Sunday, July 19, 2026

परमात्मा भी आकर कहे

  


पटना में एक बड़ी घटना हुई है. मैं उसका उल्लेख करना चाहता हूं. हमारे डॊ. कर्णसिंह पटना गए थे. मैं उनके भाषण के लिए उन्हें बधाई देना चाहता हूं. लेकिन मुझे दुख है कि वहां यह बात कही गई कि ’छुआछूत हिंदू धर्म का हिस्सा है.’ हम इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं. छुआछूत एक पाप है, एक अभिशाप है, अस्पृश्यता एक कलंक है. जब तक यह कलंक हमारे माथे से नहीं मिटेगा, हम दुनिया के सामने सिर ऊंचा करके खड़े नहीं हो सकते. और मैं नहीं समझता ’हिंदू शास्त्र कहते हैं कि अस्पृश्यता चलनी चाहिए.’  अगर शास्त्रों की कोई ऐसी व्याख्या हुई है, तो वह गलत व्याख्या हुई है और हम उसे मानने के लिए तैयार नहीं हैं. मैं एक कदम और आगे जाकर यह भी कहने के लिए तैयार हूं कि कल अगर परमात्मा भी आ जाए और कहे कि छुआछूत मानो, तो मैं ऐसे परमात्मा को भी मानने के लिए तैयार नहीं हूं. मगर परमात्मा ऐसा नहीं कर सकता और जो परमात्मा के भक्त बनते हैं, उनको भी ऐसी बात नहीं करनी चाहिए.

समाज के इस वर्ग को हमें विश्वास दिलाना होगा, आचरण और कृति से कि हम उन्हें बराबर का हकदार समझते हैं और उन्हें बराबर का स्थान देने के लिए तैयार हैं. इसके लिए अगर हमें अंधविश्वास से लड़ना होगा, तो हम लड़ेंगे. इसके लिए यदि रूढ़ियों के ऊपर वज्रपात करना आवश्यक होगा, तो हम करेंगे. यह तर्क का युग है, विज्ञान का युग है. आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुए मानव और मानव के बीच में जो भेद की दीवारें खड़ी हुई हैं, उनको ढहाना होगा, और इसके लिए एक राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता है और इस अभियान का प्रारंभ गृहमंत्री के द्वारा होना चाहिए. मगर गृहमंत्री चतुराई से चुप रहते हैं, बोलते हैं, तो बहुत थोड़ा बोलते हैं, और जब देश उनसे इनीशियेटिव की आशा करता है, पहल की आशा करता है, तो वह थोड़ा-सा झिझकते हैं. यह झिझक छोड़ देनी चाहिए और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का पालन करना चाहिए. जो राष्ट्रीय प्रश्न है, उन प्रश्नों पर उन्हें सारे दलों का समर्थन मिलेगा. कम से कम हमारा समर्थन मिलेगा, यह हम विश्वास दिलाते हैं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन बनाना होगा

   


नई दिल्ली में 1 अप्रैल, 1998 को विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा की प्रथम महासभा में उदघाटन भाषण देते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया. उन्होंने कहा कि विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा की सभा की सर्वप्रथम बैठक के उदघाटन के अवसर पर आप सबको संबोधित करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है. इस अंतर्राष्ट्रीय सहकारी उपक्रम की सर्वप्रथम महासभा बैठक का विकासशील विश्व में और वह भी भारत में आयोजन, निस्संदेह बहुत ही उपयुक्त है.

बीसवीं सदी में कई प्रमुख घटनाएं हुई हैं, जिनका न केवल मानव के जीवन पर बल्कि पृथ्वी ग्रह पर भी उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा है. इनमें जनसंख्या और खपत में अभूतपूर्व वृद्धि, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, विश्वव्यापी आर्थिक प्रणाली में नाटकीय परिवर्तन तथा संचार प्रौद्योगिकी में क्रांति को शामिल किया जा सकता है. आज जब हम तीसरी सहस्त्राब्दी की दहलीज पर कदम रखने के लिए तैयार हैं, तब हमें इस बात का अधिकाधिक बोध होता रहा है कि औद्योगीकरण और आर्थिक उन्नति के साथ-साथ विकास की प्रक्रिया के लिए समाज को, पर्यावरण को और हमारे अपने भविष्य को एक भारी कीमत चुकानी पड़ी है.

