Sunday, October 25, 2026

डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का लोकार्पण










भारतीय ज्ञान परम्परा के माध्यम से राष्ट्रबोध जागृत करने का सशक्त प्रयास है पुस्तक
वाराणसी। अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूटीसीई) एवं अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, विद्या भारती के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारतीय ज्ञान परम्परा कार्यक्रम में डॉ. सौरभ मालवीय द्वारा लिखित पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक में भारतीय संस्कृति, पर्यावरण, भारतीय महापुरुषों के जीवन-दर्शन तथा समसामयिक विषयों पर आधारित लेखों का संकलन है।
पुस्तक के माध्यम से लेखक ने भारतीय ज्ञान परम्परा, सांस्कृतिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रबोध के विभिन्न आयामों को रेखांकित किया है। पुस्तक का मूल भाव आत्मबोध के माध्यम से राष्ट्रबोध की भावना को सशक्त करना तथा भारतीय जीवन-दृष्टि के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न करना है।
लोकार्पण कार्यक्रम में केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी, विद्या भारती के अध्यक्ष प्रो. रविंद्र कान्हेरे, विद्या भारती के उपाध्यक्ष अवनीश भटनागर, अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूटीसीई) के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह तथा विद्या भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री गोविंद चरण महंत सहित अनेक शिक्षाविद्, विद्वान एवं गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण, संवर्धन तथा शिक्षा के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के महत्व पर विशेष बल दिया गया। पुस्तक का लोकार्पण भारतीय चिंतन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रबोध से जुड़े साहित्य के प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

Saturday, October 24, 2026

दो दिवसीय अखिल भारतीय कार्यशाला सम्पन्न.














काशी, 25 अक्टूबर। अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूटीसीई) एवं अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, विद्या भारती के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय कार्यशाला का समापन हुआ। 24 एवं 25 अक्टूबर को आयोजित इस कार्यशाला में देशभर से आए 70 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की। सात सत्रों में भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध आयामों, उसकी समकालीन प्रासंगिकता तथा शिक्षा व्यवस्था में उसके समुचित समावेश को लेकर व्यापक विचार-विमर्श एवं मंथन किया गया।

कार्यशाला में गोविन्द चरण महंत, अवनीश भटनागर, रविन्द्र कान्हेरे, डी. रामकृष्ण, डॉ. प्रदीप जायसवाल, हेमचंद्र, पवन तिवारी तथा डॉ. सौरभ मालवीय सहित विभिन्न विद्वानों एवं शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रतिभागियों की सहभागिता रही।

कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा की समृद्ध विरासत को समकालीन संदर्भों में पुनर्स्थापित करना तथा भारतीय शिक्षा व्यवस्था को देश की सांस्कृतिक चेतना, जीवन-दृष्टि, दर्शन और ज्ञान-संपदा से जोड़ना रहा। विभिन्न सत्रों में भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उसके हस्तांतरण की आवश्यकता पर विचार किया गया।

दो दिवसीय कार्यशाला ने भारतीय ज्ञान परम्परा को शिक्षा के केंद्र में स्थापित करने तथा भारतीय दृष्टि पर आधारित ज्ञान-विमर्श को व्यापक बनाने की दिशा में सार्थक संवाद का अवसर प्रदान किया।

Thursday, October 22, 2026

जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं


भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं देश के माननीय केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि आप स्वस्थ, दीर्घायु एवं ऊर्जावान रहें तथा राष्ट्रसेवा के अपने संकल्प के साथ माँ भारती की सेवा कर@ते हुए देश की उन्नति एवं जनकल्याण में निरंतर योगदान देते रहें।

सादर शुभकामनाएँ!

Tuesday, October 20, 2026

शुभ विजयादशमी

 



शुभ विजयादशमी
असत्य पर सत्य की विजय,
अधर्म पर धर्म की विजय,
अहंकार पर विनम्रता की विजय और
बुराई पर अच्छाई की विजय का महापर्व है विजयादशमी।
आइए, इस पावन अवसर पर संस्कार, सदाचार एवं राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर चलने और समाज में सकारात्मकता, सद्भाव तथा राष्ट्रनिष्ठा का भाव सुदृढ़ करने का संकल्प लें।
🙏 आपको एवं आपके समस्त परिवार को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
🚩 धर्म की विजय हो, सत्य की प्रतिष्ठा हो, राष्ट्र का कल्याण हो।

टीवी पर लाइव

 




