किससे जूझेंगे. पड़ौसी से नहीं, आपस में नहीं.
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी

हम दुनिया को दावत दे रहे हैं आइए, हमारी मदद करिए, साथ मिलकर चलिए. हम जानते हैं कि हमें अपना विकास करना होगा. अपने पैरों पर आप खड़े रहना पड़ेगा. मगर दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि हम अपने को टापू नहीं बना सकते. एक-दूसरे की मदद लेनी चाहिए. एक-दूसरे की सहायता से आगे बढ़ने की कोशिश होनी चाहिए. हम दुनिया को दावत दे रहे हैं कि आइए.

हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी
हरी भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे
जंग न होने देंगे

आप में से कोई पूछ सकता है जब आपने ऐसी कविता लिखी, जंग न होने देंगे, यह ऐलान कर दिया, तो फिर पोखरण विस्फोट करने की क्या जरूरत थी. यह सवाल उठ सकता है, उठना चाहिए. इस पर खुले दिल से बातें होनी चाहिए. हमने पोखरण विस्फोट हमले के लिए नहीं किया, बचाव के लिए किया है. हम तीन बार लड़ाइयों में फंस चुके हैं. हम हमेशा के लिए लड़ाई रोकना चाहते हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने में परमाणु विस्फोट हुआ था. उसके बाद भारत इंतजार करता रहा. हम उम्मीद कर रहे थे कि यह हथियार दुनिया में समाप्त कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दुनिया न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट की ओर नहीं बढ़ी. हथियार और संगीन होते गए. धारें और पैनी होती गईं. कुछ लोग इस काम में लगे रहे. हमारे वैज्ञानिकों ने कहा कि कुछ सोचने की जरूरत है. अणु शक्ति का शांति के लिए उपयोग हो यह बहुत जरूरी है. लेकिन विनाश के लिए इसका कोई उपयोग न कर पाए इसकी रोकथाम भी जरूरी है.

हमने विस्फोट करने के बाद ऐलान कर दिया कि अब हम विस्फोट नहीं करेंगे. हमने यह भी ऐलान कर दिया कि हम एटमी हथियारों का उपयोग करने वाले पहले देश नहीं होंगे. खुद उपयोग नहीं करेंगे, शुरुआत नहीं करेंगे. हमने यह भी कहा कि जिनके पास एटमी हथियार नहीं हैं, उनके खिलाफ हम एटमी हथियार काम में नहीं लाएंगे. नैम (NAM) के सदस्य के नाते, जिसकी अभी दक्षिण अफ्रीका में बैठक हुई थी, हमने फिर इस बात को दोहराया है कि एक वक्त का ढांचा बनाकर सारी एटमी हथियारों को खत्म करने का काम शुरू होना चाहिए. जरूरत क्या है एटमी हथियारों की. किसी जमाने में इन हथियारों ने, एटमी हथियारों ने एक रोल अदा किया होगा. बैलेंस ऒफ टेरर का. अब इसकी कोई जरूरत नहीं है. कितना खर्चा हो रहा है. होड़ लगी है. आज इस सवाल पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से भी बात हुई है. हमने तय किया है कि हम अपने ख्यालात का तबादला करते रहेंगे. भारत क्या कर रहा है, पाकिस्तान क्या कर रहा है. यह आपस में पता नहीं है. अगर पता लग रहा है, तो दूसरों से लग रहा है. दूसरे पूछते हैं कि क्या आपको मालूम नहीं है कि आपका पड़ौसी क्या कर रहा है. इस हालत को बदलने की जरूरत है.

विश्व में जनमत बनाना पड़ेगा. यह जरूरी है कि इस संबंध में भारत और पाकिस्तान मिलकर काम करें. दोनों की जिम्मेदारी बढ़ गई है. अब अमन के सिवा कोई रास्ता नहीं है. अब चिंगारी का खेल नहीं चलेगा. छोटी सी चिंगारी आग में बदल सकती है. आग सब कुछ जलाकर खाक कर सकती है. चिंगारी को रोकना होगा. ध्यान, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, इनके निराकरण की ओर लगाना पड़ेगा. किस तरह से हम पिछड़ रहे हैं ? किस तरह से ? लोग, जिस तरह की जिंदगी जीना चाहिए, उस तरह की जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं. इसके लिए शांति चाहिए. शांति के लिए जो मसले हैं, उनको हल करने की जरूरत है. मसले हल करने के लिए भरोसे की हवा पैदा करने की जरूरत है, विश्वास का वातावरण बनाने की जरूरत है.

सवेरे यह सवाल उठा कि मुझे मिनारे-पाकिस्तान जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए. प्रोग्राम बन गया था. लेकिन कुछ लोगों की राय थी कि अगर मैं वहां गया तो फिर पाकिस्तान के ऊपर मेरी मोहर लग जाएगी. मैंने कहा, क्या मतलब है इसका ? क्या पाकिस्तान मेरी मोहर से चलता है ? पाकिस्तान की अपनी मोहर है और वह चल रही है. लेकिन शक इतना गहरा है. हो सकता है कि मैं वापस जाऊं और मुझसे सवाल किए जाएं कि आप गए थे ऒफिश्यल विजिट पर, मिनारे-पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत. मैं जवाब दूंगा. मेरे जवाब से लोग संतुष्ट होंगे, मैं यह भी जानता हूं. लेकिन कुछ नहीं होंगे, यह भी मैं जानता हूं. लेकिन मुझे मिनारे-पाकिस्तान पर जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए, यह भी बहस का एक मुद्दा बन गया है. यह ठीक है कि हम बंटवारा नहीं चाहते थे. मैंने आपसे कहा, जब मैं यहां आया तब सारा हिन्दुस्तान एक था, अंग्रेज राज कर रहे थे. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. वह हिन्दुस्तान हमारी आंखों में है. देश का बंटवारा हुआ.

देश अलग-अलग राज्यों में बंटा, अलग-अलग राष्ट्रों में बंटा. हमारे दिल में घाव लगा. अब घाव भर गया है. दाग जरूर बाकी है. लेकिन वह दाग हमें इस बात की याद दिलाता है कि हमें मिलकर साथ रहना है. और साथ रहने के लिए मिलकर चलना जरूरी है.

पाकिस्तान फले-फूले हम चाहते हैं और हम फले-फूलें यह आप भी चाहते होंगे. इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता. ज्योग्राफी नहीं बदली जा सकती. आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ौसी नहीं बदल सकते. हम अच्छे पड़ोसी के नाते रहें. 1977-78 में भी हमने शुरुआत की थी, आपको याद होगा. दोनों देशों के बीच आना-जाना आसान कर दिया था. लोग अभी तक उस बात को याद करते हैं, हम फिर वह काम करने जा रहे हैं. आज कुछ फैसले हुए हैं. मैं एकतरफा उनका ऐलान नहीं करूंगा. वक्त आने पर उनका ऐलान होगा. लोग परिवार वालों से मिलने नहीं जा सकते. हाई कमीशन में भीड़ लगी है. दरवाजे वक्त पर खुलते हैं, वक्त पर बंद होते हैं. और अगर बेवक्त कोई मुसीबत आ जाए तो. और आती है मुसीबत. खबर देकर थोड़े ही आती है. लेकिन मिलने के लिए जा नहीं सकते हैं. अगर पहुंच भी गए, तो भी जिस शहर का वीजा बनाया गया है, उससे दूसरे शहर में जाना है तो पुलिस तस्वीर में आ जाती है और पुलिस के साथ क्या-क्या आ जाता है, यह बताने की जरूरत नहीं है. जो पुलिस वाले मेरी बात सुन रहे हों, बुरा न माने. जो यहां मौजूद हैं, मैं उनके लिए नहीं कह रहा. मैं एक सिस्टम की बात कह रहा हूं. पर इस चीज के बारे में भी सोचा जाना चाहिए. 

