Friday, September 4, 2026

हज नीति : महिलाएं अकेले हज करेंगी


किसी भी धर्म के लोगों की इच्छा होती है कि वे अपने तीर्थों की यात्रा पर जाएं। केन्द्र सरकार सभी की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें तीर्थ यात्रा पर भेजने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। ये केन्द्र सरकार के प्रयासों का ही परिणाम है कि इस वर्ष 2018 में जहां रिकॉर्ड संख्या में यात्री हज पर जा रहे हैं, वहीं महिलाएं भी बिना पुरुष साथी के हज पर जा रही हैं। भारत से प्रति वर्ष लगभग 1।70 लाख लोग हज यात्रा पर जाते हैं। सऊदी अरब ने पांच हज़ार और यात्रियों की अनुमति दे दी है। इसलिए इस साल यह संख्या 1.75 लाख हो गई है। 

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामले मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के अनुसार आजादी के बाद पहली बार इस वर्ष भारत से रिकॉर्ड 1,75,025 मुस्लिम तीर्थयात्री हज पर जाएंगे और वह भी बिना किसी अनुदान के। केन्द्र  सरकार भारत का हज कोटा लगातार दूसरे वर्ष बढ़ा पाने में कामयाब हो पाई है।
हज के लिए कुल 3,55,604 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें 1,89,217 पुरुष एवं 1,66,387 महिला आवेदक शामिल थे। इस वर्ष कुल 1,28,002 मुस्लिम तीर्थयात्री भारत की हज समिति के माध्यम से हज पर जाएंगे, जिनमें 47 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। 47,023 हज तीर्थयात्री निजी टूर ऑपरेटरों के माध्यम से हज पर जाएंगे।
इसके अतिरिक्त भारत से पहली बार, मुस्लिम महिलाएं बिना ‘मेहराम‘ (पति, पिता या भाई) के हज यात्रा पर जाएंगी। कुल 1308 महिलाओं ने बिना मेहराम के हज यात्रा के लिए आवेदन किया है और इनमें से सभी महिलाओं को लॉटरी स्स्टिम से छूट दे दी गई है और हज पर जाने की अनुमति दी गई है।

उल्लेखनीय है कि अब किसी मुस्लिम महिला को बिना किसी मेहरम (पति, पिता या भाई) के स्वतंत्र रूप से हज यात्रा की अनुमति होगी। सऊदी अरब 45 और इससे अधिक उम्र की महिलाओं को हज के लिए प्रवेश की अनुमति देता है। 45 साल की उम्र पार चुकी 4 या उससे अधिक मुस्लिम महिलाएं एक साथ हज यात्रा पर जा सकती हैं। इससे पहले कोई भी मुस्लिम महिला मेहरम (पति, पिता या भाई) अर्थात अपने खून के रिश्ते वाले रिश्तेदार के बिना हज पर नहीं जा सकती थी। 

केंद्र सरकार ने हज यात्रा के बारे में नई नीति बनाने के लिए पूर्व सिविल अधिकारी अफजल अमानुल्लाह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है। इस छह सदस्यीय हज समिति ने 2018 से 2022 के लिए एक मसौदा तैयार किया है। इसमें कुछ सुझाव दिए गए हैं, जैसे 45 वर्ष की आयु से अधिक महिला को मेहरम के बिना हज यात्रा करने की अनुमति दी जाए और हज सब्सिडी समाप्त की जाए। इन सुझावों को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात में इस निर्णय की घोषणा की थी। इससे मुस्लिम महिलाओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी। 
  
केंद्र सरकार की पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता एवं किराये में अनुचित बढ़ोतरी रोकने के लिए एयरलाइंस को दिए गए कठोर आदेश से यह सुनिश्चित हुआ है कि हज 2018 के हवाई जहाज के किराये में इस वर्ष उल्लेखनीय कमी आई है।

हज प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन/डिजिटल बनाए जाने से पूरी हज प्रक्रिया पारदर्शी और हज तीर्थयात्रियों के अनुकूल बन गई है। नई हज नीति के अनुसार यात्रियों को देश में बेहतर सुविधाएं दिए जाने पर बल दिया गया है। इसके लिए हज रवानगी स्थलों की संख्या 21 से घटाकर नौ कर दी गई, जिनमें दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरू और कोच्चि शामिल हैं।

केन्द्र सरकार की नई हज नीति के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। अब वे महिलाएं भी हज यात्रा कर सकेंगी, जो अकेली रहती हैं या जिनके परिवार में कोई पुरुष नहीं है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

शादी शगुन योजना : लड़कियां खुशहाल होंगी


मुस्लिम समाज में लड़कियों की स्थिति दयनीय है. शिक्षा के मामले में भी उनकी स्थिति अच्छी नहीं है.  गरीबी के कारण भी मुस्लिम लड़कियां अपनी शिक्षा जारी नहीं रख पातीं. किसी भी समाज की समृद्धि के लिए शिक्षा अति आवश्यक है. केन्द्र सरकार मुस्लिम लड़कियों को शिक्षित करना चाहती है, ताकि उनके जीवन स्तर में सुधार हो सके. 

मुस्लिम लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक योजना को स्वीकृति दी है. शादी शगुन नामक इस योजना के अंतर्गत सभी ग्रेजुएट मुस्लिम लड़कियों को 51 हजार रुपये तक की आर्थिक सहायता विवाह के उपहार के रूप में प्रदान की जाएगी। यह योजना देश के सभी राज्यों में लागू की गई है। मुस्लिम लड़कियां जो अपनी शादी से पहले किसी भी वर्ग में अपनी ग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई पूरी कर लेती हैं, वे इस शादी शगुन योजना का लाभ उठाने के लिए योग्य होंगी। ऐसी मुस्लिम वर्ग की लड़कियां जिन्होंने स्नातक स्तर की परीक्षाएं छोड़ दी हैं। उन्हें भी इस योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था ‘मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन’ द्वारा सरकार को शादी शगुन योजना का प्रस्ताव दिया गया था। इस योजना को अल्पसंख्यक मंत्रालय से भी स्वीकृति मिल गई है। इस योजना का उद्देश्य अल्पसंख्यक समूहों में उच्च शिक्षा को प्रोत्साहित करना है। केन्द्र सरकार की यह योजना विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय की लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करने के लिए एक अच्छा कदम है। अल्पसंख्यक समुदायों में से कई लड़कियां अपनी ग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई पूरी करने का अवसर प्राप्त नहीं कर पाती हैं और 18 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले शादी कर लेती हैं। मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन की सिफारिश पर शादी शगुन योजना को प्रारंभ करने का निर्णय लिया है।

मुस्लिम लड़कियों में शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन और केंद्र सरकार के इस कदम से इस लक्ष्य को हासिल करने में सहायता मिलेगी। शादी शगुन योजना मौजूदा बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति में एक अतिरिक्त लाभ है, जो छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों– मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी से संबंधित छात्रों को दी जाती है।
इस योजना के योग्य होने के लिए मुस्लिम लड़कियों को शादी से पहले अपनी ग्रेजुएशन की शिक्षा पूरी करनी होगी। इस योजना के लिए एक मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या  कॉलेज से उत्तीर्ण ग्रेजुएट डिग्री आवश्यक है। मौलाना आजाद फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति का लाभ लेने वाली लड़कियां भी इस योजना के लिए योग्य हैं। शादी शगुन योजना का लाभ लेने के लिए ऑनलाइन भी आवेदन किया जा सकता है. 

गरीबी के कारण भी मुस्लिम लड़कियां विद्यालय नहीं जा पातीं. जो लड़कियां विद्यालय जाती हैं, उन्हें भी बीच में पढ़ाई छोड़नी पड़ती है. ऐसे में वे चाहकर भी उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पातीं. उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की अध्यक्षता में हुई मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन  की बैठक में लड़कियों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति के संदर्भ में कुछ निर्णय किए गए, जिनमें शादी शगुन योजना प्रमुख है। इसके अतिरिक्त यह भी निर्णय लिया गया कि अब नौंवी और दसवीं कक्षा में पढ़ाई करने वाली मुस्लिम बच्चियों को 10 हजार रूपये की राशि प्रदान की जाएगी। अब तक ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ाई करने वाली मुस्लिम लड़कियों को 12 हजार रूपये की छात्रवृत्ति मिल रही थी।

इस योजना से उन समुदायों की लड़कियों में शिक्षा को प्रोत्साहन मिलेगा, जो अब तक शिक्षा से वंचित थीं. इतना ही नहीं, लड़कियों के विवाह के समय उनके माता-पिता को आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी. देश मंा ऐसी योजनाओं की अति आवश्यकता है.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

बैठक




भोपाल। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर विद्या भारती, प्रचार विभाग की केंद्रीय टोली की एक दिवसीय बैठक का आयोजन प्रज्ञादीप, भोपाल में सम्पन्न हुआ।
बैठक में प्रचार-प्रसार की आगामी कार्ययोजना, संगठनात्मक गतिविधियों तथा समसामयिक संचार माध्यमों के प्रभावी उपयोग पर सार्थक चर्चा हुआ। भारतीय संस्कृति, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के संदेश को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने के लिए योजनाओं को और प्रभावी बनाने पर विशेष जोर दिया गया।

Thursday, September 3, 2026

सुखद एवं आत्मीय मुलाकात


भोपाल। प्रो. संजय द्विवेदी जी से आत्मीय संवाद का अवसर मिला। वे भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक तथा वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।
पत्रकारिता, जनसंचार और समकालीन मीडिया विषयों पर उनसे हुई सार्थक चर्चा सदैव की तरह सुखद और प्रेरणादायी रही।

टीवी पर लाइव

 


श्रीराम मंदिर ट्रस्ट की नवगठित कार्यकारिणी का अभिनंदन
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के सुचारु संचालन, विकास और व्यवस्थाओं को नई गति देने के लिए गठित श्रीराम मंदिर ट्रस्ट की नयी कार्यकारिणी का हार्दिक अभिनंदन एवं शुभकामनाएँ।
नवनियुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) का स्वागत है।
प्रभु श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या में आपके नेतृत्व में मंदिर की व्यवस्थाएँ और अधिक सुदृढ़ हों तथा रामभक्तों की सेवा का यह पुनीत कार्य निरंतर नई ऊँचाइयों को प्राप्त करे—इसी मंगलकामना के साथ।

स्मार्ट सिटी योजना : आधुनिक राष्ट्र निर्माण का अभिनव पहल


किसी भी देश, समाज और राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया के आधारभूत तत्व सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण, वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक विकास ही उसका आधार स्तम्भ होता है, जिससे वहां के लोग आपसी भाईचारे से विकास की नैया आगे बढ़ाते हैं। समाज का प्रत्येक वह व्यक्ति जो राष्ट्र का नेतृत्व करना चाहता है, उसके पास राष्ट्र निर्माण के लिए एक दृष्टि होनी चाहिए। साथ ही उसे क्रियात्मक रूप देने के लिए एक कारगर योजना भी होनी चाहिए। भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि कहने को तो देश के पास राष्ट्र-नायकों की कभी कोई कमी नही रही, परंतु आजादी के समय से लेकर मई, 2014 तक एक से बढ़कर एक बुद्धिवादियों के हाथ में देश का नेतृत्व रहा, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए उनके द्वारा जो भी पहल की गई, वह मौलिक सोच पर आधारित नही थी। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जहां देश को समय से पहले इंग्लैंड (विकसित राष्ट्र) बनाना चाहते थे, वही भारत के अंतिम कांग्रेसी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सोच कभी उनकी खुद की नही रही और वह पूरे कार्य काल तक नाममात्र के कठपुतली प्रधानमंत्री बनकर रह गए। राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखना और उसे किसी भी फार्मूले के तहत विकसित राष्ट्र के रूप मे पहल करना गलत नही है, गलती उस दृष्टि की है जिसमें राष्ट्र को देखने की मौलिक सोच और राष्ट्रीय दृष्टि का अभाव है। वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता-सीन होने से पहले तक कमोबेश देश की यही स्थिति रही है। जिनके हाथ मे राष्ट्र के  निर्माण का दायित्व था, उनकी सोच कभी समाजवादी चश्मे की चकाचौध की शिकार थी, तो कभी उनके दृष्टि पर गाहे-बगाहे लाल सलाम का कब्जा रहा।  इसका प्रतिफल यह रहा कि राष्ट्र निर्माण की जो भी आर्थिक नीति बनी और सामाजिक पहल की गई वह निहायत अव्यवहारिक और राष्ट्र को दिवालिया बनाने वाली रही। उन नीतियों का कुफ़ल ही राष्ट्र को 1990 मे आर्थिक संकट के रूप में भुगतना पड़ा। अर्थशास्त्र का हर ज्ञाता इस बात को जानता है कि राष्ट्र निर्माण की नीतियां लोकप्रियता की चाशनी से सराबोर नहीं हो सकती हैं। वह दवा की तरह से कड़वी होती हैं, जो वर्तमान में कष्टकारी और भविष्य के लिए हितकारी परिणाम वाली होती हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय सोच और इसी समझ के नाते उनके हाथ में देश का नेतृत्व देने का निर्णय लिया। मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक किसी भी मोर्चे पर निराश नहीं किया और जनाकांक्षाओं का प्रतीक बनकर जनता के बीच स्वयं को प्रस्तुत किया है। उनके पास दूरदृष्टि और स्पष्ट दृष्टि है। उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही भारत के आधुनिक निर्माण के लिए कई मूर्त कार्य योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की।  इसी क्रम में उन्होंने भारत के शहरों का कार्य योजना के तहत कायाकल्प करने का निर्णय लिया। उनकी इस अभिनव पहल को स्मार्ट सिटी के रूप में पहचान मिली और इसके तहत ही भारतीय शहरों के आधुनिकरण की रूपरेखा बनाई गई। भाजपा सरकार का उद्देश्य देश में ऐसी 100 स्मार्ट सिटी के निर्माण का लक्ष्य है, जो पूरी तरह से आधुनिक संसाधनों से युक्त होंगीं।  एक निश्चित पैमाने के तहत राज्यों से पन्द्रह दिन के अंदर स्मार्ट सिटी के लायक शहरों की सूची भेजने का निर्देश दिया गया। साथ ही ऐसा मानक पैमाना बनाया गया, जिसके तहत यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक राज्य में कम से कम एक स्मार्ट सिटी का निर्माण अवश्य किया जा सके। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 25 जून, 2015 को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को देश के सामने प्रस्तुत किया। स्मार्ट सिटी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय की ओर से बताया गया कि हर राज्य में कम से कम एक स्मार्ट सिटी का अवश्य विकास किया जाएगा। साथ ही यह भी बताया गया कि स्मार्ट सिटी का निर्माण दो चरणों में होगा। पहले चरण के तहत नई स्मार्ट सिटी का निर्माण किया जाएगा और दूसरे चरण में पुरानी स्मार्ट सिटीज़ का नवीनीकरण किया जाएगा। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत केंद्र सरकार ने प्रयोग के तौर पर दो बड़े शहरों के बीच स्मार्ट सिटी के निर्माण का निर्णय किया है। इन स्मार्ट सिटीज़ की खास बात यह है कि इनका निर्माण एक लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों में किया जा रहा है। योजना के तहत जिन शहरों में स्मार्ट सिटीज़ का निर्माण कार्य होना है, वहां नगर निगम की ओर से बिजली, पानी और यातायात की व्यवस्था का होना सुनिश्चित किया जाएगा। साथ ही इन शहरों में सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित प्रयोग लायक मूल-भूत संसाधनों का होना जरूरी है।

स्मार्ट सिटी के विकास के साथ केंद्र सरकार द्वारा जो ध्यान देने योग्य प्रावधान किया गया है, वह यह है की एक स्मार्ट सिटी को अपने नजदीकी शहर के विकास में मदद करनी होगी। इस प्रावधान में केंद्र सरकार की विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी की दूरदर्शी सोच की झलक मिलती है। उनका मानना है कि आधुनिक सुविधाओं और विकास को सीमित दायरे तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका लाभ जितना संभव हो सके आस-पास के क्षेत्र के लोगों को भी मिलना चाहिए। केंद्र सरकार की इस बात की भी तारीफ होनी चाहिए कि इस योजना का निर्माण राजनीतिक आग्रहों और दुराग्रहों से मुक्त होकर किया गया है। अगर ऐसा नहीं होता, तो विरोधी विचारधारा, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले राज्य उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक शहरों को इस प्रोजेक्ट में स्थान नहीं मिलता, क्योंकि मोदी जी का भारत के विकास का जो नजरिया है, वह व्यापक है। उनका मानना है कि देश का विकास एक व्यापक लक्ष्य है। इसके लिए कार्य योजना बनाते समय समग्रता से समाज के प्रत्येक वर्ग को ध्यान में रखकर करना है। राष्ट्र के परम वैभव तक पहुंचने तक सभी राजनीतिक दलों को आपसी मतभेद दरकिनार कर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए। इस लिहाज से भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के गर्भ में भविष्य के भारत की छवि छिपी हुई है। देश में कई महानगर हैं। वहां सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। सारे संसाधन उन्नत अवस्था में हैं, लेकिन सही मायने में देश का विकास तभी होगा, जब उन्नत संसाधनों की पहुंच तक राष्ट्र के आम नागरिक को न जाना पड़े, बल्कि वह ही आसानी से उसकी पहुंच में हो।

स्मार्ट सिटी के विकास के बाद राष्ट्र के विकेंद्रकृत व्यवस्था को धरातल पर लाने में भी पूरा सहयोग मिलेगा और विकास आसानी से गांवों की ओर उन्मुक्त होगा, नासमझ लोग मोदी जी पर शहरवादी और पुंजीपतिवादी होने का आरोप लगाते हैं, जबकि वह इस प्रोजेक्ट के माध्यम से पूंजी और पुंजीपतियों की दिशा गावों की ओर करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री की योजना स्मार्ट सिटी के बाद स्मार्ट गांव बनाने की भी है, ताकि छोटे शहर के छात्रों, कलाकारों और उद्यमियों को एक प्लेटफॉर्म दिलाने के बाद गांव के युवाओं को भी बेहतर अवसर के लिए उचित मंच उपलब्ध कराया जा सके। वास्तविक विकसित राष्ट्र की पहचान उसके सर्वाधिक विकसित शहरों से नहीं होती, बल्कि उसके पास कितने सर्वाधिक विकसित शहर हैं,  इससे होती है। तात्पर्य स्पष्ट है कि विकसित राष्ट्र के मुकाम तक पहुंचने के लिए राष्ट्र का विकेंद्रीकृत शहरीकरण एक बड़ी समस्या है। पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस अभिनव प्रयोग ने समृद्ध, सुदृढ़ और सशक्त भारत की नींव रखी है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट जैसी योजनाओं की मदद से ही भारत सही मायने में 21वीं सदी में विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र बन सकेगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना : बेघरों को घर मिलेंगे


घर किसी भी व्यक्ति का आश्रय स्थल होता है, जहां वह शांति से रहता है. किन्तु ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनका अपना मकान नहीं है. इनमें ऐसे लोग भी सम्मिलित हैं, जो किराये के मकानों में रहते हैं. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन व्यतीत कर देते हैं. जनगणना-2011 के अनुसार देश में लगभग 17.72 लाख लोग बेघर हैं. वर्ष 2001 में हुई जनगणना में यह संख्या लगभग 19.43 लाख थी. इसके अनुसार एक दशक में इस संख्या में कमी आई है. किन्तु इसी समयावधि में शहरी क्षेत्रों में बेघरों की संख्या बढ़ गई, जो चिंता का विषय है. शहरों में बेघरों की संख्या में 1.6 लाख की बढ़ोतरी हुई है. देश के 14 प्रतिशत बेघर लोग देश के शीर्ष पांच महानगरों में रहते हैं. इनकी कुल संख्या 245,490 है. इनमें से ग्रेटर मुंबई में सबसे अधिक बेघर हैं. यहां लगभग 95,755 लोगों के घर नहीं है. दूसरे स्थान पर कोलकाता है, जहां 69,798 लोग बेघर हैं. दिल्ली में 46,724 लोगों के सर पर छत नहीं है. इसी प्रकार चेन्नई में 16,882 और बेंगलुरु में 16,531 लोग बेघर हैं. राज्य की बात करें, तो उत्तर प्रदेश में बेघरों की संख्या सबसे अधिक हैं. यहां पर बेघर लोगों की संख्या 3.19 लाख है. दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र है, जहां 2.13 लाख लोग बेघर हैं. इसके बाद राजस्थान में 1.78 लाख, मध्य प्रदेश में 1.45 लाख और गुजरात में 1.45 लाख लोगों के पास अपना घर नहीं है. इन बेघर लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे ही लोगों के लिए सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना प्रारंभ की है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 नवंबर, 2016 को उत्तर प्रदेश के आगरा से प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का शुभारंभ किया था। इस योजना का लक्ष्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2022 तक सभी को आवास उपलब्ध कराना है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना केन्द्र शासित दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की गई है।

इस योजना के अंतर्गत अगले तीन वर्ष में कुल एक करोड़ पक्के मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सरकार ने अगले तीन वर्ष के लिए 1,30,075 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, जो योजना को वर्ष 2016-17 से लेकर 2018-19 तक लागू करने में काम आएगा। पहले सरकार ने कुल लक्ष्य तीन करोड़ मकानों का रखा था, जिसे बाद में बढ़ाकर चार करोड़ कर दिया गया। इसे वर्ष 2022 तक पूरा किया जाना है। वर्ष 2018-19 तक व्यय होने वाली कुल लागत में केन्द्रीय अंश 81,975 करोड़ रुपये का होगा। इसमें से 60 हजार करोड़ रुपये की पूर्ति बजटीय सहायता द्वारा तथा शेष 20 हजार करोड़ रुपये की पूर्ति कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक से ऋण लेकर की जाएगी। मकान के निर्माण में आने वाली लागत को 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य सरकार के बीच बांटा जाएगा.  उत्तर– पूर्वी और पहाड़ी क्षेत्रों में इसे 90:10 के अनुपात में विभाजित किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत लाभार्थियों का चयन वर्ष 2011 के सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना में दर्शाये गए विभिन्न बिंदुओं को ध्यान में रखकर किया जाएगा। इसमें राज्य सरकारों की भी सहायता ली जाएगी। योजना के अंतर्गत लाभार्थियों के दायरे में गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) सूची के स्थान पर एसईसीसी-2011 के आंकड़ों के अनुसार सभी बेघर परिवार, अनुबंध–1 में दर्शायी गई बहिर्वेशन प्रक्रिया के अधीन शून्य, एक या दो कमरों की कच्ची दीवार या कच्ची छत युक्त मकानों में रहने वाले परिवार सम्मिलित होंगे। लाभार्थियों का चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाएगा। ग्राम सभा उन तथ्यों का सत्यापन करेगी, जिनके आधार पर किसी भी परिवार को योजना के लिए लाभार्थी स्वीकार किया जाएगा।

इस योजना के अंतर्गत सभी लाभार्थियों को मकान बनाने के लिए 1.20 लाख और पहाड़ी क्षेत्रों जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 1.30 लाख की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। लाभार्थी को स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के माध्यम से मकान में शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता का प्रावधान है। मकान के क्षेत्रफल को 20 से 25 वर्ग मीटर कर दिया जाएगा, जिसमें की स्वच्छ खाना पकाने के लिए अलग से स्थान भी सम्मिलित होगा। इससे महिलाओं को अपना रसोईघर भी मिल जाएगा। परियोजना से जुड़े सभी लोगों के लिए गहन क्षमता सर्जक प्रक्रिया रखी जाएगी। ज़िला एवं ब्लॉक स्तर पर आवासों के निर्माण हेतु तकनीकी सुविधाएं प्रदान करने के लिए मदद मुहैया कराई जाएगी। 

लाभान्वितों की वार्षिक सूची की पहचान ग्राम सभा द्वारा सहभागिता पूर्वक की जाएगी। मूल सूची की प्राथमिकता में परिवर्तन के लिए ग्राम सभा को लिखित में न्यायसंगत ठहराना होगा। 
वित्तीय सहायता की राशि सीधा लाभार्थी के बैंक या डाकघर के बचत खाते में हस्तांतरित कर दी जाएगी। किन्तु यह याद रहे की लाभार्थी के खाते में लाभार्थी की सहमति से उसके आधार संख्या की संबद्धता कर दी गई हो। ऋण राशि को 70 हजार रुपये से बढ़ाकर अब दो लाख रुपये कर दिया गया है, नई ऋण योजना के अंतर्गत अब प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के लाभार्थी दो लाख रुपये तक का ऋण ले सकते हैं और उनको इस गृह ऋण पर ब्याज में 3 प्रतिशत की छूट भी दी जाएगी, बशर्ते ये ऋण नया मकान बनाने अथवा मकान के विस्तार के लिए लिया गया हो।

इस योजना के अंतर्गत बनाए जाने वाले मकानों में शौचालय, पेयजल, बिजली, स्वच्छ एवं कुशल ईंधन, तरल अपशिष्ट के शोधन आदि मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने के लिए अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लिया जाएगा। सरकार ने एक तकनीकी सहायता एजेंसी का भी गठन किया है, जो लाभार्थी को वित्तीय सहायता के अतिरिक्त मकान के निर्माण में तकनीकी सहायता भी प्रदान करेगी। प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों द्वारा स्थानीय सामग्रियों का उपयोग करते हुए सुंदर मकान बनाना जाएगा। मकानों की संरचना ऐसी होगी, जो क्षेत्रीय आधार पर उपयुक्त हों, मकानों की रचना में ऐसी विशेषताएं रखी जाएंगी जो उन्हें प्राकृतिक आपदाओं से बचा सकें। 

सरकार पहले से ही शहरी क्षेत्रों के लिए आवास योजना चला रही है. इसके अंतर्गत अब तक लगभग कई लाख मकानों के निर्माण को स्वीकृति मिल चुकी है। इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2022 तक दो करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य रख गया है।

इस योजना से उन लोगों को लाभ होगा, जिनका अपना मकान नहीं है। महंगाई के कारण लोग आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. दो समय का भोजन जुटाने में ही उन्हें बहुत सी समस्याओं को सामना करना पड़ता है. ऐसी स्थिति में अपने घर का सपना देखना भी उनके लिए असंभव हो गया है. ऐसे ही लोगों के सपनों को पूरा करने के लिए सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना लेकर आई है.  

मकान एक आर्थिक सम्पत्ति है एवं स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डालने के साथ ही सामाजिक उन्नति में योगदान देता है। किसी परिवार के लिए रहने का स्थाई मकान होने के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष फायदे अमूल्य एवं ढेरों हैं। निर्माण क्षेत्र भारत में दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार प्रदाता है। इस क्षेत्र का 250 से भी अधिक अधीनस्थ उद्योगों से संबंध है। ग्रामीण आवास योजना के विकास से ग्रामीण समाज में रोजगारों का सृजन होता है और इससे गांवों के अर्थतंत्र का विकास होता है। रहने के लिए वातावरण बेहतर होने के अप्रत्यक्ष लाभ श्रम उत्पादकता एवं स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव के रूप में होते हैं। पोषण, स्वच्छता, माता एवं बच्चे के स्वास्थ्य समेत मानव विकास के मापदंडों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जीवन स्तर बेहतर होता है। इस योजना से जहां बेघरों को अपने घर मिलेंगे, वहीं रोजगार को बढ़ावा देने में भी यह सहायक सिद्ध होगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

हज नीति : महिलाएं अकेले हज करेंगी

किसी भी धर्म के लोगों की इच्छा होती है कि वे अपने तीर्थों की यात्रा पर जाएं। केन्द्र सरकार सभी की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्ह...