Sunday, October 18, 2026

सांस्कृतिक एकता की प्रतीक विजयदशमी


डॊ. सौरभ मालवीय
भारत एक विशाल देश है. इसकी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति. यह भारत की सांस्कृतिक विशेषता ही है कि कोई भी पर्व समस्त भारत में एक जैसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, भले ही उसे मनाने की विधि भिन्न हो. ऐसा ही एक पावन पर्व है दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है. दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. विश्वभर में हिन्दू इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. यह अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के अवतार राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी. रावण भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण करके लंका ले गया था. भगवान राम देवी दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी को मुक्त कराया. दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है, जिनमें चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा भी सम्मिलित है. यह शक्ति की पूजा का पर्व है. इस दिन देवी दुर्गा की भी पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन लोग नया कार्य प्रारंभ करना अति शुभ माना जाता है. दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है. नवरात्रि में स्वर्ण और आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है.

दशहरा नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है. देशभर में दशहरे का उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरे से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता. इस दौरान नवरात्रि भी होती हैं. कहीं-कहीं रामलीला का मंचन होता है, तो कहीं जागरण होते हैं. दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है. इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और अग्नि बाण इन पुतलों को मारते हैं. पुतलों में पटाखे भरे होते हैं, जिससे वे आग लगते ही जलने लगते हैं.

समस्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में दशहरे का यह पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. कश्मीर में नवरात्रि के नौ दिन माता रानी को समर्पित रहते हैं. इस दौरान लोग उपवास रखते हैं. एक परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं. यह मंदिर एक झील के बीचोबीच स्थित है.  हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित पहाड़ी लोग अपनी परंपरा के अनुसार अपने ग्रामीण देवता की शोभायात्रा निकालते हैं. इस दौरान वे तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े आदि वाद्य बजाते हैं तथा नाचते-गाते चलते हैं. शोभायात्रा नगर के विभिन्न भागों में होती हुई मुख्य स्थान तक पहुंचती है. फिर ग्रामीण देवता रघुनाथजी की पूजा-अर्चना से दशहरे के उत्सव का शुभारंभ होता है. हिमाचल प्रदेश के साथ लगते पंजाब तथा हरियाणा में दशहरे पर नवरात्रि की धूम रहती है. लोग उपवास रखते हैं. रात में जागरण होता है. यहां भी रावण-दहन होता है और मेले लगते हैं. उत्तर प्रदेश में भी दशहरा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यहां रात में रामलीला का मंचन होता है और दशहरे के दिन रावण दहन किया जाता है.

बंगाल, ओडिशा एवं असम में दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है.  बंगाल में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाता है. ओडिशा और असम में यह पर्व चार दिन तक चलता है. यहां भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं तथा उनमें देवी दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है. दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं. इसके पश्चात देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है. विसर्जन यात्रा में असंख्य लोग सम्मिलित होते हैं.

गुजरात में भी दशहरे के उत्सव के दौरान नवरात्रि की धूम रहती है. कुंआरी लड़कियां सिर पर मिट्टी के रंगीन घड़े रखकर नृत्य करती हैं, जिसे गरबा कहा जाता है. पूजा-अर्चना और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन किया जाता है. महाराष्ट्र में भी नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है तथा दसवें दिन विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति की जाती है. इस दिन बच्चे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मां सरस्वती की पूजा करते हैं.

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरे के उत्सव के दौरान लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है. पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है. दूसरे दिन कला एवं विद्या की देवी सरस्वती-की अर्चना की जाती है तथा और अंतिम दिन शक्ति की देवी दुर्गा की उपासना की जाती है. कर्नाटक के मैसूर का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को प्रकाश से ससज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण का दहन का नहीं किया जाता.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा का बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है. यहां इस दिन देवी दंतेश्वरी की आराधना की जाती है. दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं. यहां यह त्यौहार 75 दिन यानी श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है. प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है. देवी कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहा जाता है. यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं. बताया जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था. काछिन गादि के बाद जोगी-बिठाई होती है, तदुपरांत भीतर रैनी (विजयदशमी) और बाहर रैनी (रथ-यात्रा) निकाली जाती है. अंत में मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है.इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है.

दशहरे के दिन वनस्पतियों का पूजन भी किया जाता है. रावण दहन के पश्चात शमी नामक वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
इसके साथ ही अपराजिता (विष्णु-क्रांता) के पुष्प भगवान राम के चरणों में अर्पित किए जाते हैं. नीले रंग के पुष्प वाला यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है.

दशहरे का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है.

डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का लोकार्पण

भारतीय ज्ञान परम्परा के माध्यम से राष्ट्रबोध जागृत करने का सशक्त प्रयास है पुस्तक वाराणसी। अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूटीस...