Sunday, October 18, 2026

सांस्कृतिक एकता की प्रतीक विजयदशमी


डॊ. सौरभ मालवीय
भारत एक विशाल देश है. इसकी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति. यह भारत की सांस्कृतिक विशेषता ही है कि कोई भी पर्व समस्त भारत में एक जैसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, भले ही उसे मनाने की विधि भिन्न हो. ऐसा ही एक पावन पर्व है दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है. दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. विश्वभर में हिन्दू इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. यह अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के अवतार राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी. रावण भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण करके लंका ले गया था. भगवान राम देवी दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी को मुक्त कराया. दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है, जिनमें चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा भी सम्मिलित है. यह शक्ति की पूजा का पर्व है. इस दिन देवी दुर्गा की भी पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन लोग नया कार्य प्रारंभ करना अति शुभ माना जाता है. दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है. नवरात्रि में स्वर्ण और आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है.

दशहरा नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है. देशभर में दशहरे का उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरे से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता. इस दौरान नवरात्रि भी होती हैं. कहीं-कहीं रामलीला का मंचन होता है, तो कहीं जागरण होते हैं. दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है. इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और अग्नि बाण इन पुतलों को मारते हैं. पुतलों में पटाखे भरे होते हैं, जिससे वे आग लगते ही जलने लगते हैं.

समस्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में दशहरे का यह पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. कश्मीर में नवरात्रि के नौ दिन माता रानी को समर्पित रहते हैं. इस दौरान लोग उपवास रखते हैं. एक परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं. यह मंदिर एक झील के बीचोबीच स्थित है.  हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित पहाड़ी लोग अपनी परंपरा के अनुसार अपने ग्रामीण देवता की शोभायात्रा निकालते हैं. इस दौरान वे तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े आदि वाद्य बजाते हैं तथा नाचते-गाते चलते हैं. शोभायात्रा नगर के विभिन्न भागों में होती हुई मुख्य स्थान तक पहुंचती है. फिर ग्रामीण देवता रघुनाथजी की पूजा-अर्चना से दशहरे के उत्सव का शुभारंभ होता है. हिमाचल प्रदेश के साथ लगते पंजाब तथा हरियाणा में दशहरे पर नवरात्रि की धूम रहती है. लोग उपवास रखते हैं. रात में जागरण होता है. यहां भी रावण-दहन होता है और मेले लगते हैं. उत्तर प्रदेश में भी दशहरा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यहां रात में रामलीला का मंचन होता है और दशहरे के दिन रावण दहन किया जाता है.

बंगाल, ओडिशा एवं असम में दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है.  बंगाल में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाता है. ओडिशा और असम में यह पर्व चार दिन तक चलता है. यहां भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं तथा उनमें देवी दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है. दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं. इसके पश्चात देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है. विसर्जन यात्रा में असंख्य लोग सम्मिलित होते हैं.

गुजरात में भी दशहरे के उत्सव के दौरान नवरात्रि की धूम रहती है. कुंआरी लड़कियां सिर पर मिट्टी के रंगीन घड़े रखकर नृत्य करती हैं, जिसे गरबा कहा जाता है. पूजा-अर्चना और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन किया जाता है. महाराष्ट्र में भी नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है तथा दसवें दिन विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति की जाती है. इस दिन बच्चे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मां सरस्वती की पूजा करते हैं.

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरे के उत्सव के दौरान लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है. पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है. दूसरे दिन कला एवं विद्या की देवी सरस्वती-की अर्चना की जाती है तथा और अंतिम दिन शक्ति की देवी दुर्गा की उपासना की जाती है. कर्नाटक के मैसूर का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को प्रकाश से ससज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण का दहन का नहीं किया जाता.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा का बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है. यहां इस दिन देवी दंतेश्वरी की आराधना की जाती है. दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं. यहां यह त्यौहार 75 दिन यानी श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है. प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है. देवी कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहा जाता है. यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं. बताया जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था. काछिन गादि के बाद जोगी-बिठाई होती है, तदुपरांत भीतर रैनी (विजयदशमी) और बाहर रैनी (रथ-यात्रा) निकाली जाती है. अंत में मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है.इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है.

दशहरे के दिन वनस्पतियों का पूजन भी किया जाता है. रावण दहन के पश्चात शमी नामक वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
इसके साथ ही अपराजिता (विष्णु-क्रांता) के पुष्प भगवान राम के चरणों में अर्पित किए जाते हैं. नीले रंग के पुष्प वाला यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है.

दशहरे का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है.

Saturday, October 17, 2026

समाचार पत्रों में

 




श्रेष्ठ विचारों से सशक्त समाज का निर्माण होता है : डॉ. सौरभ मालवीय

 










फतेहपुर। भारतीय शिक्षा समिति, कानपुर प्रान्त के तत्वावधान में विद्वत परिषद संगोष्ठी का आयोजन सरस्वती विद्या मंदिर, खागा, फतेहपुर में सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी में समाज के प्रबुद्धजनों एवं बुद्धिजीवियों ने भारतीय ज्ञान परम्परा, सामाजिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण में विचारों की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि श्रेष्ठ विचार ही सशक्त समाज के निर्माण का आधार हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा पर आधारित भारतीय समाज का जीवन दर्शन परोपकार, सेवा, सह-अस्तित्व और लोकमंगल की भावना से प्रेरित है। हमारी परम्परा में ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना भी है।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल्यों को आत्मसात कर समाज में सकारात्मक विचारों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत किया जा सकता है। विद्वत परिषद जैसी संगोष्ठियां वैचारिक जागरण के साथ ही भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कृष्ण स्वरूप सिंह ने की तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में रजनीश पाठक उपस्थित रहे। संगोष्ठी में समाज के अनेक बुद्धिजीवियों एवं प्रबुद्धजनों ने सहभागिता की।

Friday, October 16, 2026

पुस्तक भेंट





लखनऊ। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. अजय तनेजा जी के साथ एक सुखद एवं आत्मीय मुलाकात हुई।
इस अवसर पर उन्हें अपनी पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ भेंट की। 

Thursday, October 15, 2026

शिक्षा, संस्कार और सेवा के लिए समर्पित विद्या भारती के बढ़ते कदम : डॉ. सौरभ मालवीय














लखनऊ। शिक्षा के साथ संस्कार और कौशल विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विद्या भारती निरंतर नए आयाम स्थापित कर रही है। इसी क्रम में आज सरस्वती विद्या मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, सेक्टर-क्यू, अलीगंज, लखनऊ में भाऊराव देवरस कौशल विकास केंद्र का उद्घाटन विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय ने किया।

विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने, उनकी प्रतिभा को निखारने तथा उन्हें विभिन्न कौशलों में दक्ष बनाने के उद्देश्य से विद्या भारती ने अपने विद्यालयों में कौशल विकास कार्यक्रम संचालित करने का संकल्प लिया है। इस केंद्र के माध्यम से विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक और व्यावहारिक कौशल से परिचित कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. सौरभ मालवीय, संभाग निरीक्षक, कोषाध्यक्ष श्री के. आर. कनौजिया तथा विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री संतोष कुमार सिंह ने फीता काटकर केंद्र का उद्घाटन किया। इसके उपरांत मां सरस्वती एवं मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के समक्ष दीप प्रज्वलित कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर डॉ. मालवीय ने विद्यालय की एआई लैब का भी निरीक्षण किया और विद्यार्थियों के लिए आधुनिक तकनीक आधारित शिक्षा के प्रयासों का अवलोकन किया।

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने ध्यान, योग और प्रार्थना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रार्थना और वंदना हमारी भारतीय संस्कृति एवं जीवन मूल्यों से जुड़ने का माध्यम हैं। विद्यार्थियों को अपनी भारतीय पहचान, संस्कृति और ज्ञान परंपरा पर गर्व करना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास, कौशल और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय संस्कारों का समन्वय विद्यार्थियों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाएगा। कौशल विकास केंद्र जैसी पहल विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने और उनके उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में सहायक सिद्ध होगी।

कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रधानाचार्य श्री संतोष कुमार सिंह ने अतिथियों का परिचय कराते हुए उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम में विद्यालय परिवार के सदस्य एवं अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।

विद्या भारती का यह प्रयास शिक्षा, संस्कार और कौशल के समन्वय से आत्मनिर्भर, चरित्रवान एवं राष्ट्रनिष्ठ युवा पीढ़ी के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

टीवी पर लाइव

 



माफिया की जमीन पर गरीबों के आशियाने, यही है बदलते उत्तर प्रदेश की तस्वीर!
जिस जमीन पर कभी माफिया का कब्जा था, वहाँ आज गरीबों के सपनों का घर आकार ले रहा है।
अतीक अहमद की जमीन पर गरीबों के लिए आवास—यह सत्ता के संरक्षण से नहीं, कानून के राज और जनकल्याण की सोच से बदलाव का संदेश है।
यही है योगी राज—अवैध कब्जे से मुक्ति, गरीबों को आशियाना और सुशासन की नई पहचान!

Sunday, October 11, 2026

टीवी पर लाइव




लोकतंत्र में विपक्ष को धरना-प्रदर्शन करने और सरकार की नीतियों का विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह विरोध सदन, संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति विश्वास बनाए रखते हुए होना चाहिए।

सड़क पर दबाव बनाकर राजनीति करने के बजाय सदन में तथ्यों, तर्कों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। विरोध के ऐसे तरीकों से बचना चाहिए, जिनसे आमजन का जनजीवन प्रभावित हो, यातायात बाधित हो और नागरिकों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़े।

लोकतंत्र में असहमति का सम्मान आवश्यक है, लेकिन जनहित और जनसुविधा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

विरोध का उद्देश्य व्यवस्था को बाधित करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए।

सदन में संवाद, संविधान में विश्वास और जनहित को सर्वोपरि रखना ही सशक्त लोकतंत्र की पहचान है।

सांस्कृतिक एकता की प्रतीक विजयदशमी

डॊ. सौरभ मालवीय भारत एक विशाल देश है. इसकी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति. यह भारत की सांस्कृतिक विशेषता...