Wednesday, May 20, 2026

नानी के घर की सुखद स्मृति


 -डॉ. सौरभ मालवीय  
ग्रीष्मकाल के अवकाश में बच्चे अपनी नानी के घर जाते हैं। बाल्यकाल के ये सुंदर संस्मरण जीवनपर्यंत स्मृति में रहते हैं। हमारे देश भारत में बच्चों का अपनी नानी के घर जाना केवल एक यात्रा नहीं है, अपितु एक भावनात्मक परंपरा है, जो उन्हें परिवार से जोड़े रखती है। 

शिक्षण संस्थाओं में ग्रीष्म कालीन अवकाश ग्रीष्म ऋतु के मध्य में आता है। इस समयावधि में भीषण गर्मी पड़ती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश मई के अंतिम सप्ताह से लेकर संपूर्ण जून तक रहता है। इस समयावधि में उच्च तापमान के कारण सभी विद्यालय एवं महाविद्यालय बंद रहते हैं। बच्चे वर्षभर ग्रीष्म कालीन अवकाश की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि इसमें उन्हें सबसे अधिक दिनों का अवकाश प्राप्त होता है। बच्चों के लिए ग्रीष्म कालीन अवकाश किसी पर्व से कम नहीं होता। इस समयावधि में उन्हें कोई चिंता नहीं होती अर्थात उन्हें न तो प्रात:काल में शीघ्र उठकर विद्यालय जाने की चिंता होती है और न ही गृहकार्य करने की कोई चिंता होती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश में बच्चे अपने माता- पिता के साथ अपनी नानी के घर जाते हैं। वहां वे अपने ननिहाल के लोगों से मिलते हैं। सब उन्हें बहुत लाड़-प्यार करते हैं। नानी के घर की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि उन पर कोई रोक-टोक नहीं होती। यहां माता-पिता का कड़ा अनुशासन नहीं होता। माता-पिता के रोकने-टोकने पर नानी उन्हें ही डांट देती हैं कि बच्चे हैं। यदि अब नहीं खेलेंगे, तो कब खेलेंगे। वर्षभर उन्हें पढ़ाई ही करनी है, अब तो उन्हें खेलने दो। नानी के घर बच्चे अपने मामा और मौसी के बच्चों के साथ मिलकर खेलते हैं। वृक्षों पर चढ़ना और फल तोड़ना भी बहुत ही रोमांचकारी होता है। ये अवकाश का मुख्य आकर्षण होता है। कभी वृक्ष से गिरकर चोटिल होना और परिजनों की डांट खाना भी इसमें सम्मिलित हो जाता है। 
रात्रि में नानी बच्चों को बहुत सी रोचक कथाएं सुनाती हैं। ये कथाएं केवल परियों या राजा- महाराजाओं की नहीं होतीं, अपितु परिवार के इतिहास और पूर्वजों की भी होती हैं, जो बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक सिद्ध होती हैं। इनके कारण बच्चे अपने पूर्वजों के विषय में जान पाते हैं। इन कथाओं के माध्यम से वे बच्चों में संस्कार पोषित करती हैं, जो उनके चरित्र का निर्माण करते हैं। यही संस्कार जीवन में उनका मार्गदर्शन करते हैं। अपने पैतृक गांव अथवा नगरों में जाने से वे वहां की संस्कृति से जुड़ते हैं। अपने सगे-संबंधियों से मिलते हैं। इससे उन्हें अपने संबंधों का पता चलता है। उनमें अपने संबंधियों के प्रति स्नेह का भाव उत्पन्न होता है। वे अपने संबंधियों के प्रति अपने दायित्व को भी समझते हैं। समय पड़ने पर वे अपने दायित्वों को निभाने से पीछे भी नहीं रहते। वास्तव में बच्चों को बाल्यकाल से ही उन्हें परिवार और परिवार के प्रति उनके दायित्वों के विषय में बताना चाहिए।   

बच्चे नानी के हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन करते हैं। वे अपनी माता के मुख से नानी के हाथ से बने भोजन की बातें सुनते रहते हैं और जब उन्हें अपनी नानी के हाथ का बना भोजन खाने को मिलता है, तो उनके आनंद का ठिकाना नहीं रहता। उन्हें नानी के हाथ का बना अचार, मुरब्बा एवं पापड़ आदि अत्यंत प्रिय होते हैं। वापसी में नानी बच्चों के लिए अपने हाथ से बने स्वादिष्ट व्यंजन देती हैं। 

ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चे अपने माता पिता एवं ननिहाल के सदस्यों के साथ पर्यटन स्थलों पर भी जाते हैं। अधिकतर लोग ऐसे स्थानों पर जाते हैं, जहां तापमान कम रहता है। ये पहाड़ी क्षेत्र होते हैं। इससे वे वहां की संस्कृति एवं रीति- रिवाजों के बारे में जान पाते हैं। इसके अतिरिक्त वे धार्मिक स्थलों एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थलों पर भी घूमने जाते हैं। घूमने का अर्थ केवल सैर सपाटा और मनोरंजन करना नहीं है, अपितु पर्यटन से बहुत सी शिक्षाएं मिलती हैं। धार्मिक स्थलों पर जाने से मन को शांति प्राप्त होती है तथा बच्चे अपने गौरवशाली संस्कृति से जुड़ पाते हैं। उन्हें अपने ईष्ट देवी-देवताओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है। उनमें आस्था का संचार होता है। उनका आत्मबल एवं आत्म विश्वास बढ़ता है। ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से उन्हें अपने इतिहास को जानने का अवसर प्राप्त होता है। ये व्यवहारिक ज्ञान है, जो उन्हें आने- जाने से प्राप्त होता है। यह उनके लिए आवश्यक भी है। वे जिन चीजों के बारे में पुस्तकों में पढ़ते उनके बारे में उन्हें सहज जानकारी प्राप्त होती है। इसका उनके मन- मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।          

शिक्षकों द्वारा ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए भी विद्यार्थियों को गृहकार्य दिया जाता है। इस दौरान विद्यालय अवश्य बंद रहते हैं, किन्तु ट्यूशन सेंटर खुले रहते हैं। बच्चे ट्यूशन के लिए जाते हैं और अपना गृहकार्य भी करते हैं। इसके अतिरिक ग्रीष्म कालीन अवकाश के दौरान बहुत से संस्थान अनेक प्रकार के कम समयावधि वाले कोर्स प्रारंभ करते हैं, उदाहरण के लिए चित्रकला, संगीत, गायन, नृत्य, मिट्टी के खिलौने बनाने, सजावटी सामान बनाना आदि। इस समयावधि में बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार कार्य करने एवं नई- नई चीजें सीखने का अवसर प्राप्त होता है। बहुत से बच्चे खेलों की ओर रुझान करते हैं। समय अभाव के कारण वे खेल नहीं पाते थे, किन्तु अवकाश में उन्हें अपनी पसंद के खेल खेलने का अवसर मिल जाता है। क्षेत्र के बच्चे अपनी-अपनी टीमें बना लेते हैं और आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं. इससे उनमें खेल भावना का विकास होता है। किसी भी खिलाड़ी के खेल का प्रारंभ इसी प्रकार होता है। पहले वे अपने मित्रों के साथ खेलता है. फिर इसी प्रकार वह खेल स्पर्धाओं में खेलने लगता है। इस प्रकार एक दिन वह देश के लिए पदक जीतने वाला खिलाड़ी बन जाता है। वास्तव में यह समय बच्चों के नैसर्गिक गुणों को निखारने का कार्य करता है।                     
यह दुखद एवं चिंतनीय है कि आज के डिजिटल युग में बच्चे मोबाइल में लगे रहते हैं। इससे उनके नेत्रों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। तकनीक का आवश्यकता से अधिक उपयोग करना हानिकारक होता है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को प्रकृति के निकट लेकर जाएं अर्थात ग्रीष्मकालीन अवकाश में ननिहाल अवश्य लेकर जाएं।   
  

स्वाद और संस्कृति की एक चुस्की


 अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस पर विशेष 
-डॉ. सौरभ मालवीय  
चाय केवल एक पेय नहीं है, अपितु यह एक परंपरा बन चुकी है। यह प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता बन गई है। प्रातकाल: उठते ही सर्वप्रथम सबको चाय चाहिए। इसके बिना दिवस का प्रारंभ ही नहीं होता।