एक प्रकार से यह विडंबना है कि बीसवीं सदी की कुछेक उपलब्धियों ने ही इक्कीसवीं सदी के लिए चुनौतियां उत्पन्न कर दी हैं. इस पृथ्वी पर करीब-करीब छह अरब लोगों के रहने और विश्व के सकल घरेलू उत्पाद की मात्रा के 30 लाख करोड़ डॊलर तक पहुंच जाने के साथ ही मानव व आर्थिक गतिविधि, विश्व जीवन आधार प्रणालियों पर अपना दबाव बनाने लगी है. हर नाशवान प्राकृतिक संसाधन के क्षय, जीवनदायी वनों के लगातार विनाश और संरक्षित जीव-जंतुओं व वनस्पति के अवैध अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के साक्षी हैं. हमारे ग्रह की जैविक संपदा का क्षरण जारी है तथा दुनिया भर में बढ़ती गर्मी और ग्रीन हाउस प्रभाव का खतरा बढ़ रहा है. संक्षेप में, पर्यावरण के विनाश का तेजी से विश्वव्यापीकरण हुआ है. मानव गतिविधि पर पर्यावरणीय प्रभाव अब केवल मानव निर्मित सीमाओं में ही सिमटा हुआ नहीं रह गया है.

पर्यावरण के क्षरण की समस्याओं के लिए वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक समाधानों से ही काम नहीं चलेगा. इनके लिए पारंपरिक समाजों में अपनाए जाने वाले पर्यावरणीय नैतिक सिद्धांतों और मूल्यों को फिर से स्थापित करना होगा तथा इन मुद्दों को आर्थिक विकास का आधार बनाना होगा. एक पारंपरिक समाज के रूप मे भारत ने सदैव ही सभी प्रकार के जीवन व गतिविधि के लिए सर्वव्यापी शांति को अंतिम ध्येय बनाने के साथ-साथ प्रकृति की संपूर्णता और पवित्रता में विश्वास किया है. सह-अस्तित्व का चिरकालिक चिंतन न केवल मानव जाति के सह-अस्तित्व के लिए, बल्कि यह तो दरअसल सभी जीवित प्राणियों का तथा ब्रह्मांड में सदभाव का मूलमंत्र है.  प्रकृति का नाजुक संतुलन बहाल करना होगा, यहां तक कि हमें जीवन के विभिन्न स्वरूपों, वनस्पति और जीव-जंतुओं के बीच तथा मानव के बीच संपूर्णता और सह-अस्तित्व सुनिश्चित करना है. वायु, जल, अग्नि, प्रुथ्वी और आकाश- इन पंचतत्वों का संतुलन भी बनाए रखना होगा. 

विश्वव्यापी पर्यावरण के अनुभव और बोध के आधार पर आज हम यह मानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर विकास की दिशा में अलग-थलग रहकर काम नहीं किया जा सकता. आज और भविष्य में राष्ट्रों का जीवन-स्तर काफी हद तक उन नीतियों और कार्रवाइयों पर निर्भर करता है, जिन पर विश्व के साथी राष्ट्र अमल करते हैं. इस पृष्ठभूमि में नई साझेदारियां स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि संरक्षण व निरंतर विकास सुनिश्चित हो सके तथा साथ ही प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक उन्नति का समान वितरण सुनिश्चित हो सके. इन कौशल अवधारणाओं के विविधतापूर्ण भंडार और परिसंपत्तियों का अधिकाधिक लाभ उठाना जरूरी है.

जब हम प्रदूषक तत्वों के स्वरूप का विश्लेषण करते हैं, तो हमें पता चलता है कि इनकी अधिकता के लिए समृद्धि और गरीबी, दोनों ही जिम्मेदार हैं. औद्योगिक और विकसित विश्व की समस्याएं उनकी आर्थिक गतिविधियों और खपत के उच्च स्तरों से जन्म लेती हैं, जबकि दूसरी ओर विकासशील देशों के वनों और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण का कारण मुख्यतया संसाधनों और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों तथा आय-अर्जन के अवसरों के अभाव को माना जा सकता है. इसलिए दो अलग-अलग कारणों से निपटने के लिए विशेष रूप से भिन्न-भिन्न रणनीतियां जरूरी होंगी. संपन्न और विकसित विश्व में इन समस्याओं से निपटने का सबसे अच्छा तरीका उत्सर्जन संबंधी कठोर मापदंड बनाने व प्रदूषकों पर प्रतिबंध लगाने तथा इन कठोर मापदंडों व प्रतिबंधों को लागू करने का होगा. लेकिन विकासशील और अविकसित देशों के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि प्रोत्साहन आधारित ढांचा अपनाया जाए, जो संरक्षण को बढ़ावा दे और प्रकृति के दोहन को हतोत्साहित करे, साथ ही आर्थिक विकास और तेजी से गरीबी दूर करने के प्रयासों पर, जहां कोई समझौता न हो. विकासशील देशों के लिए हमें उत्पादन की पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को सहज बनाने और उनको बढ़ावा देने के एकजुट प्रयास करने चाहिए तथा प्रदूषक ताकतों के दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए और अधिक उपाय करने चाहिए.

पर्यावरण क्षरण के दुष्प्रभावों पर अंकुश लगाने तथा निरंतर विकास को बढ़ावा देने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के सिलसिले में राष्ट्रों को मांट्रियल प्रोटोकोल, जलवायु परिवर्तन के बारे में ढांचागत संधि, जैव विविधता संधि, रेगिस्तान के प्रसार को रोकने की संधि जैसी कई पारिस्थितिक संधियां करनी होंगी. हालांकि जलवायु परिवर्तन पर, विश्वव्यापी ऊष्मन और ओजोन परत पर सारा ध्यान केंद्रित होता लगता है, लेकिन गरीब समाजों की पर्यावरणीय समस्याओं को, चाहे वे स्वच्छ पेयजल की कमी की हों या खराब स्वच्छता-स्थितियों की, सुलझाने पर बहुत ही कम जोर दिया जा रहा है.

मैं दोहराना चाहूंगा कि यदि हम निरंतर विकास की समस्या को और फलस्वरूप पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियों का सफलता से सामना करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो हमें इसे एक ऐसा अंतर्राष्ट्रीय अभियान बनाना होगा, जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ है. इसके लिए चाहे अंतर्राष्ट्रीय संगठन, राष्ट्रीय सरकारी या गैर-सरकारी संगठन हों, या फिर व्यापार जगत हो तथा विकासशील ताकतें हों या पर्यावरणविद और संरक्षण की ताकतें हों,  सभी के भागीदारों के छिटपुट प्रयासों में प्रभावशाली ढंग से तालमेल लाना होगा. 

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात तो पर्यावरण संरक्षण को एक जन आंदोलन बनाने की होगी, जिसमें स्थानीय समुदायों, सरकारी निकायों, विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, उद्योगों तथा विभिन्न आर्थिक सेवा प्रदाताओं का घनिष्ठ व सहभागी सहयोग प्राप्त होगा. इतिहास ने सिद्ध कर दिया है कि सभी अच्छे विचार, जन आंदोलनों का रूप लेने के बाद ही अभीष्ट प्रभाव डालने में सफल हो पाते हैं. समय आ गया है जब पर्यावरण संरक्षण को एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन बनाया जाए. सभी राष्ट्रों के अपने हित में और जिस विश्व में हम रहते हैं, उसके व्यापक हितों में यह जरूरी है कि हम अपने बच्चों के लिए एक बेहतर विश्व छोड़ कर जाएं.

1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन के बाद से कई अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक नेताओं ने व्यापारिक समुदाय को पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाने के लिए प्रेरित किया है. विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा की सर्वप्रथम महासभा बैठक में आप सबकी उपस्थिति अत्यंत ही प्रेरणादायक है तथा आज जिस मसले पर हम चर्चा कर रहे है, उसके प्रति आपकी प्रतिबद्धता भी इसकी परिचायक है. रियो के बाद के दौर में विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा, ऐसे माध्यमों में से एक है, जो विभिन्न रियो समझौतों को प्रभावी बनाने के लिए उभरे हैं. 1994 में इस संगठन के पुनर्गठन से इस संस्थान की ओजस्विता और प्रतिबद्धता में विश्वास जगा है. चूंकि राष्ट्र प्रणाली और ब्रेटेन वुड्स प्रणाली के बीच स्थापित हुई सहभागिता की एक अनूठी अभिव्यक्ति है, इसलिए हमारा सामूहिक प्रयास होगा कि हम इसे निरंतर विकास को बढ़ावा देने वाले सहयोग के प्रभावशाली माध्यम के रूप में बनाए रखें और मजबूती प्रदान करें.

निरंतर विकास की अनिवार्यता को देखते हुए समृद्ध तथा विकासशील देशों, दोनों ही की जिम्मेदारी हो गई है कि वे तत्काल तीन परियोजनाओं पर अपनी अनुसंधान व विकास गतिविधियां केंद्रित करें. नंबर एक, बड़े पैमाने पर तथा कम या तुलनीय लागत पर ऊर्जा के पुनरोपयोगी स्रोतों के दोहन के लिए हरसंभव प्रयास, दो नई सामग्रियों का विकास और वाणिज्यीकरण, तथा तीन, ऊर्जा की बचत तकनीकों व प्रबंध पद्धतियों पर सामान्य रूप से अमल. कुछ भी हो, ऊर्जा की बचत, ऊर्जा का उत्पादन ही तो है. 

भारत सरकार द्रुत व निरंतर विकास के प्रति प्रतिबद्ध है, जिसे हम अपने नागरिकों का जीवन-स्तर बढ़ाने तथा अपने देश से गरीबी के अभिशाप को समाप्त करने का पक्का तरीका मानते हैं. आर्थिक विकास और पर्यावरण सुधार के ल्क्ष्य हमें एक-दूसरे के पूरक प्रतीत होते हैं. हमें बिलकुल भी नहीं भूलना है कि घोर गरीबी और इसके परिणाम, हमारे ग्रह के पर्यावरण पर एक निष्कृष्ट अभिशाप हैं.

मैं यहां कहना चाहूंगा कि पर्यावरण संरक्षण और निरंतर विकास के बारे में विकासशील देशों की चिंताओं को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मुखर करने में भारत हमेशा अग्रणी रहा है. उदाहरण के लिए भारतीय प्रधानमंत्री ने ही 1972 में स्टाकहोम में हुए प्रथम विश्व पर्यावरण शिखर सम्मेलन में इस नये एजेंडे को रखा था. तब से मेरा देश इस उद्देश्य की लगातार हिमायत करता आया है.

स्वाभाविक ही है कि निरंतर विकास की अनिवार्यता की देश के भीतर ही तगड़ी गूंज सुनाई देने लगी है. जैसा कि हमने प्रशासन के लिए अपने राष्ट्रीय एजेंडे में कहा है कि हम आर्थिक सुधार जारी रखेंगे, वृहद स्थायित्व को मजबूत करेंगे और आधारभूत ढांचे, कृषि व शिक्षा के विकास पर विशेष ध्यान देंगे. हमारा पक्का विश्वास है कि तीव्र आर्थिक विकास और अपने पर्यावरण के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए अधिक जागरूक व प्रभावशाली सामाजिक एवं वैधानिक ढांचे दोनों ही के लिए अधिक व बेहतर शिक्षा, विशेषकर प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तरों की शिक्षा एक महत्वपूर्ण पूर्व-शर्त है.

हम इस बात के भी कायल हैं कि शिक्षा, ग्रामीण आधारभूत ढांचे, जल-संसाधन प्रबंध और भू-प्रयोग के क्षेत्रों में सामाजिक व्यय, उपयुक्त प्रोत्साहनों तथा यथार्थवादी नियामक प्रणालियों को सरकार संयुक्त रूप से प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल कर सकती है और उसे ऐसा करना भी चाहिए, ताकि तीव्र, व्यापक आधार वाले विकास और पर्यावरण सुधारों के लक्ष्यों को एक साथ पूरा किया जा सके. हम पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक प्रभावशाली वैधानिक ढांचा स्थापित करना चाहते हैं तथा एक ऐसी व्यापक राष्ट्रीय पर्यावरण नीति लाना चाहते हैं, जिससे विकास और पर्यावरण संबंधी मांगों में सामंजस्य स्थापित हो सके और वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकताओं के बीच संतुलन कायम हो सके.

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सभी मामलों में यह सिद्धांत मूलमंत्र होना चाहिए कि गरीबी हटाना और आर्थिक विकास, विकासशील देशों की सर्वोच्च प्राथमिकताएं होनी ही चाहिए. विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा ने इसी सिद्धांत को आधार बनाकर, अपने दायरे के भीतर निरंतर विकास के लक्ष्यों को पूरा करना शुरू कर दिया है. इसे हमारे पूर्ण व सर्वसम्मत समर्थन की जरूरत है, जिसके लिए सभी अंशदान देने वालों को पर्याय समयोचित अंशदान के जरिये तथा प्राप्त करने वालों द्वारा विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा के संसाधनों के कुशल व सार्थक उपयोग के जरिये अपना समर्थन देना होगा.

विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा की स्थापना, इसके विकास-क्रम और प्रगति में भागीदार होने का हमें गर्व है. प्राप्तकर्ता देशों में भारत इस संगठन की प्रतिपूर्ति करने वालों में सबसे बड़ा अंशदान-प्रदाता है और इसने अन्य प्राप्तकर्ता-दाताओं से अधिक ही अंशदान किया है.

मैं आप सबका नई दिल्ली में इस महासभा बैठक में स्वागत करता हूं और आशा करता हूं कि आपका प्रवास अत्यंत आनंददायक होगा और अपनी यात्रा की सुखद स्मृतियां लेकर आप लैटेंगे. मैं यह भी आशा करता हूं कि आप में से कुछ अतिथि भारत के अन्य हिस्सों की यात्रा करेंगे और हमारी संस्कृति और विरासत की समृद्धि की झलक पा सकेंगे.

मैं इस सभा का उदघाटन करता हूं और अपने परस्पर लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विश्वव्यापी पर्यावरण सुविधा को एक प्रभावशाली सहयोग माध्यम के रूप में परिभाषित करने की दिशा में आपकी चर्चा की सफलता की कामना करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

राष्ट्र की सेवा

   


नई दिल्ली में 26 नवंबर, 1998 को आयोजित समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी को ’सत्यनिष्ठ व्यक्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- मैं बड़े धर्मसंकट में हूं, जब इस पुरस्कार से मुझे सम्मानित किया जाना था, तब मैं प्रतिपक्ष में था. इसीलिए मैंने पुरस्कार स्वीकार भी कर लिया. लेकिन आज प्रधानमंत्री के नाते मुझे पुरस्कार ग्रहण करते हुए बड़ा संकोच हो रहा है. एक तो प्रधानमंत्री पुरस्कार ग्रहण करे, इसके औचित्य का सवाल उठाया जाता है. किस पुरस्कार को ले, किसको छोड़े ? लें तो उसकी कसौटी क्या हो, न लें तो किस आधार पर मना करें. यह श्रृंखला शुरू हो जाएगी, जो कठिनाइयां पैदा करेगी.

दूसरी बात यह है कि ऐसे अवसरों पर जिसे पुरस्कार दिया जाना है और मैंने जब जूरी के नाम देखे- उसी समय देखे थे, तो यह भी एक कारण था कि मैं पुरस्कार लेने के लिए तैयार हो गया. लेकिन पुरस्कार समारोह में दिए जाते हैं, अभिनंदन का आयोजन होता है, मानपत्र प्रस्तुत किया जाता है- यहां तो कविता भी पढ़ी गई- और सब में प्रशंसा के इतने पुल बांधे जाते हैं, अतिश्योक्ति अलंकार का इतनी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है कि सुनकर बड़ा संकोच होता है. गनीमत है कि यह एक वर्ष के निष्ठा पुरुष के लिए है. मेरा वह एक वर्ष बीत गया. लेकिन मैं जानता हूं, वह बीता नहीं है, इस पुरस्कार को मैं बड़े विनम्र भाव से ग्रहण कर रहा हूं. मेरा प्रयास रहा है, आगे भी रहेगा कि मैं लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप खरा उतर सकूं.

इस देश में भौतिक संपदा पर्याप्त है. प्रकृति बड़ी उदार है, पांच हजार साल, छह हजार साल की हमारी संस्कृति है. लेकिन अगर हम आज भी अपनी संभावनाओं के अनुरूप, अपनी क्षमताओं के अनुरूप आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो उसका एक कारण यह भी है कि जो चोटी के लोग हैं, वे आम आदमी के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं. पुरानी कहावत है कि धरती टिकी है पुण्यात्माओं के बल पर. कुछ दुष्कर्म तो यहां होते रहे हैं. आज भी हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जो प्रामाणिक हैं, ईमानदार हैं, मेहनत करके रोटी कमाते हैं, बांटकर खाते हैं, हमारी सारी परिवार प्रणाली, कौटुम्बिक पद्धति इसी पर टिकी हुई है. हराम की कमाई को हमारे यहां बहुत बुरा समझा जाता था. ईमानदारी की बड़ी प्रशंसा होती थी. ईमानदारी की बड़ी कद्र थी. वक्त बदला है. लेकिन मूल्यों में होने वाली गिरावट को हमें रोकना है. इसके लिए अनेक उपाय करने होंगे. शासन पद्धति में, प्रणाली में सुधार लाना होगा.  सार्वजनिक जीवन को शुद्ध करना होगा. अपराधियों और राजनेताओं की बढ़ती हुई सांठ-गांठ को तोड़ना होगा. और सबसे बड़ी बात यह है कि देश में एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, एक ऐसी हवा बनानी होगी कि जिसमें आदमी को काम करने के लिए, ईमानदारी से काम करने के लिए प्रोत्साहन मिले. आज ऐसा नहीं है, आठ महीने में मैंने बहुत सी ऐसी बातें सीखी हैं, उनमें कुछ अच्छी बातें भी हैं. लेकिन कभी-कभी ऐसी तस्वीर उपस्थित हो जाती है कि देखकर बड़ा दुख होता है.

यदि कोई अधिकारी मेरे इस सवाल के जवाब में कि तुम ठीक तरह से काम क्यों नहीं कर पा रहे, वह मुझसे यह कहे कि साहब, मुझे ठीक तरह से काम करने नहीं दिया जाता. मैं ईमानदार हूं और इसलिए जहां हूं, वहां न रहूं, कहीं और चला जाऊं. ये मेरे संगी-साथी मेरे ऊपर दबाव डालते रहते हैं. मैं नहीं जानता, यह कहां तक ठीक है कि कुछ कठोर कदम उठाने की आज जरूरत है. लोकतंत्र है, लोकतंत्र एक नैतिक व्यवस्था है, मात्र शासन चलाने का ढंग नहीं है. हर बालिग को वोट का अधिकार क्यों ? वोट का अधिकार बराबर क्यों ? विभिन्नताएं हैं, विषमताएं हैं. लेकिन सबमें एक ही परम तत्व है, एक ही ईश्वर विद्यमान है और इसीलिए सब बराबर हैं. इसीलिए मानवाधिकारों की सार्थकता है.

आज भी सिर पर मैला ढोने वाली बहनों को देखकर अंत:करण में पीड़ा क्यों होती है ? क्योंकि भीतर बैठा हुआ चैतन्य कचोटता है. पीड़ा संवेदना जगाती है. संवेदना मर न जाए यह खतरा पैदा होता है कभी-कभी, डर लगता है. क्योंकि इस देश में ऐसा होगा नहीं. हम भले ही वैसा करने की काफी कोशिश करें. लेकिन इस देश की पुण्याई है. और जैसा कि मैंने कहा कि करोड़ों लोग लगे हुए हैं इस काम में, ईमानदारी से अपना काम करने के लिए, पड़ोसी की मदद करने के लिए. खुद नदी में डूबकर, डूबने वाले को बचाने के लिए. क्या आवश्यकता है ? आदमी डूबता है, डूबने दो. मैं अपनी जान खतरे में क्यों डालूं ? लेकिन अंतर्यामी बैठा हुआ है. उसको चुप बैठने नहीं देता. वह छलांग लगाता है. कभी-कभी तो ऐसा होता है कि डूबने वाले को बचा लाता है, लेकिन खुद डूब जाता है. यह केवल भौतिकता के आधार पर नहीं है. इसमें कहीं नैतिकता है, आध्यात्मिकता है- अगर कोई आपत्ति न करे, तो देश में ईमानदारी का, प्रामाणिकता का वातावरण बनाने के लिए भी उसी भाव को जगाने की जरूरत है.

आखिर मनुष्य को कितना धन चाहिए, कितना पैसा चाहिए ? मैं जब कुछ आंकड़े सुनता हूं, तो आश्चर्यचकित हो जाता हूं. लोग कितना धन कमाना चाहते हैं ? वैध और अवैध, दो सवाल हैं. अवैध तरीकों से ज्यादा कमा सकते हैं. लेकिन कितना धन चाहिए आदमी को ? कोई सीमा नहीं, कोई मर्यादा नहीं. लाभ की, लोभ की कोई सीमा होनी चाहिए. इसकी कोई मर्यादा होनी चाहिए और यह मर्यादा मन को बांधनी पड़ेगी. कानून अपनी जगह है. कानून और भी कड़ा किया जा सकता है. उसको प्रभावी बनाने की भी कोशिश की जा रही है. लेकिन सारे देश में एक नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है.

सुलभ इंटरनेशनल अपने ढंग से बहुत अच्छा काम कर रहा है. संसद सदस्य के नाते अपने चुनाव क्षेत्र के लिए मुझे जो एक करोड़ रुपया मिला था, उसका मैं सबसे अच्छी तरह से विनियोग कैसे करूं, जब यह प्रश्न लखनऊ में पैदा हुआ तो अनेक संस्थाएं और सरकारी संस्थाएं भी थीं. लेकिन सबकी नजर गई- सुलभ इंटरनेशनल पर. उनको जो काम सौंपा जाएगा, वे ठीक करेंगे. और बाद में हमने काम की देखभाल के लिए लोग लगाए थे, कार्यकर्ता खड़े किए थे. सीमेंट में रेत ज्यादा न हो, ईंट अच्छी हो. इंजीनियर प्रामाणिकता से काम करें. और इन कसौटियों पर सुलभ इंटरनेशनल खरा उतरता है. यदि कहीं कार्यकर्ता को लगा कि काम ठीक नहीं हो रहा है, तो तत्काल इनके प्रबंधकों को जाकर बताए. और फिर उसको जल्दी से ठीक करें. अन्यथा ठेकेदार काम करते हैं. कैसा करते हैं- उसकी ज्यादा चर्चा न करना ही अच्छा है. सड़क बनती है, एक बरसात के बाद सड़क फिर बनाने की जरूरत पड़ती है. ऐसा क्यों होता है ?

पारदर्शी प्रामाणिकता, इस देश की मुक्ति के अनेक उपायों में एक है- पारदर्शी प्रामाणिकता. दिखाई देना चाहिए. कोई अवगुंठन नहीं, कोई प्रच्छन्नता नहीं. लोगों को जानने का हक होना चाहिए, क्या हो रहा है. और जो शीर्ष स्थानों पर बैठे हैं, उनकी चादर साफ होनी चाहिए. मैं आभारी हूं, मुझे एक वर्ष के लिए चुना गया. मैं पुरस्कार की राशि स्वीकार नहीं करूंगा. मैं पुरस्कार सुलभ इंटरनेशनल को वापस कर रहा हूं. इस पुरस्कार का उपयोग वे जैसा चाहें, करें, करें और मुझे भरोसा है कि वे अच्छा ही उपयोग करेंगे. मेरे बारे में जो भावनाएं व्यक्त की गई हैं, मैं उनके अनुरूप आगे आने वाले जीवन को जीने का प्रयास करूंगा. परमात्मा मुझे यह शक्ति दे. आप सब मुझे सहयोग दें, आशीर्वाद दें. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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केशव कुंज - झंडेवालन - नई दिल्ली

Saturday, July 18, 2026

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 "उत्तर प्रदेश की सरकार संविधान के अनुरूप कार्य करती है। सरकार का लक्ष्य कानून के शासन को सुदृढ़ करना, सभी वर्गों के कल्याण के लिए योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करना तथा राज्य के समग्र विकास को गति देना है। 

आधारभूत संरचना, निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों में विकास को प्राथमिकता देते हुए सरकार संविधान की मर्यादाओं के भीतर जनहित में कार्य करने के अपने संकल्प को दोहराती है।" योगी सरकार फिरसे 2027 विकास क़ी राह.

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परमात्मा भी आकर कहे

   पटना में एक बड़ी घटना हुई है. मैं उसका उल्लेख करना चाहता हूं. हमारे डॊ. कर्णसिंह पटना गए थे. मैं उनके भाषण के लिए उन्हें बधाई देना चाहता ह...