Tuesday, September 1, 2026

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना : राह हुई आसान


किसी की क्षेत्र के विकास के लिए सड़क का होना बहुत आवश्यक है। जहां सड़कें होंगी, वहां यातायात के साधन भी होंगे। इससे उस क्षेत्र के लोगों का आवागमन सुगम होगा। देश में आज भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां सड़कें नहीं हैं। ऐसे भी क्षेत्रों की कमी नहीं है, जहां सड़कों की स्थित अच्छी नहीं है। इन क्षेत्र के निवासियों को यातायात में असुविधा का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार ग्रामीण सड़क संपर्क आर्थिक और सामाजिक सेवाओं तक पहुंच का संवर्धन करते हुए और फलस्वरूप भारत में कृषि आय और उत्पादक रोजगार अवसरों का अधिक मात्रा में सृजन करते हुए ग्रामीण विकास का न केवल एक मुख्य घटक है, अपितु स्थायी रूप से गरीबी निवारण कार्यक्रम का भी एक मुख्य भाग है। पिछले वर्षों में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य और केन्द्र स्तरों पर किए गए प्रयासों के बावजूद देश में अभी भी लगभग 40 प्रतिशत बसावटें बारहमासी सड़कों से जुड़ी हुई नहीं हैं। यह सर्वविदित है कि जहां पर सड़क संपर्क उपलब्ध भी कराया गया है, वहां निर्मित सड़कों की स्थिति ऐसी नहीं है कि उन्हें बारहमासी सड़कों के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सके। 

इस स्थिति को सुधारने के लिए केन्द्र सरकार ने 25 दिसम्बर, 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की थी। यह शत-प्रतिशत केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजना है। इस कार्यक्रम के लिए हाई स्पीड डीजल पर 50 प्रतिशत उपकर निर्धारित है। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों से न जुड़ी बसावटों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना है, जिसमें आवश्यक पुलियां और क्रास-ड्रेनेज भी सम्मिलित हैं। इस योजना के अंतर्गत उन जिलों में मौजूदा सड़कों को सुधारने की अनुमति दी जाएगी, जहां निर्दिष्ट जनसंख्या वाली सभी बसावटों को बारहमासी सड़क संपर्कता प्रदान की गई है। यह सुधार-कार्य कार्यक्रम का केन्द्र बिन्दु नहीं है और इस स्थिति में यह उन राज्यों के राज्य आवंटन के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है, जहां वे बसावटें मौजूद हैं,  जो अभी भी सड़कों से जुड़ी हुई नहीं हैं। सुधार कार्य में कोर नेटवर्क में सामान्य और सभी सड़कों को बारहमासी सड़कों में बदलने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके कई मार्गदर्शक सिद्धांत और परिभाषाएं हैं, जैसे प्रधानमंत्री सड़क योजना की भावना और उद्देश्य सड़क से न जुड़ी बसावटों को बेहतर बारहमासी सड़कें प्रदान करना है। यह सुनिश्चित किया जाए कि नये सड़क संपर्क के प्रावधान को कार्यक्रम के उद्देश्य को ध्यान में रखकर वरीयता दी जाएगी, यानी वे बसावटें जो अभी सड़कों से जुड़ी हुई नहीं हैं। 
 
बसावटों की जनसंख्या के आकार से संबंधित है। जनगणना 2001 में दर्ज की गई जनसंख्या बसावट के जनसंख्या आकार को निर्धारित करने का आधार होनी चाहिए तथा इसी के आधार पर जिला ग्रामीण सड़क योजनाएं और कोर नेटवर्क बनाए/संशोधित किए जाने चाहिए। सड़कों से न जुड़ी बसावट, वह बसावट है जिसमें निर्दिष्ट आकार की जनसंख्या है, जो बारहमासी सड़क अथवा सड़क से जुड़ी बसावट से कम से कम 500 मीटर या इससे अधिक की दूरी पर स्थित है। पहाड़ों के मामले में 1।5 किलीमीटर पैदल दूरी पर हैं। सड़कों से न जुड़ी बसावटों को बारहमासी सड़क अथवा अन्य मौजूदा बारहमासी सड़क से पहले से ही जुड़ी समीपवर्ती बसावटों से जोड़ा जाना होता है, जिससे सड़कों से न जुड़ी बसावट में प्राप्त न होने वाली शिक्षा, स्वास्थ्य, विपणन आदि सुविधाएं  निवासियों को मिल सकें। इस कार्यक्रम के लिए इकाई राजस्व गांव अथवा पंचायत न होकर एक बसावट है। क्षेत्र में रहने वाली जनसंख्या के समूह, जो लंबे समय तक स्थान नहीं बदलते हैं, बसावट करते हैं। देद्गाम, धानिस, तोलास, माजरस, हैम्लिट आदि बसावटों की व्याख्या के लिए सामान्य रूप से प्रयोग में आने वाले शब्द हैं। एक राजस्व गांव/ग्राम पंचायत में एक या इससे अधिक बसावटें हो सकती हैं। जनसंख्या आकार को निर्धारित करने के प्रयोजनार्थ 500 मीटर की दूरी के भीतर (पहाड़ों के मामले में 1।5 कि।मी। पैदल दूरी) सभी बसावटों की जनसंख्या को एक साथ शामिल किया जा सकता है। समूहगत नीति अनेक बसावटों खासकर पहाड़ी/पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क के प्रावधान को सक्षम बनाएगी।

कोर नेटवर्क सड़कों का ऐसा अल्प नेटवर्क है, जो कम से कम एक बारहमासी सड़क संपर्कता के  माध्यम से चुनिंदा क्षेत्रों में सभी पात्र बसावटों को अनिवार्य सामाजिक आर्थिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है। कोर नेटवर्क में थ्रू रूट्स और लिंक रूट्स सम्मिलित हैं। थ्रू रूट वे हैं, जिनसे कई संपर्क सड़कों या कई गांवों से यातायात आकर चलता है और यह उच्च श्रेणी की सड़कों अर्थात् जिला सड़कों या राज्य अथवा राष्ट्रीय राजमार्ग के माध्यम से सीधे विपणन  केन्द्रों से जुड़े होते हैं। लिंक रूट वे सड़कें हैं, जो किसी एक बसावट या बसावटों के एक समूह को थ्रू रूटों या जिला सड़कों से जोड़ती हैं और ये विपणन केन्द्रों तक जाती हैं। लिंक रूट सामान्यतः किसी बसावट की सीमा खत्म होने पर समाप्त हो जाते हैं। हालांकि थ्रू रूट दो या अधिक लिंक रूटों को मिलाकर तथा मुख्य सड़क या विपणन केन्द्र से उत्पन्न होते हैं। यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत शुरू किया गया प्रत्येक सड़क कार्य कोर नेटवर्क का भाग है। सड़क संपर्क के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन सड़कों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो संयोगवद्गा अन्य बसावटों के काम आती हैं। इस योजना के अंतर्गत उन सड़कों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो अधिक आबादी के काम आती है। यद्यपि मैदानी क्षेत्रों में सड़क से 500 मीटर की दूरी वाली बसावटों को सड़क से जुड़ा हुआ माना गया है, पर्वतीय क्षेत्रों यह दूरी 1।5 किलोमीटर होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना केवल ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करेगी। द्राहरी सड़कें इस कार्यक्रम के क्षेत्र से बाहर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह योजना केवल उन्हीं ग्रामीण सड़कों को कवर करती है, जो पहले से ही ’अन्य जिला सड़कों’ तथा ’ग्राम सड़कों’ के रूप में वर्गीकृत थीं। अन्य जिला सड़कें ऐसी सड़कें हैं, जो उत्पादन वाले ग्रामीण क्षेत्रों में काम में आती हैं और बाजार केन्द्रों, तालुका मुख्यालयों, ब्लाक मुख्यालयों या अन्य मुख्य सड़कों तक जाने का मार्ग देती हैं। ग्राम सड़कें ऐसी सड़कें हैं, जो गांवों / बसावटों या बसावट के समूहों को एक-दूसरे से तथा उच्च श्रेणी की समीपवर्ती सड़क से जोड़ती हैं। इस योजना के अंतगर्त मुख्य जिला सड़कों, राज्य राजमार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग को शामिल नहीं किया जा सकता है, चाहे वे ग्रामीण क्षेत्रों में ही आती हों। यह नई सड़क संपर्कता या उन्नयन कार्यों पर लागू है। इस योजना में केवल एकल सड़क संपर्कता की ही व्यवस्था है। यदि कोई बसावट पहले ही बारहमासी सड़कों के माध्यम से किसी अन्य सड़क से जुड़ी बसावट से जुड़ी हुई है, तो उस बसावट में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत कोई अन्य कार्य शुरू नहीं किया जा सकता है।

सड़कों से न जुड़ी बसावटों के लिए सड़क संपर्क का प्रावधान नये सड़क संपर्क के रूप में माना जाएगा। नये सड़क संपर्क में मिट्टी कार्य स्तर से वांछित विनिर्देद्गान तक सड़कों का निर्माण समाविष्ट है तथा इसलिए उसमें निरपवाद रूप से कुछ मिट्टी कार्य शामिल होगा। पहाड़ी क्षेत्रों के मामले में काट-छांट शामिल होगा। मौजूदा बजरी या पक्की सड़कें नये सड़क संपर्क कार्य के रूप में स्वीकार करने के योग्य नहीं होगी, चाहे वहां पर कैरेज-वे और सड़क को चौड़ा करने का कुछ मिट्टी कार्य हुआ है। ऐसे सड़क, जिस पर केवल मिट्टी कार्य किया गया है, उसे नये सड़क संपर्क के रूप में माना जाएगा। सुधार में अनुमति मिलने पर सड़क को चौड़ा किया जाएगा। क्रास ड्रैनेज कार्य का प्रावधान ही इस योजना के अंतर्गत उन्नयन कार्य के रूप में माना जाएगा।  ग्रेवल की सड़क वह सड़क होती है जिस का निर्माण सुसंघटित बजरी तथा रोड़ी सामग्री का उपयोग करके किया जाता है, जो पक्की होती है और गीली होने पर फिसलनदार नहीं होती है। वाटर बांऊड मैकेडम सड़क की वह परत है, जो मशीब द्वारा बारीक या टुकड़े वाली सामग्री से रिक्त स्थान को पूरी तरह भर कर तैयार की जाती है।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का मुख्य लक्ष्य सम्पर्क विहीन बसावटों को बारहमासी सम्पर्क सड़क प्रदान करना है। बारहमासी सड़क वह है जो सभी मौसम में प्रयोग के योग्य होती है। इसका तात्पर्य यह है कि सड़क के अंतगर्त उपयुक्त आर-पार नालियों जैसे पुलियों, छोटे पुलों एवं सेतुकों का निर्माण किया गया हो और जिसमें उचित संख्या एवं अवधि में यातायात की बाधा को  स्वीकृति दी गई हो। पैदल पथ पर हर मौसम में काम में आने योग्य होना चाहिए, परन्तु इसमें यह आवश्यक नहीं है कि इस पर खड़ंजा लगाया जाए या चौरस बनाया जाए या तारकोल बिछाकर पक्का किया जाए। ऐसी सड़कें भी हो सकती हैं, जिन्हें सामान्य मौसम की सड़कें मानी जाती हों। दूसरे शब्दों में, आरपार नालियों के कार्यों के अभाव में वे मात्र मौसम में उपयोगी होती हैं। ऐसी सड़कों का बारहमासी सड़कों में बदलाव सुधार माना जाएगा। मात्र आरपार नालियों के कार्यों के प्रावधान को भी सुधार माना जाएगा। परन्तु यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के समस्त सड़क कार्यों में अपेक्षित आरपार नालियों के कार्यों का प्रावधान एक अत्यावश्यक तत्व समझा गया है।

इस योजना में तारकोल बिछी या सीमेंट से बनी सड़कों की मरम्मत करने की अनुमति नहीं दी गई है, भले ही सतह की स्थिति खराब हो गई हो। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनाई गई ग्रामीण सड़कें तकनीकी विशिष्टताओं के अनुरूप हों। इसमें ग्रामीण सड़क नियम-पुस्तिका में बताए अनुसार इंडियन रोड्स कांग्रेस द्वारा निर्धारित विशिष्टताओं को अपनाया जाएगा।

सरकार की इस योजना से अनेक क्षेत्रों में पक्की सड़कें बन गईं। दूर-दराज के क्षेत्रों को मुख्य मार्गों से जोड़ दिया गया, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में आसानी हो गई। इस क्षेत्र में अभी बहुत काम होना शेष है।




(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना : धुएं से मुक्ति


भोजन पकाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है। ग्रामीण परिवारों में आज भी महिलाएं मिट्टी के चूल्हे पर भोजन पकाती हैं। ईंधन के रूप में लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है। इन चूल्हों से धुआं होता है। धुएं के कारण जहां वायु प्रदूषण फैलता है, वहीं महिलाएं कई प्रकार के रोगों की चपेट में आ जाती हैं। धुएं के कारण उन्हें फेफड़ों और नेत्र संबंधी रोग हो जाते हैं। ईंधन के रूप में लकड़ियों का प्रयोग करने से ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार पेड़ कम हो रहे हैं।

ग्रामीण महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शुरू की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 मई, 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का शुभारंभ किया। इससे पहले 29 फरवरी, 2016 को केंद्रीय बजट में 8000 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ तीन वर्षों की अवधि के दौरान बीपीएल परिवारों को पांच करोड़ एलपीजी कनेक्शन जारी करने की घोषणा की गई थी। इस योजना के अंतर्गत गरीब महिलाओं को निशुल्क गैस कनेक्शन उप्लब्ध कराए जाएंगे। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जो परिवार गरीब श्रेणी में रखे गए थे या बीपीएल श्रेणी में रखे गए थे, उन्हें इस योजना का लाभ दिया जाएगा। 

इस योजना के क्रियान्वयन के लिए प्राथमिकता वाले राज्यों के रूप में राष्ट्रीय औसत से कम एलपीजी कवरेज वाले 14 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी राज्यों और सभी पूर्वोत्तर राज्यों की पहचान की गई थी। अधिकतम कनेक्शनों वाले शीर्ष पांच राज्यों में उत्तर प्रदेश (46 लाख), पश्चिम बंगाल (19 लाख), बिहार (19 लाख), मध्य प्रदेश (17 लाख) और राजस्थान (14 लाख) सम्मिलित हैं। दिसंबर, 2016 तक जारी किए गए कुल कनेक्शनों में लगभग 75 प्रतिशत भाग इन्हीं पांचों राज्यों का था। लाभार्थियों में बड़ी संख्या एससी/एसटी परिवारों की ही है। 35 प्रतिशत कनेक्शन इन्हीं परिवारों को जारी किए जा रहे हैं। अब यह योजना 35 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में क्रियान्वित की जा रही है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की ओर से सभी बीपीएल परिवारों को 1600 रूपये की वित्तीय सहायता देने का प्रावधान रखा गया है। इस योजना का लाभ लेने के लिए सबसे पहले 2011 की जनगणना की सूची में अपना नाम देखना होगा। यदि वहां पर उनका नाम आया है, तो वे गैस कनेक्शन के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इच्छुक बीपीएल परिवार की महिला सदस्य निर्धारित आवेदन पत्र भरकर अपने नजदीकी एलपीजी वितरण केंद्र में जमा करा सकती है। याद रहे कि जिन बीपीएल परिवारों के पास योजना के आरंभ के समय तक एलपीजी कनेक्शन नहीं है, केवल वही योजना के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस योजना का लाभ लेने के लिए सभी दस्तावेज को आवेदन पत्र के साथ संलग्न करना होगा और उसके बाद उन्हें अपने नजदीकी एलपीजी गैस वितरक के पास जाकर जमा कराना होगा। इस दस्तावेजों में दो पासपोर्ट साइज फोटो, बीपीएल राशन कार्ड, एक फोटो पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट की प्रति, राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित स्व-घोषणा पत्र, जीवन बीमा पॊलिसी, बैंक स्टेटमेंट, बीपीएल सूची में नाम का प्रिंट आउट आदि शामिल हैं। आवेदन पत्र को संबंधित वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है। आवेदन पत्र हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मिल जाएगा। इच्छुक अपनी भाषा के अनुसार आवेदन को डाउनलोड कर सकते हैं और आवेदन पत्र को भरकर और सभी दस्तावेजों को एक साथ जोड़ कर अपने नजदीकी किसी भी एलपीजी वितरक के पास जमा करके इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। 

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों के लिए इस योजना को शुरू करने के प्रथम वर्ष में 2।20 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन दिए गए हैं। एसईसीसी 2011 के डेटा से यह जानकारी उभर कर सामने आई है। यह वित्त वर्ष के लिए तय 1।5 करोड़ कनेक्शनों के लक्ष्य से अधिक है। वित्त वर्ष 2016-17 में तेल विपणन कंपनियों ने देश भर में 3।25 करोड़ नये कनेक्शन दिए हैं। यह किसी भी वर्ष में अब तक जारी किए गए सर्वाधिक कनेक्शन हैं। अप्रैल, 2017 तक सक्रिय एलपीजी उपभोक्ताओं की कुल संख्या 20 करोड़ के पार चली गई है। यह वर्ष 2014 में आंके गए 14 करोड़ सक्रिय एलपीजी उपभोक्ताओं की तुलना में काफी अधिक है। देश में एलपीजी की मांग में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले तीन वर्षों में 4600 से अधिक नये वितरक बने हैं, जो मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित हैं।

50 प्रतिशत नये उपभोक्ता रिफिल के लिए वापस आ चुके हैं। इस योजना को भागीदारी मोड में क्रियान्वित किया गया है, जिनमें लाभार्थी, निर्वाचित प्रतिनिधि, प्रतिष्ठित हस्तियां, स्थानीय प्रशासन इत्यदि शामिल हैं। इस योजना को लोकप्रिय बनाने और लाभार्थियों को सुरक्षा मानकों के बारे में जागरूक करने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में प्रचार-प्रसार की विशेष संचार रणनीति पर अमल किया गया। इसमें संचार के समस्त माध्यमों का उपयोग किया गया और इस योजना के क्रियान्वयन की निगरानी की भी व्यवस्था की गई है। इस योजना ने एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया है और बड़ी संख्या में लाभार्थी अपने यहां एलपीजी सिलेंडर की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए आवेदन कर रहे हैं।

सुरक्षा एवं एलपीजी के सुरक्षित उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। योजना के समस्त लाभार्थियों के घरों में मैकेनिक के माध्यम से एलपीजी सिलेंडर लगवाने जैसे उपाय किए जा रहे हैं, ताकि लाभार्थियों को एलपीजी के सुरक्षित एवं समुचित उपयोग के बारे में सही ढंग से बताया जा सके। इसी तरह योजना के लाभार्थियों के लिए देश भर में नियमित रूप से सुरक्षा शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे उन्हें एलपीजी के सुरक्षित उपयोग के बारे में अवगत कराया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वर्ष के भीतर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की संख्या दो करोड़ को पार करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था, ''बहुत खुशी और गर्व की बात है कि एक वर्ष के भीतर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की संख्या दो करोड़ को पार कर गई है।'' 

वास्तव में इस योजना से गरीब महिलाओं के जीवन में गुणात्मक बदलाव आने लगा है। उन्हें धुएं से मुक्ति मिली है और भोजन पकाने में उन्हें अब असुविधा का सामना भी नहीं करना पड़ता।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Monday, August 31, 2026

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ : सक्षम होंगी बेटियां


जिस देश में नारी को देवी का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है, उस देश में कन्याओं के प्रति घृणा की मानसिकता का पैदा होना तुच्छ कहा जाएगा। अधिकतर माता-पिता अपनी संतान के रूप में पुत्र की कामना करते हैं। पुत्र की अभिलाषा में वे अवैध रूप से भ्रूण की जांच कराते हैं। सरकार की पाबंदी के बाद भी चोरी-छिपे लिंग जांच का कार्य चल रहा है। भ्रूण के कन्या होने पर लोग गर्भपात करा देते हैं। इसी कारण देश में लड़कियों का अनुपात निरंतर कम हो रहा है। वर्ष 2001 में की गई गणना के अनुसार प्रति 1000 लड़को में 927 लड़कियां थीं। इसके एक दशक बाद यह आंकड़ा गिरकर वर्ष 2011 में 918 हो गया। 

कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए केंद्र सरकार बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ योजना चला रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत में यह योजना प्रारंभ की थी। इस योजना का उद्देश्य कन्या भ्रूणहत्या को रोकना और बेटियों को सुरक्षा प्रदान करना है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के लिए 100 करोड़ की प्रारंभिक राशि की घोषणा की थी। सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कार्य करने पर बल दे रही है। इसके लिए 50 करोड़ रुपये का फंड दिया जाएगा,  जिससे मुख्यतः महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन की सुविधा दी जाएगी। एक बटन के माध्यम से संदेश आवाज के साथ ही चित्र के माध्यम से सुरक्षा के लिए सहायता मांगने की सुविधा दी जाएगी। यदि कोई दुर्घटना हो गई है, तो इस स्थिति में उचित कार्यवाही के लिए संकट प्रबंधन केंद्र की सुविधा दी जाएगी। इस योजना के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कई विज्ञापन, स्लोगन एवं पोस्टर बनाए गए हैं। 

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अंतर्गत कई कार्यक्रम हैं। सुकन्या समृद्धि योजना इसकी सबसे महत्वपूर्ण योजना है। इसके अंतर्गत 10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं के लिए एक बैंक खाता खोला जाता है। कन्या की आयु कम होने के कारण इस खाते की देखरेख उसके माता-पिता द्वारा की जाएगी। इस खाते पर 9।1 वार्षिक चक्रवर्ती ब्याज दिया जाएगा।  यह दर बढ़ाई भी जा सकती है। सुकन्या समृद्धि खाता खोलने के लिए कई प्रमाण-पत्रों की आवश्यकता होती है, जिनमें बेटी का जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता या अन्य संरक्षक का पते का प्रमाण पत्र और परिचय पत्र आदि सम्मिलित हैं।

सुकन्या समृद्धि खाते को खोलने के लिए इसमें 1000 रुपये की न्यूनतम राशि ली जाएगी, जो खाते में ही जमा होगी। प्रति वर्ष इसमें न्यूनतम 100 रुपये जमा करना अनिवार्य हैं, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाएगा।  इसकी अधिकतम 150000 प्रति वर्ष की राशि तय की गई हैं। इस खाते के शुरू होने की तारीख से 14 वर्ष तक इसमें राशि जमा की जा सकती हैं। अतः 15 से 21 वर्ष तक इस खाते मे अन्य राशि जमा नहीं की जा सकती। लड़की की आयु 18 वर्ष हो जाने पर इस खाते से 50 प्रतिशत की राशि उसकी पढ़ाई एवं विवाह के लिए निकाली जा सकती हैं। सुकन्या समृद्धि खाते की आयु उसे खोलने वाली तारीख से 21 वर्ष तय की गई है, जिसे 14 वर्ष तक इस खाते में रुपये जमा करने की सुविधा दी गई है। 21 वर्ष की अवधि के बाद इस खाते से धनराशि प्राप्त होगी।

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने 29, जनवरी,  2018 को संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्तुत करते हुए बताया था कि पिछले 10 से 15 वर्षों में महिलाओं की क्षमता का दृष्टिकोण और परिणामों के संबंध में 17 में से 14 संकेतकों पर भारत का प्रदर्शन बेहतर रहा है। इनमें से 7 संकतकों में सुधार कुछ ऐसा रहा है कि भारत की स्थिति विकास के स्तरों को मापने के बाद अनेक देशों में सामान दिखाई देती है। अच्छी बात यह है कि महिलाओं से जुड़े परिणाम समानभिरूपता का पैटर्न दर्शाते हैं, जो समान अवसर के देशों के मुकाबले भारत में काफी हद तक समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ इतने बेहतर होते जाते हैं कि जन पहलुओं पर यह पिछड़ भी रहे हैं, वहां समय के साथ इनके और आगे बढ़ने की उम्मीद बढ़ती जाती है। दूसरे संकेतकों मुख्यतः रोजगार और परिवर्तनीय गर्भनिरोध के प्रयोग और पुत्र की चाह के संबंध में, भारत को अभी कुछ दूरी और तय करनी है क्योंकि विकास इन समस्याओं का समाधान नहीं बन पाया है। भारत के भीतर ही काफी विविधता दिखाई देती है। जहां पूर्वोत्तर के राज्यों में ने अन्य राज्यों के मुकाबले लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है और वह इसलिए नहीं हुआ कि वे समृद्ध है;  भीतरी राज्य इस मामले में पिछड़ गए हैं। हालांकि हैरानी की बात यह है कि दक्षिणी राज्य अपने विकास स्तरों की तुलना में इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। महिला पुरूष भेदभाव की चुनौती लंबे समय से, शायद सदियों से चली आ रही है। इसीलिए सभी पक्ष समग्र रूप से इसके समाधान के लिए जिम्मेदार है। भारत को पुत्र के लिए, यहां तक कि अधिक पुत्रों के लिए समाज की इस प्रबल चाह पर विचार करना चाहिए, जो विकास से अप्रभावित दिखाई देती है। महिलाओं और पुरुषों में प्रतिकूल लिंग अनुपात के कारण ‘गुमशुदा’ महिलाओं की समस्याओं की पहचान हो पाई है। लेकिन अधिक पुत्रों की चाह जनन क्षमता रोकने के नियमों में भी प्रतिबिंबित हो सकती है, जो अंतिम संतान के लिए लिंग पर आधारित हो और जो संभवतः ‘अवांछित’ कन्याओं के वर्गों को जन्म देती है- ऐसी कन्याओं की संख्या 21 मिलियन के लगभग आंकी गई है। समाज का यह उद्देश्य होना चाहिए कि यह घृणित श्रेणियां निकट भविष्य में इतिहास बन जाए। सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना और अनिवार्य मातृत्व अवकाश नियमावली सही दिशा में उठाया गया कदम है।

निसंदेह, केन्द्र सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना से बेटियां सक्षम होंगी। वे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगी और उनके विवाह के लिए धन की भी कोई समस्या नहीं होगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र योजना : महिलाएं सशक्त होंगी


देश में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में केंद्र सरकार ने देश में प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र योजना प्रारंभ की है। यह योजना महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण का नया मिशन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नवंबर 2017 में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने अम्ब्रेला स्कीम महिलाओं के लिए सुरक्षा और सशक्तिकरण मिशन का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की योजनाओं के विस्तार के लिए वर्ष 2017-18 से लेकर 2019-20 की अवधि के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान की। सीसीईए ने प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र नामक नई योजना को भी स्वीकृति प्रदान की, जो सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करेगी, जिससे एक ऐसा परिवेश बनाया जा सके, जिसमें वह अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सके। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के अंतर्गत विस्तार को भी 161 जिलों में सफल कार्यान्वयन के आधार पर स्वीकति प्रदान की गई है।
 
वित्तीय वर्ष 2017-18 से लेकर 2019-20 के दौरान वित्तीय परिव्य्य 3636.85 करोड़ रुपये होगा, जिसमें केंद्र सरकार का हिस्सा लगभग 3084.96 करोड़ रुपये होगा। स्वीकृत की गई उप-योजनाएं सामाजिक कल्याण क्षेत्र, विशेषकर महिलाओं की देखभाल, सुरक्षा और विकास की योजनाएं हैं। इसका लक्ष्य घटते हुए लिंगानुपात में सुधार करना, नवजात कन्या की उत्तरजीविता और सुरक्षा को सुनिश्चित करना, उसकी शिक्षा को सुनिश्चित करना और उसकी क्षमता को पूर्ण करने के लिए उसे सशक्त बनाना है। यह ग्रामीण महिलाओं को उनके अधिकारों को प्राप्त करने हेतु सरकार से संपर्क करने के लिए इंटरफेस प्रदान करेगा और यह प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के माध्यम से उन्हें सशक्त बनाएगी। स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थी स्वैच्छिक सामुदायिक सेवा और लैंगिक समानता की भावना को प्रोत्साहित करेंगे। यह विद्यार्थी ‘बदलाव के एजेंटों’ के रूप में कार्य करेंगे और इनका समुदायों और देश पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ेगा।

प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र नई योजना की परिकल्पना विभिन्न स्तरों पर कार्य करने के लिए की गई है, जबकि राष्ट्रीय स्तर (क्षेत्र आधारित ज्ञान सहायता) और राज्य स्तर (महिलाओं के लिए राज्य संसाधन केंद्र) संरचनाएं महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर संबंधित सरकार को तकनीकी सहायता प्रदान करेगी, जिला और ब्लॊक स्तरीय केंद्र एम.एस.के को सहायता प्रदान करेंगे और यह चरणबद्ध तरीके से कवर किए जाने वाले 640 जिलों में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ को आधार प्रदान करेंगे।
 
स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थियों के माध्यम से सामुदायिक सेवा की परिकल्पना एम.एस.के खंड स्तरीय पहलों के भार के रूप में 115 अत्यधिक पिछड़े जिलों में परिकल्पित की गई है। स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थी विभिन्न महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूकता सृजन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इस प्रक्रिया में स्थानीय कॉलेजों से लगभग तीन लाख से भी अधिक स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थियों को लगाया जाएगा, जबकि एनएसएस/एनसीसी कैडर के साथ विद्यार्थियों का सहयोग एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का एक अवसर भी होगा। यह स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थियों को उनके अपने समुदायों में बदलाव लाकर विकास प्रक्रिया में भागीदारी करने का अवसर प्रदान करेगा और इससे वे सुनिश्चित कर सकेंगे कि भारत की प्रगति में कोई भी महिला पीछे न रह जाए और महिलाएं भी समान रूप से भागीदारी है।
 
स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थियों के कार्यकलापों पर आधारित प्रमाण को वैब आधारित प्रणाली के माध्यम से मॉनीटर किया जाएगा। कार्य समाप्ति पर सामुदायिक सेवा के प्रमाण-पत्रों को सत्यापन के लिए राष्ट्रीय पोर्टल पर दर्शाया जाएगा और प्रतिभागी विद्यार्थी भविष्य में इन्हें अपने संसाधन के रूप में उपयोग कर सकते हैं।
 
निरंतर राष्ट्रव्यापी पक्ष समर्थन और 640 जिलों में मीडिया अभियान और चयनित 405 जिलों में बहुक्षेत्रीय कार्यवाही के माध्यम से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के लिए विस्तार और प्रयासों में तीव्रता के लिए भी स्वीकृति दी गई है। उन सभी जिलों को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के तहत पहले वर्ष शामिल किया जाएगा, जिन जिलों में सीएआर काफी कम है। कामकाजी महिलाओं को सहायता प्रदान करने के लिए लगभग 190 से अधिक कामकाजी महिला हॉस्टलों की स्थापना की जाएगी, जिनमें लगभग 19 हजार महिलाएं रह सकेंगी। लगभग 26 हजार लाभार्थियों को राहत और पुनर्वास प्रदान करने के लिए अतिरिक्त स्वाधार गृहों को भी स्वीकृति दी गई है।
 
हिंसा से पीड़ित महिलाओं को समावेशी सहायता प्रदान करने के लिए इस अवधि के दौरान 150 अतिरिक्त जिलों में वन स्टॊप सेंटरों की स्थापना की जाएगी। इन वन स्टॊप सेंटरों को महिला हेल्पलाइन के साथ जोड़ा जाएगा और देशभर में सार्वजनिक और निजी दोनों स्थानों पर हिंसा से पीडि़त महिलाओं को 24 घंटे का आपातकालीन एवं गैर आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली प्रदान की जाएगी। राज्यों और संघ राज्यों क्षेत्रों में स्वैच्छिक आधार पर महिला पुलिस स्वेच्छाकर्मी को संलग्न करके एक अद्वितीय पहल शुरू की जाएगी, जिससे जनता-पुलिस संपर्क स्थापित किया जा सके। सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को कवर करते हुए 65 जिलों में इसका विस्तार किया जाएगा।
 
इस योजना के अंतर्गत सभी उप-योजनाओं की योजना, समीक्षा और मॉनिटरिंग के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर एक सामान्य कार्यबल गठित किया जाएगा, जिसका उद्देश्य कार्यवाही के कनवर्जन्स और लागत प्रभाविकता को सुनिश्चित करना है। प्रत्येक योजना का एसडीजी के अनुरूप दिशा-निर्देशों में स्पष्ट एवं केंद्रित लक्ष्य निर्धारित होगा। नीति आयोग द्वारा दिए गए सुझाव के अनुसार सभी उप-योजनाओं के लिए सूचकों पर आधारित परिणाम की मॉनिटरिंग के लिए तंत्र की स्थापना भी की जाएगी। इन योजनाओं को राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों और कार्यान्वयन एजेंसियों के माध्यम से क्रियान्वित किया जाएगा। सभी उप-योजनाओं का केंद्रीय स्तर, राज्य, जिला और खंड स्तर पर एक अंतरनिर्हित मॉनिटरिंग ढांचा होगा।

इस योजना से कई लाभ होंगे। ओर जहां महिलाओं को इससे लाभ होगा, वहीं स्वेच्छाकर्मी विद्यार्थियों की भागीदारी से उनमें जिम्मेदारी की भावना पैदा होगी और वे राष्ट्र के नवनिर्माण में अपनी भूमिका निभा पाएंगे।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Sunday, August 30, 2026

लेखन मनुष्य को पूर्ण करता है : डॉ. सौरभ मालवीय

 







निरालानगर - लखनऊ।
विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित दो दिवसीय पाठ्यक्रम निर्माण हेतु कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि लेखन मनुष्य को पूर्ण करता है। लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, अनुभवों, ज्ञान और चिंतन की अभिव्यक्ति है।
उन्होंने कहा कि जब संवेदनाओं से भरा भाव ज्ञान और तर्क से निकलकर वैज्ञानिक सोच एवं प्रमाणिकता के आधार पर सिद्ध होता है, तब वह लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं रहता, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण धरोहर बन जाता है।
डॉ. मालवीय ने कहा कि पाठ्यक्रम निर्माण में विषय की उपयोगिता, भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक विज्ञान, तकनीक और विद्यार्थियों की बदलती आवश्यकताओं का समन्वय आवश्यक है। ऐसा पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ-साथ चिंतन, तर्क, संवेदना और सृजनात्मकता का विकास करता है।

प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना : महिलाओं को मिलेगा लाभ


स्वास्थ्य और पोषण के मामले में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। गर्भावस्था और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। एक महिला के पोषण की स्थिति और उसके स्वास्थ्य प्रभावों के साथ-साथ उसके शिशु के स्वास्थ्य और विकास के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। यदि माता स्वस्थ होगी, तो उसका बच्चा भी स्वस्थ होगा। एक कुपोषित महिला अधिकांश तौर पर एक कम भार वाले शिशु को जन्म देती है। जब इस कुपोषण का प्रारंभ गर्भाशय से होता है, तो विशेष रूप से इसका प्रभाव महिला के सम्पूर्ण जीवन चक्र पर पड़ता है। 
आर्थिक और सामाजिक दबाव के कारण बहुत सी महिलाओं को अपनी गर्भावस्था के अंतिम समय तक परिवार के लिए परिश्रम करना पड़ता है। वे घर और बाहर दोनों स्थानों पर कार्य करती हैं। इसका बुरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। कुपोषित महिलाओं के बच्चे भी कुपोषित होते हैं। कई बार नवजात की मृत्यु तक हो जाती है। 

बाल विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की धारा-4 (बी) के प्रावधानों के अनुसार गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लाभ के लिए सशर्त नकद हस्तांतरण योजना मातृत्व लाभ कार्यक्रम का गठन किया था। इस प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के अंतर्गत गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को नकद प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है। यह इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना ही है। यह योजना अक्टूबर 2010 में प्रायोगिक आधार पर प्रारंभ की गई थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना का नया नाम दिया है। महिला और बाल कल्याण विभाग के अनुसार पहले की गर्भावस्था सहायता योजना इतनी सफल नहीं थी, यहां तक कि बहुत से लोग इसके बारे में जानते भी नहीं थे। इसीलिए इसका नाम बदलना पड़ा। इस योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पहले जीवित जन्म के लिए छह हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। इस योजना का कार्यान्वयन जनवरी 2017 और मार्च 2020 के बीच होगा और इसका कुल बजट 12,661 करोड़ रुपये  निर्धारित किया गया है। इस योजना के 12,661 करोड़ कुल रुपये में से 7,932 करोड़ रुपये केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाएंगे, जबकि शेष राशि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा वहन की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 दिसम्बर, 2016 को राष्ट्र को दिए गए अपने संबोधन में सभी जिलों में मातृत्व लाभ कार्यक्रम के अखिल भारतीय विस्तार की घोषणा की थी और यह 1 जनवरी, 2017 से लागू है। इससे करीब 51।70 लाख लाभार्थियों को प्रतिवर्ष लाभ मिलने की आशा है। 
गर्भावस्था सहायता योजना कई तरह से गर्भवती महिलाओं की सहायता करेगी, किन्तु इस योजना के दो मुख्य उद्देश्य हैं। पहला, काम करने वाली महिलाओं की मजदूरी के नुकसान की भरपाई करने के लिए मुआवजा देना और उनके उचित आराम और पोषण को सुनिश्चित करना। दूसरा, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य में सुधार और नकदी प्रोत्साहन के माध्यम से अधीन-पोषण के प्रभाव को कम करना। 

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के शासनकाल में प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना को इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना के रूप में नामित किया गया था, पर अब फिर से इसको दूसरा नाम दिया गया है। यह योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा लागू की जाएगी। इस योजना से गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को लाभ होगा। योजना की लाभ राशि लाभार्थी के बैंक खाते में सीधे भेज दी जाएगी। इस राशि का भुगतान किस्तों में किया जाएगा। पहली किस्त एक हजार रुपये गर्भावस्था के पंजीकरण के समय दिए जाएंगे। दूसरी किस्त में दो हजार रुपये छह महीने की गर्भावस्था के बाद कम से कम एक प्रसव पूर्व जांच करने के बाद लाभार्थी को दिए जाएंगे। तीसरी किस्त में शेष राशि बच्चे का जन्म पंजीकृत होने और बच्चे को बीसीजी, ओपीवी, डीपीटी और हेपेटाइटिस-बी सहित पहले टीके का चक्र शुरू होने पर दी जाएगी। यह योजना निम्न श्रेणी की गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली उन महिलाओं के लिए लागू नहीं होगी, जो केंद्रीय या राज्य सरकार या किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के साथ नियमित रोजगार में हैं। जो महिलाएं किसी अन्य योजना या कानून के तहत समान लाभ प्राप्तकर्ता हैं। 

इस योजना से महिलाओं को कुछ राहत मिल पाएगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान : जच्चा-बच्चा को मिलेगा लाभ


स्वस्थ माताएं ही स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती हैं। यदि गर्भवती महिलाएं स्वयं कुपोषित होंगी और उन्हें समय पर उचित उपचार नहीं मिलेगा, तो इसका प्रभाव न केवल उन पर पड़ेगा, अपितु उनके बच्चे भी इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे। गर्भवती महिलाओं की समुचित देखभाल की आवश्यकता होती  है। किन्तु इस मामले में देश अभी पिछड़ा हुआ हैं। देश में शिशु मृत्यु और मातृ मृत्यु दर के मामले में देश की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।  यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार नवजात शिशुओं की मृत्यु के मामले में बांग्लादेश, नेपाल और भूटान हमसे बेहतर हैं। शिशु मृत्यु दर में विश्व में भारत पांचवें स्थान पर है। यहां हर वर्ष जन्म लेने वाले दो करोड़ 60 लाखों बच्चों में से 40 हजार अपने जन्म के 28 दिनों के अंदर ही मर जाते हैं। यहां शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार पर 29 है। हर वर्ष सात लाख नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है। वर्ष 2008 से 2015 के बीच प्रतिदिन औसतन 2137 नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई। महिलाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल-नमूना पंजीकरण प्रणाली की रिपोर्ट के अनुसार, देश में मातृ मृत्यु अनुपात प्रति एक लाख जीवित जन्मों में 167 है। 

महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान चला रही है। यह अभियान देश में तीन करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रारंभ किया गया है। इसके अंतर्गत प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के अंतर्गत प्रजनन मातृ नवजात शिशु एवं किशोर स्वास्थ्य रणनीति के अंतर्गत निदान तथा परामर्श सेवाओं सहित गुणवत्तायुक्त प्रसव पूर्व देखभाल की कवरेज के लिए परिकल्पना की गई है। केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्येक माह की निश्चित नौ तारीख को गर्भवती महिलाओं को व्यापक और गुणवत्तायुक्त प्रसव पूर्व देखभाल प्रदान करना सुनिश्चित किया गया है। एकल खिड़की प्रणाली के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया गया है कि केन्द्र में आने वाली सभी गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केन्द्रों पर उनकी गर्भावस्था के दूसरी और तीसरी तिमाही के दौरान प्रसव पूर्व देखभाल सेवाओं का न्यूनतम पैकेज प्रदान किया जाएगा। इसमें अल्ट्रासाउंड व अन्य जांच तथा आइएफ़ए सप्लीमेंट, कैल्शियम सप्लीमेंट आदि दवाएं सम्मिलित हैं। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं को मातृ एवं बाल संरक्षण कार्ड तथा सुरक्षित मातृत्व पुस्तिकाएं दी जाएगी। 

यदि किसी माह में नौ तारीख को रविवार या राजकीय अवकाश होने की स्थिति में अगले कार्य दिवस पर इसका आयोजन किया जाएगा। इन सेवाओं को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में निर्धारित सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पीएचसी/सीएचसी, डीएच/शहरी स्वास्थ्य केंद्रों आदि पर उपलब्ध कराया जाएगा। इसका लक्ष्य सभी गर्भवती महिलाओं तक पहुंचाने  का प्रयास होगा। 

इस कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता यह हैं कि प्रसव पूर्व जांच सेवाएं ओबीजीवाई विशेषज्ञों/चिकित्सा अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराई जाएंगी। निजी क्षेत्र के ओबीजीवाई विशेषज्ञों/चिकित्सकों को, जहां सरकारी क्षेत्र के चिकित्सक उपलब्ध या पर्याप्त नहीं हैं, वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्वैच्छिक सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

हर गर्भवती महिला को विशेष रूप से जिनकी पहचान किसी भी जोखिम कारक या सहरुग्णता स्थिति में की गई हैं, उनके लिए उचित जन्म योजना और जटिलता की तैयारी की जाएगी। कुपोषण से पीड़ित महिलाओं में रोग का शीघ्र पता लगाने, पर्याप्त और उचित प्रबंधन पर विशेष बल दिया जाएगा। किशोर और जल्दी गर्भधारण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, क्योंकि इन गर्भधारणों में अतिरिक्त एवं विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। प्रसव पूर्व जांच के दौरान देखभाल की गुणवत्ता सुधारना इस अभियान में सम्मिलित है। इसके अंतर्गत रक्त की कमी, गर्भावस्था प्रेरित उच्च रक्तचाप, गर्भावधि मधुमेह आदि का उचित प्रबंधन किया जाएगा। उचित परामर्श सेवाएं एवं सेवाओं का उचित प्रलेखन रखा जाएगा। उन गर्भवती महिलाओं को अतिरिक्त अवसर प्रदान किया जाएगा, जो किसी भी कारण से अपनी प्रसव पूर्व जांच नहीं करा पाईं। प्रसूति/चिकित्सा के इतिहास और मौजूदा नैदानिक स्थिति के आधार पर उच्च जोखिम गर्भधारण की पहचान की जाएगी। उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान एवं फॉलो-अप करना अभियान के महत्वपूर्ण घटकों में से एक है। स्टीकर, जो गर्भवती महिला की स्थिति एवं जोखिम के कारक को दर्शाएगा, इस स्टीकर को एमसीपी कार्ड पर हर जांच के दौरान जोड़ा जाएगा। सामान्य गर्भावस्था वाली महिला के लिए हरा स्टीकर और उच्च जोखिम वाली महिला के लिए लाल स्टीकर का प्रयोग किया जाएगा।

सरकारी केन्द्रों के साथ ही निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों/चिकित्सकों को हर महीने की नौ तारीख को उनके जिलों में सरकारी चिकित्सकों के प्रयासों के साथ स्वैच्छिक सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा हैं। इस अभियान का प्रारंभ इस आधार पर किया गया है कि यदि देश में हर एक गर्भवती महिला का चिकित्सा अधिकारी द्वारा परीक्षण एवं प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के दौरान उचित विधि से कम से कम एक बार जांच की जाए। इस अभियान का सही तरीके से पालन किया जाए, तो यह कार्यक्रम देश में होने वाली मातृ मृत्यु की संख्या को कम करने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभा सकता हैं। 

इस अभियान में निजी व स्वैच्छिक क्षेत्रों को सम्मिलित करने के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान एवं मोबाइल एप्लीकेशन को राष्ट्रीय पोर्टल पर विकसित किया गया है। इस अभियान के प्रचार-प्रसार को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए पुरस्कार दिए जाने की भी योजना है। देशभर के राज्यों एवं जिलों में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के लिए ‘मैं शपथ लेता हूं’ के अंतर्गत व्यक्तिगत व समूह उपलब्धियों तथा स्वैच्छिक योगदान को सम्मानित करने के लिए पुरस्कार दिए जाएंगे।

निसंदेह, यह अभियान से शिशु और मातृ मृत्यु दर  में कमी लाई जा सकेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना : राह हुई आसान

किसी की क्षेत्र के विकास के लिए सड़क का होना बहुत आवश्यक है। जहां सड़कें होंगी, वहां यातायात के साधन भी होंगे। इससे उस क्षेत्र के लोगों का आवा...