चाय का सामाजिक महत्व
जल के पश्चात् चाय विश्व का सर्वाधिक पिया जाने वाला पेय माना जाता है। चाय विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का कार्य कर रही है। हमारे देश में ‘चाय पे चर्चा’ से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। भारत में चाय केवल प्रातःकाल का प्रारंभ ही नहीं, अपितु सामाजिक संवाद का माध्यम है। बेड टी एवं नुक्कड़ की चाय की दुकान से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिस के ब्रेक रूम तक चाय लोगों को समीप लाती है। बहुत से लोग ऐसे हैं कि उन्हें नींद खुलते ही सर्वप्रथम चाय चाहिए। चाय पीने के पश्चात् ही वे अपना बिस्तर त्यागते हैं। इसीलिए इसे बेड टी कहा जाता है। वास्तव में चाय पीने से आलस्य दूर हो जाता है और शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। जो लोग देर रात्रि तक कार्य करते हैं, उन्हें चाय की अत्यंत आवश्यकता होती है। चाय पीने से नींद नहीं आती और व्यक्ति सुचारू रूप से कार्य कर लेता है।  
      
जिस प्रकार संबंधियों एवं मित्रों को भोजन पर आमंत्रित किया जाता है, उसी प्रकार लोगों को चाय पर भी आमंत्रित किया जाता है। अतिथियों को सर्वप्रथम चाय ही दी जाती है। अनेक लोग ऐसे हैं कि ग्रीष्मकाल में उन्हें श्व्वत्ल पेय दिया जाए, तो इसे पीने के पश्चात् वे चाय का आग्रह करते हैं और कहते हैं कि उन्हें चाय ही पीनी है। यदि किसी से पूछो कि वह ठंडा लेना पसंद करेगा अथवा गर्म, तो वह चाय ही मांगेगा।

चाय के विषय में समय-समय पर अनेक रोचक समाचार मिलते रहते हैं, जैसे जैसे इंग्लैंड के नागरिक प्रतिदिन 16 करोड़ चाय के कप पी जाते हैं। भारत भी इस विषय में कम नहीं है। यहां इससे अधिक ही चाय पिये जाने की संभावना है। यहां स्थान-स्थान पर चाय की दुकाने मिल जाती हैं। यह भी एक रोचक तथ्य है कि काली चाय का उपयोग कुल चाय का 75 है। काली चाय की सबसे सर्वाधिक खपत हमारे देश भारत में होती है। अमेरिका में 80 प्रतिशत चाय की खपत आइस टी के रूप में होती है।

कुल्हड़ चाय 
अनेक प्रकरणों में भारतीय अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। चाय की बात करें, तो पूर्व में कांच के गिलास में चाय दी जाती थी। इसके पश्चात् प्लास्टिक और कागज से निर्मित कप आ गए। अब कुल्हड़ भी आ चुके हैं। इनमें चाय पीने का अपना ही स्वाद होता है। 

चाय का स्वास्थ्य पर प्रभाव 
चाय के विषय में शोध होते रहते हैं और इनकी रिपोर्ट्स आती रहती हैं। एक शोध के अनुसार चाय में एक 'एल थेनाइन' नाम का तत्व होता है, जो मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि करने में सहायक है। यह मानसिक तनाव को कम करता है। ऑस्ट्रेलिया में हुए एक शोध के अनुसार चाय पीने से अस्थियां सुदृढ़ होती हैं। 
शोधों के अनुसार चाय में एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो बढ़ती आयु के प्रभाव को कम करते हैं। चाय खाली पेट नहीं पीनी चाहिए। ऐसे करने से एसिडिटी की समस्या हो सकती है। इससे भूख भी प्रभावित होती है अथवा भूख लगनी बंद हो जाती है। ऐसे में व्यक्ति भोजन नहीं करता, जिससे उसके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है।   
बहुत से लोग अत्यधिक उबाली हुई और अधिक पत्ती की चाय पीना पसंद करते हैं, वे इसे कड़क चाय कहते हैं। ऐसे चाय शरीर के लिए अत्यधिक हानिकारक होती है। इससे पेट में अल्सर हो सकता है। ऐसी अत्यधिक चाय पीने से कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है।

चाय दिवस 
उल्लेखनीय है कि चाय दिवस का प्रारंभ 15 दिसंबर 2005 को नई दिल्ली से हुआ था। एक वर्ष पश्चात् श्रीलंका में चाय दिवस मनाया गया। इसके पश्चात् विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाया जाने लगा। वर्ष 2015 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के माध्यम से चाय दिवस को वैश्विक स्तर पर मनाने का प्रस्ताव रखा। संयुक्त राष्ट्र महासभा को यह प्रस्ताव पसंद आया और उसने इसे स्वीकार कर लिया। इस प्रकार 21 मई को आधिकारिक रूप से 'अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस' को घोषणा की गई। तब से प्रतिवर्ष 21 मई को विश्वभर में 'अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस' मनाया जाता है। वैश्विक स्तर पर चाय दिवस मनाने का उद्देश्य इसके उत्पादन एवं व्यापार से संबंधित श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना तथा चाय उत्पादन को प्रोत्साहित करना है। 
चाय का इतिहास चाय का इतिहास अत्यंत रोचक है। मान्यता है कि चाय का प्रारंभ लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व चीन में हुआ था।

कहा जाता है कि चीन के राजा शैन नुंग के समक्ष गर्म जल का प्याला रखा गया था। समीप में उगे एक पौधे की पत्तियां उसमें गिर गईं। इसके कारण जल का रंग बदल गया एवं उसमें से सुगंध आने लगी। राजा ने उसे पीया, तो उसे इसका स्वाद अत्यंत पसंद आया। इसे पीने के पश्चात् राजा ने नई ऊर्जा एवं स्फूर्ति का अनुभव किया। राजा ने कहा कि अब इसे प्रतिदिन उसे दिया जाए। इस प्रकार चाय पीने का प्रारंभ हुआ।
 
भारत में भी चाय का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। अंग्रेजों ने 1830 के दशक में असम में इसकी बागवानी प्रारंभ की। इसके पश्चात् चाय का व्यवसाय बढ़ता गया। परिणाम स्वरूप आज भारत विश्व का द्वितीय सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है। चाय के उपभोक्ता के रूप में भारत द्वितीय स्थान पर है। अपनी उत्पादित कुल चाय का लगभग 70-80 प्रतिशत भाग घरेलू स्तर पर ही उपभोग हो जाता है। काली चाय के निर्यात के मामले में भारत तृतीय स्थान पर है। यह दो दर्जन से अधिक देशों में चाय निर्यात करता है। यहां से सर्वाधिक काली चाय का निर्यात किया जाता है।     

भारत में चाय का उत्पादन मुख्य रूप से असम में होता है। असम के पश्चात् पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल एवं कर्नाटक में चाय का उत्पादन होता है। चाय कैमेलिया साइनेंसिस नामक पौधे की पत्तियों से बनाई जाती है। प्रसंस्करण के आधार पर चाय विभिन्न प्रकार की होती है, उदाहरण के लिए काली चाय, हरी चाय, सफेद चाय, ऊलोंग टी एवं हर्बल टी आदि। 

अनुभूतियों की चुस्की एक कप चाय

 






Sunday, May 17, 2026

अंगारों पर सिकती मकई





इन आँखों में भारत बोलता और भारतबोध स्वतः होता है।
मिट्टी की सौंधी खुशबू, जंगल की हरियाली और अंगारों पर सिकती मकई — यह सब मिलकर लोकजीवन के सहज आनंद को साकार कर देते हैं।
यह केवल भोजन नहीं, बल्कि भारतीय ग्राम्य संस्कृति, प्रकृति से जुड़ाव और आत्मिक तृप्ति का उत्सव है।
 प्रकृति का सान्निध्य और आत्मीय संग — यही जीवन का वास्तविक सुख है।”
इन देशज स्वादों के पीछे अनेक श्रमशील हाथों का जीवन जुड़ा होता है।
जो लोग इसे अपना रोजगार बनाकर यात्रियों और प्रकृति प्रेमियों तक पहुँचाते हैं, उनसे संवाद करना अपने आप में एक अनुभव है।
उनकी सहजता, अपनापन और जीवन दृष्टि में ही सच्चा भारत दिखाई देता है। 

Saturday, May 16, 2026

मेरा गांव — मेरा तीर्थ













पटनेजी ग्राम, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश
भारत की आत्मा गांवों में बसती है। गांव केवल रहने का स्थान नहीं होते, बल्कि वे हमारी संस्कृति, परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और सभ्यता के जीवंत केंद्र होते हैं। ऐसा ही एक पावन और गौरवशाली ग्राम है — पटनेजी ग्राम, जो उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में स्थित है। यह ग्राम केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि भारतीय ऋषि परंपरा, तप, साधना और सनातन संस्कृति का जीवंत तीर्थ है।
यह भूमि देवताओं की भूमि कही जाती है। यहां की पवित्रता, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण प्रत्येक व्यक्ति के मन को श्रद्धा और भक्ति से भर देता है। ग्राम की पहचान प्राचीन ऋषियों की तपस्थली और संतों की साधना भूमि के रूप में रही है। मान्यता है कि महान योगदर्शन के प्रवर्तक ऋषि पतंजलि की तपोभूमि होने के कारण यह क्षेत्र विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। योग, आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान परंपरा की चेतना यहां के वातावरण में आज भी अनुभव की जा सकती है।
पटनेजी ग्राम की पावन धरती मौनी बाबा की साधना स्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। उनकी तपस्या, त्याग और आध्यात्मिक शक्ति ने इस क्षेत्र को दिव्यता से आलोकित किया। इस भूमि पर अद्भुत शांति और आत्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं। यह स्थान साधकों और श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
ग्राम के समीप बहने वाली पवित्र लीलावती नदी (गंडक) इस क्षेत्र की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक बढ़ाती है। नदी के शांत तट, निर्मल जल और प्राकृतिक वातावरण मन को एक अद्भुत शांति प्रदान करते हैं। इसी पावन तट पर स्थित सोहगरा धाम यहां का प्रमुख तीर्थ स्थल है। सोहगरा धाम श्रद्धा, भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। यहां का वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक अनुभूति और दिव्यता से भर देता है।
पटनेजी ग्राम भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों का संरक्षक भी है। यहां के लोकजीवन में आज भी भारतीय परंपराओं, संस्कारों और सामाजिक समरसता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। ग्राम के त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान, लोकगीत और सामूहिक परंपराएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए हैं। यहां के लोग सरलता, श्रद्धा, सेवा और अपनत्व की भावना से ओतप्रोत हैं।
आज जब आधुनिकता की दौड़ में गांवों की पहचान बदल रही है, तब पटनेजी ग्राम अपनी आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए हुए नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। यह ग्राम हमें यह संदेश देता है कि भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति गांवों की पवित्र चेतना और ऋषि परंपरा में निहित है।
पटनेजी ग्राम केवल मेरा जन्मस्थान नहीं, बल्कि मेरी आस्था, मेरी संस्कृति और मेरा गौरव है। यह मेरे लिए तीर्थ के समान पवित्र है। यहां की मिट्टी, यहां की नदी, यहां के मंदिर और यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा मेरे जीवन को प्रेरणा और संस्कार प्रदान करते हैं।

Friday, May 15, 2026

भारतीय बालिका शिक्षा ज्ञान परंपरा, संबंध मूल्य एवं जीवन मूल्यों पर आधारित है













सरस्वती बालिका विद्यालय, सूर्यकुंड, गोरखपुर में आयोजित चार दिवसीय प्रांतीय बालिका शिक्षा कार्यशाला का समापन सत्र माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन, पुष्पार्चन एवं सरस्वती वंदना के साथ सम्पन्न हुआ।
 इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के मंत्री एवं अखिल भारतीय सह-प्रभारी, प्रचार विभाग प्रोफेसर सौरभ मालवीय तथा क्षेत्रीय बालिका शिक्षा प्रभारी श्री उमाशंकर जी उपस्थित रहे।
डॉ.सौरभ मालवीय  ने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य संबंध मूल्यों एवं जीवन मूल्यों की स्थापना करते हुए नारी को पूज्य भाव प्रदान करना है। भारतीय जीवन शिक्षा पद्धति के माध्यम से बालिकाओं में संस्कारों का संवर्धन कर श्रेष्ठ, सशक्त एवं प्रबल भारत की संकल्पना को साकार किया जा सकता है.
🌸 संस्कारयुक्त बालिका शिक्षा ही सशक्त राष्ट्र निर्माण का आधार है। 

उत्तर प्रदेश संदेश में प्रकाशित मेरा लेख


उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की पत्रिका 'उत्तर प्रदेश संदेश' में प्रकाशित मेरा लेख

नानी के घर की सुखद स्मृति

 -डॉ. सौरभ मालवीय   ग्रीष्मकाल के अवकाश में बच्चे अपनी नानी के घर जाते हैं। बाल्यकाल के ये सुंदर संस्मरण जीवनपर्यंत स्मृति में रहते हैं। हमा...