लोग मछलियां पकड़ने के लिए आते हैं. समुद्र में भटक जाते हैं. हवालात में पहुंच जाते हैं. मछली पकड़ने की बजाय ख़ुद पकड़ में आ जाते हैं. हमने तय किया है कि ऐसे लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिए. लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों के तय करने से बात नहीं बनेगी. यह मैं साल भर प्रधानमंत्री बने रहने के बाद समझ गया हूं. इसके लिए कुछ और करना पड़ेगा. लेकिन हम करेंगे, हमने तय किया है. हमारा फैसला है. स्थिति बदलनी चाहिए. हवा में और तरह की रंगत आनी चाहिए. दोस्ती की जरूरत है. दोस्ती के साथ भरोसे की जरूरत है. मैं चाहता था कि सरदार जाफरी साहब मेरे साथ आते. मगर वह आ न सके. उनका एक शेर आज मैंने यहां के एक अंग्रेजी अखबार में देखा.
तुम आओ गुलशने-लाहौर से चमन बरदोश
हम आएं सुबह बनारस की रौशनी लेकर
फिर उसके बाद यह पूछें कि कौन दुश्मन है

बहुत दिन दुश्मनी हो ली. अब कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए. बहनो और भाइयो, हमने पाकिस्तान के साथ-साथ, सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है. अभी श्रीलंका के साथ समझौता हुआ है फ्री ट्रेड के बारे में. बांग्लादेश के साथ भी हमने नहरी पानी का समझौता किया है. आपने यह भी पढ़ा होगा कि दिल्ली से लाहौर बस चल रही है, तो अब ढाका से कलकत्ता तक भी बस चलने वाली है. एक बस नहीं है. बस करो यह भी नहीं है. अभी तो शुरुआत करनी है. दोस्ती से कभी जी नहीं भरता. हां, दुश्मनी में ऐसा मुकाम जाता है  कि जब दिल करता है कि अरे छोड़ो. दुनिया में आर्थिक संबंधों का विकास हो रहा है. हम पाकिस्तान के साथ भी व्यापार के आर्थिक संबंधों में विस्तार के कदम उठाना चाहते हैं. अगर आपके पास बिजली ज्यादा है, हम खरीदना चाहेंगे. जरा भाव ठीक होना चाहिए. बाढ़ और तूफान के बावजूद हमारी गेहूं की फसल अच्छी हुई है. हमने मियां साहब से कहा कि हमने सुना है कि आप बहुत दूर से गंदम ला रहे हैं. हम आपके दरवाजे पर गंदम पहुंचा देते हैं. और चीजें हैं, गिना नहीं रहा हूं. 

मसले हल होंगे. मसले ठीक होने के लिए ठीक वातावरण बनाना चाहिए. कुछ कदम हिम्मत के साथ उठाने पड़ेंगे. और मैं आपसे वादा करना चाहता हूं. जहां तक हिम्मत के साथ कदम उठाने की जरूरत पड़ेगी, आप मुझे और मेरे साथियों को कमजोर नहीं पाएंगे. पीछे हटते हुए नहीं पाएंगे. जब पोखरण में एटमी विस्फोट करने का फैसला हुआ, तो मुझे लोगों ने मेरी ही कविता याद दिलाई थी. मैं हिरोशिमा गया था. मैंने नागासाकी का दृश्य देखा था. वहां बम चलाया जाता, उसकी जरूरत नहीं थी. वहां लड़ाई खत्म हो गई थी. मित्र देश जीत गए थे. वह आत्मरक्षा के लिए चलाया गया एटमी हथियार नहीं था. आज वे लोग भुगत रहे हैं.

मेरी कविता का शीर्षक था-हिरोशिमा की कविता. एक शायर के दिल की पीड़ा थी. और इसलिए जब एक गंभीर फैसला किया गया, तब भी मेरा दिमाग साफ था. हमें मिलकर एटमी वेपन फ्री वर्ल्ड का निर्माण करना है. हम अपने एटमी हथियारों को काम में लाएं, इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता. लेकिन इसके लिए दोस्ती का माहौल चाहिए. मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी 24 घंटे की यात्रा इस तरह का माहौल बनाने में मदद करेगी. मैंने कहा कि दिल्ली और लाहौर की दूरी थोड़ी कम सी हो गई है. ये दूरी हमें और कम करनी है. और केवल लाहौर की ही नहीं, सारे पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच नजदीकी लानी है. मुझे विश्वास है कि इस सब में पाकिस्तान के वजीरे-आजम का सहयोग और उनके साथियों का सहयोग मिलेगा. पाकिस्तान के अवाम का सहयोग मिलेगा. और हम मिलकर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगे.

आपने मेरा और मेरे डेलीगेशन का जो स्वागत किया, उसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं. मैं कोशिश करूंगा कि मन में जो आशाएं जगी हैं, उन आशाओं को हम लोग मिलकर पूरा कर सकें और साउथ एशिया में एक नया वातावरण और नई हवा पैदा कर सकें. बहुत-बहुत शुक्रिया.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता चाहते हैं

   


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 15 अगस्त, 1998 को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की प्राप्ति पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि देखते ही आधी शताब्दी बीत गई. लगता है कि कल ही की बात है. पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इसी स्थान पर पहली बार हमारा प्यारा तिरंगा नीले आसमान में फहराया था. उसके पश्चात प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर इस ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्रीय ध्वज फहराने की परंपरा चलती आ रही है. मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि यह सौभाग्य एक दिन मुझे भी मिलेगा. एक गरीब स्कूल मास्टर के लड़के का धूल और कुएं से भरी बस्ती से उठकर लाल किले की प्राचीर तक पहुंचना और स्वतंत्रता के पावन पर्व पर तिरंगा फहराना, यह भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और क्षमता को उजागर करता है. 

हम सब जानते हैं कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है. एक तरफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आंदोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएं सहन कीं, तो दूसरी ओर हजारों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फांसी का तख्ता चूम कर अपने प्राणों का बलिदान दिया. हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है. आइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े.

हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है. पचास वर्षों के इस छोटे से काल खंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं. लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी है. इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है- हमारे सेना के जवानों को. अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रख कर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते हैं. इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते हैं. सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियां हों या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिन्द महासागर का गहरा पानी, सभी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खड़ा है. इन सभी जवानों को, जो थल सेना, वायु सेना और जल सेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित हैं, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयां देता हूं और इतना ही कहता हूं कि हे भारत के वीर जवानों ! हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है.

सेना को समर्थन चाहिए जनता का. गत पचास वर्षों में किसानों और मजदूरों ने खेत-खलिहानों में, कल-कारखानों में देश की दूसरी रक्षा-पंक्ति को मजबूत किया है, हम यह भूल नहीं सकते. लाल बहादुर शास्त्री जी ने कहा था, "जय जवान, जय किसान," मानो हर कोई एक दूसरे के बिना अधूरा है, एक दूसरे के बिना अपूर्ण है.

मैंने अब इसमें नया आयाम जोड़ा है- ’जय विज्ञान’ 21वीं सदी में देश की सुरक्षा, देश का विकास बीती सदी के साधनों से नहीं किया जा सकता. 

इसी उद्देश्य से और केवल इसी उद्देश्य से हमने 11 मई और 13 मई को पोखरण में अणु विस्फोट किया था. पोखरण का विस्फोट वह एक रात का खेल नहीं था. हमारे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और हमारे सुरक्षा बलों के बरसों की तपस्या का यह फल था. 25 वर्ष पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस कार्य की नींव रखी थी, मैंने उस पर इमारत को खड़ा करने का प्रयास किया है. 

मैं जानता हूं कि केवल निमित्त मात्र हूं. इस महान उपलब्धि का सेहरा तो वैज्ञानिकों की कुशाग्र बुद्धि और जवानों की अतुलनीय मेहनत को जाता है. मैं इन सबको स्वतंत्रता के इस अत्यंत शुभ अवसर पर बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं.

मैं आप सबका भी बहुत आभारी हूं कि आपने परीक्षा की इस घड़ी में मुझे पूर्ण समर्थन देकर हौसला बढ़ाया. कुछ तत्वों को छोड़कर हर भारतीय, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में खड़ा हो, उसने इस कदम का स्वागत किया. मानो हम में से हर एक का माथा उस दिन उन्नत हुआ, सीना चौड़ा हुआ और हम एक स्वर से और ऊंचे स्वर से कहने लगे- "गर्व से कहो, हम भारतीय हैं," क्योंकि उस दिन पोखरण में केवल अणु ऊर्जा का नहीं, राष्ट्र की ऊर्जा का भी प्रकटीकरण हुआ था. 

इसी क्षण मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत सदैव शांति का पुजारी था, है और रहेगा. हम शस्त्र का उपयोग आत्मरक्षा के लिए करना जानते हैं और चाहते हैं. हम अणु शस्त्र का प्रयोग आक्रमण के लिए नहीं करेंगे और इसलिए हमने नये अणु परीक्षण पर अपनी ओर से पाबंदी लगा दी है. हमने स्वयं आगे होकर दुनिया से अणु शस्त्र का पहला प्रयोग न करने का वायदा किया है. हम यह सब न किसी के दबाव में कर रहे हैं, न किसी के डर से. हम केवल स्वेच्छा से इसलिए कर रहे हैं कि विश्व शांति और निरस्त्रीकरण में हमारी गहरी आस्था है. अणु अस्त्र रहित दुनिया, यह हमारा सपना है, जिसे हम साकार करना चाहते हैं. 

प्रारंभ में दुनिया के कुछ राष्ट्रों ने राष्ट्रीय सुरक्षा की हमारी आवश्यकता की नीति और नीयत पर संदेह किया. कुछ ने हम पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. अब परिस्थिति बदल रही है. दुनिया अब भारत की भूमिका को धीरे-धीरे समझ रही है. हम उन्हें अपना दृष्टिकोण समझाने में सफल हो रहे हैं. इसके चलते कुछ आर्थिक प्रतिबंध ढीले भी पड़ने लगे हैं. दुनिया की इस बदलती दृष्टि का हम स्वागत करते हैं.

इसके साथ एक बात और हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं. भारत एक महान देश है. हमारी जनता पराक्रमी है. अपने गौरव के लिए बहादुर जनता हर संकट का मुकाबला कर सकती है. इसका हमने इतिहास को बार-बार परिचय दिया है.

मैं अहंकार से नहीं, विनम्रता से, आह्वान के रूप में नहीं, चुनौती के रूप में नहीं, आत्मविश्वास से कहना चाहता हूं कि दुनिया की कोई भी ताकत हमें अपने निर्धारित मार्ग से दूर नहीं कर सकती. राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं.

हम अपने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारना चाहते हैं. हम जानते हैं कि युद्ध जीतने का सबसे आसान तरीका युद्ध को न होने देना है. पाकिस्तान से हम किसी भी विषय पर किसी भी स्तर पर और कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं.

आज सब जानते हैं कि कोलम्बो में सार्क सम्मेलन के अवसर पर मैंने इस बात की पहल की थी. मुझे थोड़ा सा दुख हुआ कि हमें अपेक्षित उत्तर नहीं मिला. फिर भी मैंने आशा नहीं छोड़ी है. इस मास के अंत में दक्षिण अफ्रीका में होने वाले गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के अवसर पर मैं फिर संवाद का प्रयास करूंगा.

मेरी मान्यता है कि दुनिया में कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जिसका बातचीत से हल नहीं हो सकता. इसलिए पाकिस्तान हो या ईरान, हम सबसे मैत्री भाव से बातचीत करके आपसी समस्याओं का हल ढूंढने के लिए प्रयास करते रहेंगे.

गत कुछ दिनों में जम्मू व कश्मीर में उग्रवादियों की कार्रवाइयां बढ़ गईं. उनके द्वारा हिमाचल में हुआ हत्याकांड एक बड़े षडयंत्र का भाग मालूम होता है. सीमा पार से प्रतिदिन होने वाली यह आतंकवादी कार्रवाइयां अघोषित युद्ध के समान हैं. सरकार ने इन घटनाओं को बहुत ही गंभीरता से लिया है. हम पूरी ताकत के साथ इसका मुकाबला कर रहे हैं और आतंकवाद को परास्त करके ही रहेंगे. 

व्यक्तिगत जीवन हो या राष्ट्र जीवन, इक्यानवीं वर्षगांठ बीते हुए अर्ध शताब्दी के जीवन का लेखा-जोखा लेने का स्वर्णिम अवसर होता है. हम सबके लिए आज का क्षण भी सिंहावलोकन का क्षण है. आज हम एक क्षण के लिए सिंह की तरह पीछे मुड़ कर देखें और फिर  21वीं शताब्दी में छलांग लगाने के लिए अपने आपको तैयार करें. 

लेखा-जोखा लेते समय एक गलती अकसर हो जाती है. हम अपनी उपलब्धि को कम आंकते हैं और कमजोरी को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं. जिसके परिणामस्वरूप देश में निराशा के स्वर को ज्यादा बढ़ते हुए देखता हूं. बात थोड़ी बहुत बिगड़ी भी होगी, लेकिन इतनी बिगड़ी नहीं कि सुधारी न जा सके. हमारे शास्त्रों में कहा है- "आत्मप्रशंसा मूर्खों का लेखा-जोखा है."

जब हम आजाद हुए थे, तब कुछ पश्चिम के पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि हम जनतंत्र और स्वतंत्रता के लायक नहीं हैं. जल्दी ही हम बिखर कर नष्ट हो जाएंगे. लेकिन आज गर्व से कह सकते हैं कि न हमने केवल हमारी अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा की है, अपितु विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र सफलतापूर्वक चला कर दिखाया है. जो राष्ट्र हमारे साथ आजाद हुए वे लभगभ सभी कभी न कभी तानाशाही या सेनाशाही का शिकार हुए, लेकिन हमने लोकशाही का दीप हमेशा जलाए रखा.

आज की लोकसभा बारहवीं लोकसभा है. मैं हिन्दुस्तान का ग्यारवां प्रधानमंत्री हूं. छोटे से देहात की चौपाल से लेकर संसद तक से सत्ता परिवर्तन होते हुए दृश्य को हमने देखा है. इस सबका श्रेय आप सबको है. हर चुनाव में आपने ऐसा चमत्कार करके दिखाया कि सभी पंडित-ज्ञानी हतप्रभ रह गए हैं. आपको बहुत-बहुत बधाई. जब तक आप जागरूक हैं, हमारे जनतंत्र पर कोई आंच नहीं आ सकेगी. आज के स्वर्ण जयंती समापन समारोह के अवसर पर एक महत्वपूर्ण तथ्य पर पूरे राष्ट्र को सोचना है. स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और पंथ निरपेक्षता, ये चारों एक दूसरे के पूरक हैं. हमें हर हालत में स्वतंत्र रहना है. स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त है- राष्ट्रीय एकता. राष्ट्रीय एकता के लिए लोकतंत्र जरूरी है. पंथ निरपेक्षता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का अटूट हिस्सा है. मैं और मेरी सरकार इन चारों तत्वों के प्रति प्रतिबद्ध है. 

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम एक राष्ट्र के नागरिक हैं. लद्दाख से लेकर निकोबार तक फैला हुआ है, यह देश. गारो पर्वत से लेकर गिलगित तक इसका विस्तार है, यह एक प्राचीन देश है. इसकी सभ्यता और संस्कृति 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है. इतना विशाल देश, इतनी विविधताओं से भरा हुआ देश भाषाओं, उपासना पद्धतियों, रहन-सहन, खान-पान की भिन्नताओं के बावजूद लोकतंत्र के सूत्र में बंधकर सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए कमर कसकर जुटा हुआ है. साथ-साथ हम इसे भी भूल नहीं सकते कि हमें जनतंत्र को विकृतियों से बचाना है. 

हम संसद और विधानमंडलों के सदनों में ऐसा व्यवहार करते हैं कि जिसे स्कूल की कक्षा में कोई भी शिक्षक कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगा. लोकशाही चर्चा से चलने वाली है. विपक्ष को कहने का, और सत्ता पक्ष को करने का अधिकार होना चाहिए. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधक नहीं. 

निर्भय और निष्पक्ष मतदान को और निखारना होगा. पद्धति में परिवर्तन कर उसे जातिवाद, हिंसा, धन, शक्ति आदि दुर्गुणों से मुक्त करना होगा, जिससे अगली शताब्दी में हमारा शासनतंत्र और भी निखर कर आए.

एक समय था, यह देश सोने की चिड़िया कहा जाता था. बाद में स्थिति बिगड़ी और हम गरीब राष्ट्रों में गिने जाने लगे. गत कुछ वर्षों में हमारे किसानों और खेतिहर मजदूरों ने कड़ी मेहनत करके देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया है. भूखे पेट कोई सेना नहीं लड़ सकती. भूखा देश चैन की नींद नहीं सो सकता. हमारे किसान-मजदूर भाइयों ने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाकर अपनी ’अन्नदाता’ की उपाधि सार्थक की है. मैं तो भगवान से केवल इतनी ही प्रार्थना कर सकता हूं ’अन्नदाता सुखी भव:’.

इस आनंद में दुख की छाया छिपी है. आज हमारे इस अन्नदाता की स्थिति विकट हुई है. मुझे इस बात की अत्यधिक पीड़ा है कि इस वर्ष कुछ प्रांतों में किसानों को कर्ज का बोझ असह्य होने के कारण आत्महत्या करनी पड़ी. मैं इनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता हूं. इन किसानों को श्रद्धांजलि के रूप में मैंने एक निर्णय लिया है. फसल बीमा योजना का विस्तार किया जाएगा, नई फसलें इसमें जोड़ी जाएंगी और भौगोलिक क्षेत्रों में भी इसे बढ़ाया जाएगा.

किसानों की सही आर्थिक स्थिति की जांच-पड़ताल करने के लिए और उसमें सुधार के सुझाव देने के लिए एक उच्चाधिकार संपन्न आयोग गठित किया जाएगा. मैं किसान भाइयों को आश्वस्त करना चाहता हूं, आप हमारे देश की रीढ़ की हड्डी हैं. आपको इस शासन में कभी झुकने की नौबत नहीं आएगी. उड़ीसा में बोलनगीर-कालाहांडी-कोरापुर एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आज भी लोग भूख से पीड़ित हैं. स्वतंत्रता के पचास वर्षों के बाद भी देश में लोग भूखे रहें, यह हम कल्पना भी नहीं कर सकते. मैंने योजना आयोग से कहा है कि इस क्षेत्र में रोजगार आश्वासन योजना की रकम दुगुनी कर दें. मेरा प्रयास रहेगा कि देश में अन्न के अभाव में किसी को भी अपनी जान न खोनी पड़े.

व्यापार, उद्योग और सेवाओं में भी देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है. हमारे कुछ उद्योग तो विश्व की स्पर्धा में अपने झंडे गाड़ रहे हैं. इस सफलता के लिए मैं सभी मजदूरों, कर्मचारियों, प्रबंधकों, उद्योगपतियों व व्यापारियों को बहुत बधाई देता हूं. लेकिन हम जानते हैं कि यह सफलता एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं. हमारा अंतिम लक्ष्य है- भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में दुनिया में उभारना. 

मैं जानता हूं कि यह कहना जितना आसान है, करना कठिन है. इसके लिए हमें कठोर परिश्रम, प्रामाणिकता और स्वावलंबन का मार्ग अपनाना होगा. विश्व के दर्जे का माल तैयार करना पड़ेगा, जो घरेलू और विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके. अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है.

लेकिन हम उदारीकरण का अनुचित लाभ नहीं उठाने देंगे. आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में हमने परियोजनाओं को तीव्रता से लागू करने का निर्णय किया है.

’स्वदेशी’ का अर्थ यह नहीं, हम कूपमंडूक हो जाएं. नई  दुनिया छोटा सा गांव बन गई है. हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं. हम इसे खुली अर्थव्यवस्था में भी अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर विश्व स्पर्धा में डटकर खड़े रह सकते हैं, और ऐसा हमारा विश्वास है, हम डटकर खड़े रहेंगे. 

आज के स्वतंत्रता दिवस की इक्यानवी वर्षगांठ केवल हमारे देश में नहीं, दुनिया भर में मनाई जा रही है. हर देश में बसा भारतीय मूल का नागरिक यह पावन पर्व हर्ष और उल्लास के साथ मना रहा है. मैं विदेशों में बसे सभी भारतीयों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देता हूं. इनमें से कुछ देशों में भाई-बहन हमारे इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण टीवी पर देख रहे होंगे.

अनिवासी भारतीयों ने, जहां वे बसे हैं, उन देशों की अर्थव्यवस्था में मजबूती लाई है. अब उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने का अवसर मिला है. हमने अब रिसर्जेट इंडिया बॊन्ड्स निकाले हैं. दुनिया भर में बसे अनिवासी भारतीय इस अवसर का लाभ उठा रहे हैं. अभी तक इस योजना में पांच हजार करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आए हैं. मुझे विश्वास है कि अनिवासी भारतीय और भी इसका लाभ उठाएंगे. देश का आर्थिक विकास अपने साथ-साथ समस्याएं भी लेकर आता है. हमें उन्हें हल करना है.

मैं जानता हूं कि आप सब और खास कर बहनें कुछ चीजों की बढ़ती कीमतों से खासी परेशान हैं.  मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं. इसमें सरकार से ज्यादा प्रकृति का दोष है. लेकिन मैं समझता हूं कि यह कहने से आपका बोझ तो हल्का नहीं  होता है. वित्त मंत्रालय और राज्य सरकारें मिलकर इस महंगाई से जूझने का अभियान शुरू करेंगी. व्यापारी वर्ग से भी अब मैं इसमें सहयोग चाहता हूं. वे अनावश्यक जमाखोरी और मुनाफाखोरी को बढ़ावा न दें. हम ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में हिचकिचाहट नहीं करेंगे. मैं जानता हूं कि आने वाले दिन त्योहारों के दिन हैं. मेरी यह कोशिश होगी कि बढ़ती महंगाई आपके त्योहारों का रंग फीका न कर दे.

देश में एक और महत्वपूर्ण समस्या है- भ्रष्टाचार की. भ्रष्टाचार का रोग देश को कैंसर रोग के समान खाये जा रहा है.  हमने इससे लड़ने का निर्णय लिया है. इसका आरंभ ऊपर से किया है. लोकसभा में पेश किए लोकपाल विधेयक में मैंने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा है. इससे हमने उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार से लड़ने की हमारी नीति और नीयत स्पष्ट की है. इसके साथ हम अफसरशाही के भ्रष्टाचार से भी लड़ना चाहते हैं. मैं जल्दी ही प्रधानमंत्री कार्यालय के उस कक्ष के क्रियान्वयन में तेजी लाऊंगा, जो भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की देखरेख करता है. 

"बेरोजगारी हटाओ", हम हमारे राष्ट्रीय एजेंडा का महत्वपूर्ण संकल्प है.  बेरोजगारी बड़ी समस्या है. यह सबके जीवन के साथ जुड़ी है. सबकी न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भी यही तरीका है.

पूर्ण रोजगार के लिए योजना बनाना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं. लेकिन इसके लिए नियोजन की पूरी प्रक्रिया में परिवर्तन करना होगा. बुनियादी जरूरत की चीजों और सेवाओं का उत्पादन जन साधारण द्वारा होना चाहिए. इसके लिए विज्ञान और टेक्नोलॊजी की सहायता लेनी पड़ेगी.

सरकार का फैसला है कि 10 सालों में 10 करोड़ लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसका अर्थ यह हुआ कि एक वर्ष में एक करोड़ लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसके लिए टॊस्क फोर्स गठित की जाएगी.

किसी भी आधुनिक समाज की प्रगति का मापदंड उस समाज में महिलाओं की स्थिति से होता है. हमने महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 फीसद आरक्षण देने का वायदा किया था. हमें खेद है कि इसे अभी तक पूरा नहीं कर सके हैं. 

लड़कियों को स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा देने का निर्णय तो हम ले ही चुके हैं. अब हम एक और बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं, प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाली सभी छात्राओं को उनकी पाठ्य क्रमिक पुस्तकें मुफ्त दी जाएंगी. इस पर 550 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.

महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला कल्याण बीमा योजना ’राजराजेश्वरी’ और लड़कियों के लिए एक विशेष योजना ‘भाग्यश्री’ इसी वर्ष दिवाली के आनंद पर्व से शुरू की जाएगी. इस योजना के लिए केवल एक महीने के लिए एक रुपया देना होगा. आवश्यकता होने पर वह एक रुपया देने वाले को 25 हजार रुपये के रूप में मिल सकेगा. इसका पूरा विवरण शीघ्र ही आपके सामने रखा जाएगा. 

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों को बराबरी और भागीदारी दिलाने के लिए हमने नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान तो किया है, लेकिन उसका क्रियान्वयन बहुत धीमे से होता है. मेरी सरकार का यह प्रयास रहेगा कि इस क्रियान्वयन में तेजी लाई जाए और इन वर्गों को नौकरियों देने के कार्य को जल्दी से जल्दी पूरा किया जाए. शासनतंत्र को इन वर्गों के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाया जाए.

युवा शक्ति ही राष्ट्र की शक्ति है, देश का भविष्य है. बहुत वर्ष पहले मैंने बाबा आम्टे का एक वाक्य पढ़ा था- "हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने, मरने में". हमारी भी यही इच्छा है. भारत के युवक-युवतियों को न किसी के सामने हाथ फैलाना चाहिए, न किसी पर अपने हाथों का जोर आजमाना चाहिए. सिर्फ अपने आपको राष्ट्र के पुनर्निर्माण के काम में झोंक देना चाहिए.

इसी हेतु हमने "राष्ट्रीय पुनर्निर्माण वाहिनी" के गठन की योजना बनाई है. 18 से 35 वर्ष आयु के युवक-युवतियां इसमें सम्मिलित हो सकेंगे. ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में आधारभूत सेवाएं, पर्यावरण की रक्षा करना, जनसंख्या के सवाल पर जन अभियान, नशीली दवाओं के प्रभाव के विरोध में लड़ना, शिक्षा का प्रसार, दलित वनवासी महिला उत्थान, खेल, कला, संस्कृति आदि क्षेत्रों में ये युवक-युवतियां काम कर सकेंगी. इसके लिए इन्हें मानधन भी मिलेगा. प्रारंभ में कुछ जिलों में और अंतत: सारे देश में यह योजना लागू की जाएगी. 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था. उसे उसी रूप में मनाना है. इस दिन से इस योजना का शुभारंभ होगा. युवक-युवतियों का मैं आह्वान करता हूं- आइए-, अपने यौवन का एक वर्ष देश को दान कर दीजिए और राष्ट्र को पुनर्यौवन प्रदान कर दीजिए.

21वीं सदी हमें दस्तक दे रही है. यह सदी सूचना की तकनीक की सदी होगी. भारत की सबसे बड़ी शक्ति है-भारत की बुद्धिमत्ता. विज्ञान और टेक्नोलॊजी में प्रशिक्षित व्यक्ति दृष्टि से विश्व में हमारा तीसरा स्थान है. हमें इस शक्ति का दोहन करना होगा. मेरी सरकार ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं. हमारी आकांक्षा है सूचना-तकनीक में महाशक्ति बनना. इस दृष्टि से मैं आज एक नये कदम की घोषणा कर रहा हूं. 

अंतरिक्ष एक नया क्षेत्र है, जो अगली सदी में मानव जाति को नई-नई संभावनाओं को तलाशने का मौका दे रहा है. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के काफी लाभ हैं, जिसे भारत को अपनी युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उपयोग में लाना होगा. मेरी सरकार "जय विज्ञान" के नारे के आधार पर युवाओं के सपने साकार करना चाहती है. इस दिशा में हम "स्वर्ण जयंती विद्या विकास अंतरिक्ष उपग्रह योजना" नामक एक नये उपग्रह पर आधारित  कार्यक्रम शुरू करेंगे. इस कार्यक्रम का पहला उपग्रह इन्सैट 3-बी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)  द्वारा  15 अगस्त, 1999 से पूर्व 12 महीने के एक रिकार्ड समय में बनाकर अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा. 

इस उपग्रह में 6 ट्रांसपोंडर्स ऒपरेशन नॊलेज को कार्यान्वित करने के लिए अलग से उपलब्ध होंगे, जिसका लक्ष्य देश में सभी विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर, इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर आधारित शिक्षा प्रदान करना होगा. विशेष रूप से सभी विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॊलेजों, चिकित्सा कॊलेजों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं तथा उच्च शिक्षा केंद्रों को अगले स्वतंत्रता दिवस से पहले सूचना तकनीक नेटवर्क से जोड़ दिया जाएगा. इस कार्यक्रम से राज्य सरकारों की विकास संबंधी संचार आवश्यकताएं भी पूरी होंगी.

आज महर्षि अरविंद की 125वीं जयंती समारोह का समापन होने जा रहा है. उन्होंने भारत के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जन्म की कल्पना की थी. आज हम उनकी कल्पनाओं को साकार बनाने का संकल्प करें. 

एक बार भारत रत्न डॊ. बाबा साहेब अम्बेडकर जी ने कहा था- " आर्थिक और सामाजिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी अधूरी है."  आज राजनीतिक स्वतंत्रता दिवस पर हम इस ध्येय वाक्य को भूले नहीं है. बीती हुई अर्द्ध शताब्दी में हमने अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता तो अक्षुण्ण रखी,  लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई अभी तक नहीं जीत सके हैं. हम देश को गरीबी से मुक्त नहीं करा सके हैं.  बेरोजगारी अभी भी अभिशाप बनी हुई है. निरक्षरता का कलंक आज भी हम मिटा नहीं सके हैं. जातिवाद और संप्रदायवाद का भूत अभी भी बीच-बीच में सर उठाता है.

आइए, हम सब मिलकर स्वतंत्रता की दूसरी अर्द्ध शताब्दी के प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर प्रतिज्ञा करें कि 50 वर्षों पूर्व हमने राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई जीती थी. अब हमारा उद्देश्य होगा- आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई जीतना.

प्रधानमंत्री के अभी तक के छोटे से कार्यकाल में मैंने सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया है. आम सहमति की राजनीति से हमारी राजनीति है. कावेरी का ही उदाहरण लें. वर्षों से कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी के बीच में कावेरी के जल को लेकर विवाद चला आ रहा था. कभी-कभी तो विवाद ने अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया. जहां कहीं आग लगती है, वहां पानी से उसे बुझाने की कोशिश की जाती है. लेकिन जब पानी में ही आग लग जाए, तो उसका इलाज क्या है ? इलाज है- समझदारी, भाईचारा, सहनशीलता, देशभक्ति और अपने हितों के साथ दूसरों के हितों के बारे में सोचना. हाल ही में हुआ कावेरी का समझौता इसी का परिचायक है. 

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हमारी अनेक नदियों का पानी समुद्र में चला जाता है, और हम किसको कितना पानी मिले, इस विवाद में उलझे हुए हैं. वर्षों से ये विवाद पड़े हुए हैं. इस स्थिति को बदलना होगा. हमारी नदियां, जो हिन्दुस्तान के राज्यों को जोड़ती हैं, उन्हें हिन्दुस्तानी के दिलों को भी जोड़ना चाहिए. एक राष्ट्रीय जल नीति बनाने की आवश्यकता है. हमने ऐसी नीति बनाने का वायदा किया है. लेकिन यह सबके सहयोग और धीरज से ही संभव हो सकता है.

मेरी सरकार लगभग पिछले पांच महीनों के शासन के राष्ट्रीय एजेंडे में किए गए वायदों को पूरा करने के लिए बड़ी गंभीरता से प्रयास करती रही है. हमारी सरकार मिली-जुली सरकार है. मिली-जुली सरकार का अपना धर्म होता है, जिसका निष्ठापूर्वक पालन होना चाहिए. हमने अपने गठबंधन के लिए एक साझा कार्यक्रम यानी एक नेशनल एजेंडा तैयार किया. हमने सभी विवादास्पद मुद्दों को इस एजेंडे से बाहर रखा है. आज तक हमने जो भी किया है, वह राष्ट्रहित में किया है. हमने हमेशा राष्ट्रहित को दलहित से और व्यक्तिगत हित से ऊपर माना है.

राष्ट्र आज एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. आज हमारी पूरी राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के दौर से जा रही है. ऐसी स्थिति में हर एक दल को और हर एक राजनेता को जिम्मेदारी के साथ चलना होगा. राष्ट्रहित को चोट पहुंचाने वाले किसी भी कार्य के लिए इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा. 

आज की जनता को चाहिए कि वह मौजूदा राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था के बारे में गंभीरता से सोचे. हम सबके सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं. क्या बार-बार चुनाव होना देश के लिए अच्छी बात है ? क्या इन चुनावों पर होने वाले भारी खर्च का बोझ बार-बार उठाना देशहित में है ? 

मुझे प्रधानमंत्री का पद संभाले केवल पांच महीने हुए हैं. संसद में हमारा बहुमत बहुत कम है. मैं जानता हूं कि साझा सरकारों की मर्यादाएं होती हैं. मैं जानता हूं कि आज की व्यवस्था में निर्दोष संन्यासी को सत्तापिपासु फांसी चढ़ा देते हैं. लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैंने जीवन में कभी सत्ता के लालच में सिद्धांतों के साथ सौदा नहीं किया है, और न मैं भविष्य में करूंगा. सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेरे लिए एक जैसा है. मैं 40 साल तक विपक्ष में रहा और अपने कर्तव्य का पालन करता रहा. मेरे विरोधी भी उसकी प्रशंसा करते हैं. लेकिन वैसा विरोध आज मुझे दिखाई नहीं देता, जब मैं कुर्सी पर बैठा हूं. यह परिवर्तन क्या हो गया है ?

आज मुझे डॊ. शिवमंगल सिंग ’सुमन’ की एक कविता याद आती है-
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
कर्तव्य पथ पर जो मिले
यह भी सही, वह भी सही
वरदान मांगूगा नहीं, वरदान मांगूगा नहीं

मित्रों, मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं कि कितनी भी आपत्तियां आएं, हम वरदान के लिए झोली नहीं फैलाएंगे. आखिरी क्षण तक वरदान की तलाश नहीं करेंगे. न मैं संघर्ष का रास्ता छोड़ूंगा. बस मुझे आपका साथ चाहिए. भारत की  100 करोड़ जनता का आशीर्वाद चाहिए.

जीवन में ऐसा क्षण आता है, जब व्यक्ति चौराहे पर खड़ा होकर सोचता है-
राह कौन सी जाऊं मैं ?
चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूं आखिरी चाल कि
बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं ?

फिर लगता है, नहीं बाजी छोड़ कर मैं विरक्ति में नहीं जा सकता. मुझे जूझना होगा और फिर मैं लाल किले की प्राचीर से आपकी उपस्थिति में अपने संकल्प को दोहराता हूं-
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

बहुत-बहुत धन्यवाद
जय हिन्द
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Tuesday, July 14, 2026

राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है वंदे मातरम

   


महाराष्ट्र के मुंबई के विलेपार्ले में 1996 में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं जयंती के समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वंदे मातरम के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- सचमुच मैं महोत्सव समिति को बधाई देकर उनका अभिनंदन करना चाहता हूं. समिति ने वंदे मातरम को, लेखक श्री बंकिमचंद्र को- जिन्हें ऋषि के रूप में याद किया जाता है- वस्तुत: वह हमारी विश्व परंपरा में थे, उनकी स्मृति को  एक बार फिर से जन-जन तक पहुंचाने के लिए यह अनुष्ठान बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न किया. वंदे मातरम एक शताब्दि से अधिक समय से इस देश को अनुप्राणित करता रहा है. लेकिन इतने दिनों बाद, उसे फिर से प्रस्तुत करने का जो प्रयत्न हुआ है, वह अपने में एक महनीय प्रयत्न है और मैं महोत्सव समिति को एक बार फिर बधाई देना चाहता हूं. मैं नहीं जानता, देश के किसी भाग में इस तरह का शताब्दि समारोह मनाया गया, कम से कम मुझे उसका निमंत्रण नहीं आया. इसलिए पहले जब इस कार्यक्रम का निमंत्रण मिला, तो सहज स्वाभाविक रूप से मेरी इच्छा हुई कि ऐसे कार्यक्रम में मुझे जाना चाहिए. लेकिन उस समय मेरे विदेश जाने की बात थी, न्यूयॊर्क में जनरल असेंबली का अधिवेशन चल रहा था, उसकी एक समिति के साथ मैं जुड़ा हुआ हूं. मैंने डॊ. लेले साहब को लिखा था कि अगर मैं विदेश नहीं गया तो आऊंगा. मगर संयोग देखिए कि मैं विदेश भी गया और यहां भी आ गया. यह समिति के सदस्यों के आत्मीयता के कारण हुआ है.

अभी जो मैंने विस्तृत विवरण सुना-किस किस तरह से विद्यालयों में, किस तरह से छात्रों के बीच, किस तरह से विविध प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करके राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम का शताब्दि का समारोह मनाया गया है, यह सचमुच में एक प्रेरणादायी प्रसंग है. मैं उन कार्यक्रमों के विस्तार में नहीं जाता, मैं तो उनके बारे में पढ़ रहा हूं, सुन रहा हूं- आपने तो उनको देखा होगा. मैं देखने से वंचित हो गया. मैंने डॊक्टर साहब को पूछा कि मेरे भाषण के अतिरिक्त और भी कोई कार्यक्रम है या नहीं ? कार्यक्रम होना चाहिए था. या शायद मुझे समय पर आना चाहिए, मैं देर से आया हूं- या कार्यक्रम पहले हो गया हो.  

वंदेमातरम के साथ हमारी राष्ट्रीय स्मृतियां जुड़ी हुई हैं. उसके साथ पराधीनता की पीड़ा जुड़ी हुई है, पराधीनता के पाश को काट कर फेंकने का वज्र संकल्प जुड़ा हुआ है. एक राष्ट्र के संघर्ष की कहानी जुड़ी हुई है. बलिदानों के प्रसंग जुड़े हुए हैं. काले पानी की काल कोठरियों में बेड़ियों की झंकार के बीच सुनाई देने वाली उसकी गूंज जुड़ी हुई है. हमें ऐसा राष्ट्र गीत उपलब्ध हुआ है, जो सचमुच में हमारे हृदय के तारों को झंकृत कर देता है. जो गीत फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए गाया जाता है, जो गीत बलिदान के रक्त से लिखा गया था, जो गीत संपूर्ण संघर्ष की कहानी कहता है. और इस धरती के प्रति- भारत मां के प्रति, जो श्रद्धा निवेदन में अपूर्व है, उस गीत की शताब्दि मनाकर आपने सचमुच में उस गीत का सम्मान नहीं किया- हमने अपनों को सम्मानित किया है. हमने अपनों को एक आदर्श दिया है.
 
मैंने कहा आपसे कि बंकिमचंद्र की गणना ऋषियों में होगी. कल्पना करिए उस सौ-सवा सौ वर्ष पहले के काल का- किस तरह से विदेशियों ने देश को पददलित किया था, किस तरह से देश को बांटने की साजिश की थी, किस तरह से अत्याचार और आतंक के साम्राज्य को स्थापित किया था. लेकिन उसी के साथ त्याग और बलिदान की एक परंपरा, एक के बाद एक फांसी के तख्ते पर चढ़ने के लायक भारतमाता के सुपुत्र, दमन और आतंक के खिलाफ छाती तानकर खड़े रहने की तैयारी में इस गीत ने देश में नये प्राण फूंके थे. वंदेमातरम एक मंत्र बन गया था. विदेशी उसे सुनकर चिढ़ते थे, वंदेमातरम का गीत गाकर, वंदेमातरम का नारा लगाकर, देश भक्तों के हृदय पुलकित हो जाते थे. जो फांसी के तख्तों पर नहीं चढ़ सकते थे. वे भी वंदेमातरम का गीत गाकर आनंदित अनुभव करते थे, अपने को गौरवांवित अनुभव करते थे. शायद ही संसार के किसी देश में त्याग और बलिदान से पवित्र ऐसा गीत, राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया हो.

यह दुर्भाग्य की बात है कि यह गीत भी विवाद का विषय बन गया था. अभी भी थोड़ा विवाद हो रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण विवाद सामने आया, मुंबई के लोकसभा सदस्य श्री रामभाऊ नाईक के प्रयत्नों से. उनका अभिनंदन होना चाहिए. वह चुनकर गए, तो उन्होंने अपना प्रयत्न प्रारंभ किया कि संसद के सत्र का जब प्रारंभ होता है और जब सत्र समाप्त होता है, तो वह राष्ट्रगीत के साथ होना चाहिए. महाराष्ट्र के विधान मंडल में पहले से ऐसा हो रहा है.  लोकसभा के अध्यक्ष श्री शिवराज पाटील को यह विचार पसंद आया. मैं उनको भी श्रेय देना चाहता हूं. लेकिन सदस्यों में मतभेद है. क्या आवश्यकता है ? यहां से प्रश्न शुरू हुआ. अभी तक राष्ट्रगीत नहीं गाया जाता था. अब उसकी क्या जरूरत है ? जब देखा कि यह विरोध का तर्क चलता नहीं है, अच्छा काम है जब शुरू हो, तबसे उसका उदात्त स्वीकार करना चाहिए, फिर कहा गया कि एक हमारी राष्ट्रीय धुन है, वंदेमातरम राष्ट्रीय गीत है- जनगणमन क्यों नहीं ? वंदेमातरम क्यों ? संविधान सभा की कार्यवाही देखी गई. संविधान सभा के अध्यक्ष डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने जो विरोध किया था, उसका उल्लेख किया गया. दोनों में से कौन पहला है, कौन बाद में है, इस तरह का सवाल नहीं है. यह राष्ट्रीय धुन है, यह राष्ट्र गीत है. वह भी विवाद हुआ था कि आरंभ किससे करें- अंत किससे करें- और एक दल के सदस्यों ने तो कहा कि यह गीत गाया जाए, इससे हम सहमत नहीं हैं. यह वही दल है, जिसने पहले विरोध किया था, पराधीनता के काल में- मनोवृत्ति बदली नहीं है. कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में वंदेमातरम गाया, तो उसका विरोध हुआ, मुस्लिम लीग के सदस्य नहीं, कांग्रेस का काम करने वाले मुस्लिम सदस्य विरोध करके चले गए. फिर गीत गाना रोक दिया गया- गीत गाना कम कर दिया गया. तुष्टिकरण की यह कहानी बहुत पुरानी है. इस तरह की बात को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. अगर कोई कहता है कि भारत को मां के रूप में वंदना करना मूर्तिपूजा है और हम मूर्तियों में विश्वास नहीं रखते, तो वह अपने विश्वास को अपने पास रख सकता है. उसके विश्वास को कोई ठेस नहीं पहुंचती. आखिर यह भारत मां है. हम मां के रूप में इसकी वंदना करते हैं. हम उसकी संतान हैं. हमने उसकी गोद में जन्म लिया है. हम इसके आंचल की छाया में बढ़ रहे हैं. और यह संस्कार कोई आज का संस्कार नहीं है. यह परकीय राज्य के विरोध में पैदा हुई भावना नहीं है.  

वाल्मीकि ने जब रामायण लिखी और उसमें लंका विजय वर्णन के बाद उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया. प्रभु रामचंद्र ने, वन में निवास करने वाले लोगों को इकट्ठा करके रावण पर विजय पाई. सोने की लंका पर अधिकार कर लिया. लेकिन उन्होंने लंका को अपने राज्य में नहीं मिलाया. लंका का शासन विभीषण को दे दिया. हमारे बहुत से राजनेताओं को यह पता नहीं है कि विभीषण कौन था ? मैं नाम नहीं ले रहा हूं, मैं इशारा कर रहा हूं, आप समझ जाएंगे- श्री वी.पी. सिंह का जब कांग्रेस से झगड़ा हो गया और वह कांग्रेस से निकल आए- तो उस समय कांग्रेस के जो सर्वेसर्वा थे- वह एक दिन अपने मित्रों के साथ बैठे हुए थे- और मित्रों में से किसी ने कहा कि वी. पी. सिंह तो विभीषण बन गए. तो उस नेता ने पूछा कि यह विभीषण कौन है ? उन्हें पता नहीं था. मैं उन्हें दोष नहीं देता. लेकिन भगवान राम ने विभीषण को राज्य सौंप दिया. और वापस अयोध्या चलने की तैयारी करने लगे, तो वानरों ने कहा, प्रभु सोने की लंका छोड़कर कहां जा रहे हो. चौदह साल भटकते हो गए. आपके साथ जंगलों की ख़ाक छानी, और बलशाली रावण से लड़े, अब तो अपना राज है, अब अयोध्या एक तो बहुत दूर है फिर वहां क्या परिस्थिति होगी, पता नहीं, स्वागत होगा कि नहीं होगा ? चौदह वर्ष का काल बड़ा लंबा काल होता है. और लंका सुनिश्चित है, अयोध्या की स्थिति अनिश्चित है. क्यों जाएं वहां ? यहीं बस जाते, उचित है, पर ऐसा था नहीं. अब प्रभु रामचंद्र ने लक्ष्मण से कहा- अपी स्वर्णमयी लंका, नमे लक्ष्मण रोचते जननी जन्मभूमी़श्च स्वर्गादपि गरियसी. सोने की लंका मेरे मन को नहीं भायी. यह मुझे पसंद नहीं है. जननी जन्मभूमि- स्वर्ग से भी मुझे प्रिय है. पृथ्वी को माता के रूप में देखना अर्थवेद का वचन है. पृथ्वी हमारी माता है. हम उसके पुत्र हैं. और अगर वंदेमातरम के रूप में हम उसी मां का वंदन करते हैं- वंदेमातरम- उसमें मूर्ति पूजा कहां से आती है ? इस्लाम भी अपने ढंग से आदर व्यक्त करता है. जो हज के लिए जाते हैं, वहां जो पवित्र पत्थर है, उसे चूमते हैं, माथा टेकते हैं. नमाज़ पढ़ने के लिए भी धरती चाहिए. नमाज़ धरती पर ही पढ़ी जा सकती है. आसमान में नहीं, धरती पर माथा रखकर- मुझे ऐसे बहुत मुस्लिम लोग मिले हैं, जो इतनी बार नमाज़ पढ़ते हैं कि माथे पर निशान बन गया. हम उनकी भावना को समझते हैं. उन्हें हमारी भावना समझनी चाहिए. यह मूर्ति पूजा नहीं है. आखिर मजारों पर चादर चढ़ाई जाती है, क्या वह एक ढंग की पूजा नहीं होती. आदर का प्रकटीकरण नहीं है ? मुस्लिम देशों में और तरह की रीतियां प्रचलित हैं. हम उसकी आलोचना नहीं करते, हम सर्व-धर्म-समभाव में विश्वास करते हैं. कोई अगर अपने मार्ग से ईश्वर तक पहुंचना चाहता है, तो उसका स्वागत है. यह बात अलग है कि मार्ग के बारे में प्रामाणिकता चाहिए, उत्सर्ग चाहिए. लोगों का हृदय जीतने का प्रयास चाहिए. बल प्रयोग से नहीं, जोर जबरदस्ती से नहीं. लेकिन वंदेमातरम में मूर्ति पूजा है, इसलिए हम उसका गायन नहीं कर सकते, यह हास्यास्पद है. इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता. उस समय स्वीकार किया गया, वह गलती की गई थी. अब हम उस गलती का परिमार्जन कर रहे हैं. लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा, मुस्लिम लीग ने अंतत: लोकसभा में अपने विरोध को वापस ले लिया. बाद में सबने स्वीकार किया. मैं और दलों की चर्चा नहीं करता, वह निर्णय कर रहे थे- उधर ही देखकर. वह टालना चाहते थे. यह भी राजनीति का मुद्दा बन गया. दोस्तों कभी-कभी इस स्थिति पर बड़ा दुख होता है. देशभक्ति राजनीति का मुद्दा हो जाए, भारत माता के प्रति आदर व्यक्त करना, यह संकुचित स्वार्थ से जुड़ जाए, शायद इस तरह की वृत्ति अपनाने का यह हम दुष्परिणाम भुगत रहे हैं. लेकिन अंत में हुआ, अब वंदेमातरम से संसद के सत्र की समाप्ति होती है. सामूहिक रूप से वंदेमातरम का गान.

आनंदमठ में जिस तरह से उसका उल्लेख है- आनंदमठ संन्यासियों के विद्रोह की कहानी है. प्राय: सभी देशों में और विशेष करके भारत जैसे देश में राजनीतिक परिवर्तन से पहले, एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण होता है. राजनीतिक परिवर्तन के पहले समाज की मानसिकता को तैयार करने के लिए साधु, संत, संन्यासी निकल पड़ते हैं. उस समय हथियार उठाकर जो लोग अंग्रेजों से लड़ना चाहते थे, उनके लिए भी रास्ता खुला हुआ था. आनंदमठ की कहानी भी बड़ी रोमांचक कहानी है. मैं आपसे कहूंगा कि आनंदमठ अवसर मिले तो पढ़िए. भारत की सभी भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ है. उससे परिस्थिति का थोड़ा सा परिचय मिलता है. आज वंदेमातरम को बड़े प्रभावशाली ढंग से गाया जाता है. एक अल्प गायन भी होता है. सामूहिक गायन भी होता है, मगर हमें सामूहिक गायन को अपने देश में प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है- मिलकर गाएं. केवल वंदेमातरम नहीं, वंदेमातरम तो गाना ही चाहिए, बल्कि अन्य गीत भी गाने चाहिए. हम मिलकर गीत गाने में कुछ पीछे हैं. और देशों में जब भीड़ इकट्ठी होती है- लोग गाना शुरू कर देते हैं. वे गीत उनके जीवन से, उनकी धरती से, उनकी प्रकृति से, उनकी संस्कृति से जुड़े होते हैं. लाखों लोग एक साथ गाना शुरू कर देते हैं. हमें भी कुछ गीतों को प्रचलित करना चाहिए, लोकप्रिय बनाना चाहिए. एक कंठ से गीत गूंजे. हमारे राष्ट्रीय संकल्प को प्रकट करें. वंदेमातरम मन:स्पर्शी गीत है- मातृभूमि की वंदना- किस तरह से वह हरी-भरे रहनी चाहिए, किस तरह से यह दुष्टों का दमन करने में समर्थ है, किस तरह से यह भूमि हमारे लिए धर्म है, विद्या है, सब कुछ है- स्वामी विवेकानंद ने इसी बात को अपने भाषण में प्रकट किया था, जब उन्होंने कहा था-थोड़े समय के लिए हम और देवी-देवताओं को भूल जाएं और भारत माता को याद रखें- भारत माता को. इससे बड़ा देवता कोई नहीं है. इससे बड़ा आराध्य कोई नहीं है. और जब भारत माता की चर्चा करते हैं, उसमें धरती आती है, वह हमें धारण करती है. यह धरित्री है. यह वसुंधरा है. कभी हम प्रकृति के साथ ज्यादती करते हैं, तो प्रकोप भी हमें देखने को मिलता है. लेकिन इस पर टिके हुए हैं- वह हमारा पालन पोषण करती है- यह आधार है- इसलिए यह धरती की रक्षा- यह धरती पवित्र है, यह धरती पावन है. सवेरे उठ कर हम धरती पर पांव रखते हैं- पादेन स्पर्शम- क्षमा करना मैंने पैर रख दिया, मां मुझे क्षमा करना. धरती के बारे में ऐसी पवित्र भावना और इसलिए धरती का पूरा संरक्षण, उसे समृद्ध बनाना, हरी-भरी बनाना. धरती के बांटने का सवाल ही पैदा नहीं होता. और होना नहीं चाहिए. वह ऐसी एक मूल है, पता नहीं कब तक वह हमसे अपनी कीमत चुकाने के लिए कहती रहेगी. धरती मां और उस पर निवास करने वाली उसकी संतति, विशाल परिवार, अलग-अलग भाषाओं में अपने को अभिव्यक्त करता हुआ- अलग-अलग रहन-सहन की पद्धति अपनाता हुआ, अलग-अलग प्रकार के मौसमों में जीवन-यापन के तरीके ढूंढता हुआ, हजारों साल से इस देश में, इस मां की संतति के रूप में जो विद्यमान समाज है, उसका भी स्मरण करना है. उसके विकास का उसकी रक्षा का, उसके अच्छे दिनों की कल्पना करते हैं. धरती और धरती पर निवास करने वाला जन्म और जन्म के साथ-साथ रहते-रहते, सहते-सहते, जीवन के मीठे और कड़वे फल साथ-साथ चखते-चखते, प्रकृति से लड़ते-लड़ते, परकीयों का सामना करते-करते, सृष्टि के सारे रहस्यों को भेदने की दिशा में निरंतर अन्वेषण करते-करते, भारत माता की संतति ने एक संस्कृति का निर्माण किया है. और जब हम मां की वंदना करते हैं, इस धरती की वंदना करते हैं, इस धरती पर निवास करने वाली उसकी संतति की वंदना करते हैं, और उस संतति ने जीवन की जो पद्धति विस्तृत की है, हम उसकी रक्षा करने का भी अभिवचन देते हैं, हम उस संस्कृति से लाभान्वित होने की एक तरह की घोषणा करते हैं.

वंदेमातरम मात्र गीत नहीं है. यह तो एक राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है. यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगी. यह राजनीतिक परिवर्तन से परे है. इसे सत्ता के संघर्ष के कारण खंडित नहीं होने देना चाहिए.  यह एक यथार्थ है, एक सपना भी है. अगर आने वाली पीढ़ी को हम उसकी कल्पना का और हमारे सपनों का भारत नहीं दे सके. तो भी हम वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा मंत्र दे जाएंगे. वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा देश दे जाएंगे, एक ऐसी पद्धति दे जाएंगे, जिसके बल पर खड़े होकर वह सैकड़ों साल के संकल्प को साकार करेंगे. मित्रों, मैं तो आनंदमठ का पाठक हूं. आनंदमठ और उस समय लिखे गए अन्य उपन्यास, संघर्ष के काम में किस तरह से उपन्यास, कविता, गीत एक नये जीवन से भर जाते. लोगों में जूझने की प्रेरणा देते. उस समय अंग्रेज बंगाल को नहीं बांट सके और बाद में उन्होंने भारत को बांट दिया. यह हृदय को चुभने वाला घाव है. आज राष्ट्रीय एकता और अखंडाता के लिए जो समस्या पैदा हो रही है, कहीं ना कहीं उनके मूल में वह देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन है. हमारी सुरक्षा अगर संकट में है, तो वंदेमातरम का गीत हमें प्रेरणा देता है. हमारे मन में यह विश्वास पैदा करता है कि अगर विभाजित जर्मनी एक हो सकते हैं, अगर दो कोरिया को मिलाकर एक कोरिया बनाने की फिर से बात हो सकती है, तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो नरसों, ऐसा वक्त जरूर आने वाला है कि भारत फिर से एक होगा. जो हमसे अलग-अलग चले गए हैं, उनकी भी समझ में आएगा. थोड़ा समय लगेगा.

आज फिर से वे धमकियां दे रहे हैं,  हथियारों से लड़ाई का खाका खींचा जा रहा है, एक दिन भाषण दिया जाता है हथियारों का, दूसरे दिन उसका खंडन कर दिया जाता है. किसी देश की सरकार को इतना झूठ नहीं बोलना चाहिए. बेनजीर तेरे मन में क्या है ? बेनजीर का मतलब है, जिसकी नजीर नहीं, जिसका कोई उदाहरण नहीं हो, जो अनुपम है, जो बेमिसाल है. वे एक बार दिल्ली में मुझसे मिलने आई थीं, तब विरोधी दल के नेता के नाते आई थीं और कहने लगीं- ’हमने सोचा वाजपेयी साहब चलो आपसे भी मिलते चलें, आप भी अपोजिशन में हैं और इस समय मैं भी अपोजिशन में हूं. बातें और भी हुईं, उनका मैं उल्लेख नहीं करता. फिर आडवाणी जी आ गए. फिर उनके बीच सिंधी में क्या बातें हुईं, ये तो मैं नहीं जानता. सचमुच में यह बड़ी दुर्भाग्य की बात है, दुनिया बदल गई, शीतयुद्ध समाप्त हो गया, साम्यवाद बिखर गया, और हम आपस में झगड़ों में उलझे हुए हैं, हथियारों पर ख़र्च कर रहे हैं, इसकी होड़ लगी है.

मुझे आदिवासी क्षेत्र में जाने का मौका मिला- पीने का पानी नहीं है, कुपोषण के कारण बच्चे मर रहे हैं. लेकिन हम अपनी सुरक्षा की उपेक्षा नहीं करेंगे. देश की सीमाओं की रक्षा सर्वोपरि है. लेकिन पड़ोसियों को समझना चाहिए- उन्हें भ्रम पैदा हो गया है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र लड़खड़ा रहा है. प्रधानमंत्री ऐसे हैं, जो निर्णय नहीं कर सकते- अगर हमने हमला किया तो वह थोड़ी देर निर्णय नहीं कर पाएंगे, हमले का विरोध करना या क्या करना है, नरसिंह राव जी के बारे में मेरी ऐसी राय नहीं है. अगर सीमा पर रणभेदी बजेगी, तो सारा देश सारे मतभेद भूलकर, साथ मिलकर, पड़ोसियों को ऐसा पाठ पढ़ाने के लिए तैयार होगा कि वह अगली बार हमला करने लायक न रहे. अभी कुछ लोग गए थे, पाकिस्तान से लौटकर आए हैं, वहां जिस तरह की बातें हो रही हैं, वह चिंता पैदा करने वाली हैं. कोई दु:स्साहसपूर्ण कदम उठाया जा सकता है. वे समझ रहे हैं कि इस देश का मनोबल टूट जाएगा, भारत में से आवाज उठेगी- कश्मीर के लिए कब तक लड़ते रहोगे, कब तक खून बहाते रहोगे- ले-देकर समझौता करो- यह गलतफहमी है- यह होगा नहीं, यह हम होने नहीं देंगे. एक बार देश का बंटवारा हो गया. हम लोग राजनीति में नहीं थे- अब हम हैं- और दृढ़ता के साथ खड़े हैं. और केवल हम नहीं, अब सारे देश ने पाठ पढ़ लिया है, सारे देशवासी इकट्ठे हो जाएंगे, सरकार को प्रेरित करेंगे, सरकार को विवश करेंगे- देश की प्रादेशिक अखंडता के साथ और समझौता नहीं होगा. अब और भूदान नहीं होगा. और यह मानसिकता बनाने में  वंदेमातरम हमारा पथ प्रदर्शक है. हमें अनुप्राणित करने वाला संदेश है, मैं बधाई देता हूं एक बार फिर से महोत्सव समिति को, डॊक्टर साहब को- वह तो हृदय की चिकित्सा करते हैं, अगर कहा जाए तो वंदेमातरम हमारे राष्ट्र के हृदय की धड़कन को व्यक्त करता है. और यह ऐसा हृदय है, जिसके ऒपरेशन की कभी आवश्यकता नहीं है. यह चिंतन हृदय है. और यह धड़कन शाश्वत है. यह धड़कन काल की सीमाओं को पार कर चलेगी. यह भविष्य को रूप देगी. यह गीत हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता रहेगा. आपने इस गीत की शताब्दि समारोह का आयोजन किया, ऋषि बंकिमचंद्र को याद किया. मैं आपको बधाई देना चाहता हूं. सचमुच विलेपार्ले के लोग विलक्षण हैं- बहुत अच्छा काम आपने किया है. देश के अन्य भागों में भी इस तरह का अनुष्ठान होना चाहिए- साल भर यह कार्यक्रम चल सकता है. यह हृदय पर संस्कार डालने वाला कार्यक्रम है. और संस्कार सगर सही होते हैं, तो देश थोड़े दिन के लिए भले ही रास्ता भटक जाए, लेकिन अंत में अपना लक्ष्य पाने में जरूर सफल होता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

यह लोकतंत्र का युग है

    नई दिल्ली में 17 अगस्त, 1994 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित गया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरी ...