Sourabh Malviya डॉ.सौरभ मालवीय
विचारों की धरा पर शब्दों की अभिव्यक्ति...
Thursday, June 4, 2026
पर्यावरण संरक्षण से बचेगा मानव जीवन
डॉ. सौरभ मालवीय
मानव जाति के संरक्षण के लिए पर्यावरण की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। दिन-प्रतिदिन दूषित होते पर्यावरण की रक्षा एवं इसके संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने करने के उद्देश्य से प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1972 में इसकी घोषणा की गई थी। इसके पश्चात 5 जून, 1974 को प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया था तथा तबसे यह निरन्तर मनाया जा रहा है। पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के 'परि' एवं 'आवरण' से मिलकर बना है अर्थात जो चारों ओर से घेरे हुए है।
मानव शरीर पंचमहाभूत से निर्मित है। पंचभूत में पांच तत्त्व आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी सम्मिलित है। सभी प्राणियों के लिए वायु एवं जल अति आवश्यक है। इसके पश्चात मनुष्य को जीवित रहने के भोजन चाहिए। भोजन के लिए अन्न, फल एवं सब्जियां उगाने के लिए भी जल की ही आवश्यकता होती है। परन्तु पर्यावरण के प्रदूषित होने से मानव के समक्ष अनेक संकट उत्पन्न हो गए हैं। वर्षा अनियमित हो गई है। बहुत से कृषकों को अपनी फसल की संचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र की ही होती है। अत्यधिक रसायनों और कीटनाशकों के प्रयोग से उपजाऊ भूमि बंजर होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन एवं जल के अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में जल संकट बना हुआ है। लोग जल के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी कारण भारत में प्रकृति के विभिन्न अंगों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। भूमि को माता माना जाता है। आकाश को भी उच्च स्थान प्राप्त है। वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल को पूजा जाता है। त्रिवेणी की पूजा की जाती है। त्रिवेणी में सभी देवी-देवताओं एवं पितरों का वास माना जाता है। त्रिवेणी तीन प्रकार के वृक्षों के समूह को कहा जाता है, जिसमें वट, पीपल एवं नीम सम्मिलित हैं। इनके पौधे त्रिकोणीय आकार में रोपे जाते हैं तथा जब ये सात फीट तक ऊंचे हो जाते हैं, तो इन्हें आपस में मिला देते हैं। इनका संगम ही त्रिवेणी कहलाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति त्रिवेणी लगाकर इसका पालन-पोषण करता है, तो पूण्य की प्राप्ति होती है तथा उसका कोई भी सात्विक कर्म विफल नहीं होता। पंचवटी की पूजा होती है। पंचवटी पांच प्रकार के वृक्षों के समूह को कहा जाता है, जिसमें वट, पीपल, अशोक, बेल एवं आंवला सम्मिलित है। इन्हें पांचों दिशाओं में रोपा जाता है। पीपल पूर्व दिशा में रोपा जाता है, जबकि, बरगद पश्चिम दिशा में, बेल उत्तर दिशा में तथा आंवला दक्षिण दिशा में रोपा जाता है। मान्यता है कि बरगद वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा का वास होता है तथा तने में विष्णु एवं डालियों में शिव का वास करते हैं. इसके अतिरिक्त वृक्ष की लटकी हुई शाखाओं को देवी सावित्री का रूप माना जाता है। महिलाएं मनोकामना की पूर्ति के लिए वट कू पूजा करती हैं। घरों में तुलसी को पूजने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। नदियों को माता मानकर पूजा जाता है। कुंआ पूजन होता है। अग्नि और वायु के प्रति भी लोगों के मन में श्रद्धा है। वेदों के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पंचतत्व के योग से हुआ है, जिनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि सम्मिलित है।
इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि
पृथ्वी ही वह ग्रह है, जहां पर जीवन है। वेदों में पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहा गया है।
ऋग्वेद के अनुसार-
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्
अर्थात् आकाश मेरे पिता हैं, बंधु वातावरण मेरी नाभि है, और यह महान पृथ्वी मेरी माता है।
अथर्ववेद में भी पृथ्वी को माता के रूप में पूजने की बात कही गई है। अथर्ववेद के अनुसार-
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः
इतना ही नहीं वेदों में सभी जीवों की रक्षा का भी कामना की गई है। ऋग्वेद के अनुसार–
पिता माता च भुवनानि रक्षतः
जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
वेदों में जल को अमृत कहा गया है-
अमृत वा आपः
जल ही है, जो मनुष्य के तन और मन के मैल को धोता है। तन और मन को पवित्र करता है-
इदमाप: प्र वहत यत् किं च दुरितं मयि
यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेष उतानृतम्
अर्थात हे जल देवता, मुझसे जो भी पाप हुआ हो, उसे मुझसे दूर बहा दो अथवा मुझसे जो भी द्रोह हुआ हो, मेरे किसी कृत्य से किसी को कष्ट हुआ हो अथवा मैंने किसी को अपशब्द कहे हों, अथवा असत्य वचन बोले हों, तो वह सब भी दूर बहा दो।
जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री जी को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
आपके नेतृत्व में प्रदेश विकास, सुशासन, सुरक्षा एवं जनकल्याण के नए आयाम स्थापित कर रहा है। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा राष्ट्रसेवा की निरंतर शक्ति प्रदान करें।
जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
Wednesday, June 3, 2026
टीवी पर लाइव
"सभी प्रकार की परीक्षाएँ पूर्ण पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं सुचिता के साथ सम्पन्न हों तथा युवाओं के हितों की रक्षा हो, यही सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरूप अवसर मिले, इसके लिए परीक्षा प्रणाली को निरंतर सुदृढ़ एवं विश्वसनीय बनाया जा रहा है।"
या संक्षेप में—
"पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय परीक्षा व्यवस्था के माध्यम से युवाओं के हितों की रक्षा करना सरकार की प्राथमिकता है।"
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण का महत्व
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी कारण भारत में प्रकृति के विभिन्न अंगों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। भूमि को माता माना जाता है। आकाश को भी उच्च स्थान प्राप्त है। वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल को पूजा जाता है। पंचवटी की पूजा होती है। घरों में तुलसी को पूजने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। नदियों को माता मानकर पूजा जाता है। कुंआ पूजन होता है। अग्नि और वायु के प्रति भी लोगों के मन में श्रद्धा है। वेदों के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पंचतत्व के योग से हुआ है, जिनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि सम्मिलित है।
इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि
पृथ्वी ही वह ग्रह है, जहां पर जीवन है। वेदों में पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहा गया है।
ऋग्वेद के अनुसार-
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्
अर्थात् आकाश मेरे पिता हैं, बंधु वातावरण मेरी नाभि है, और यह महान पृथ्वी मेरी माता है।
अथर्ववेद में भी पृथ्वी को माता के रूप में पूजने की बात कही गई है। अथर्ववेद के अनुसार-
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः
इतना ही नहीं वेदों में सभी जीवों की रक्षा का भी कामना की गई है। ऋग्वेद के अनुसार–
पिता माता च भुवनानि रक्षतः
जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
वेदों में जल को अमृत कहा गया है।
अमृत वा आपः
जल ही है, जो मनुष्य के तन और मन के मैल को धोता है। तन और मन को पवित्र करता है।
इदमाप: प्र वहत यत् किं च दुरितं मयि
यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेष उतानृतम्
अर्थात हे जल देवता, मुझसे जो भी पाप हुआ हो, उसे मुझसे दूर बहा दो अथवा मुझसे जो भी द्रोह हुआ हो, मेरे किसी कृत्य से किसी को कष्ट हुआ हो अथवा मैंने किसी को अपशब्द कहे हों, अथवा असत्य वचन बोले हों, तो वह सब भी दूर बहा दो।
वेदों में जल को सखदायी बताया गया है। साथ ही जल के शोधन की बात भी कही गई है।
आपोSअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्व: पुनन्तु
विश्व हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्य: शुचिरा पूतSएमि
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा शग्मां परिदधे भद्रं वर्णम पुष्यन
अर्थात मनुष्य को चाहिए कि जो सब सुखों को देने वाला, प्राणों को धारण करने वाला एवं माता के समान, पालन-पोषण करने वाला जो जल है, उससे शुचिता को प्राप्त कर, जल का शोधन करने के पश्चात ही, उसका उपयोग करना चाहिए, जिससे देह को सुंदर वर्ण, रोग मुक्त देह प्राप्त कर, अनवरत उपक्रम सहित, धार्मिक अनुष्ठान करते हुए अपने पुरुषार्थ से आनंद की प्राप्ति हो सके।
वेदों में स्वच्छ एवं शुद्ध जल को स्वस्थ जीवन के लिए अति आवश्यक माना गया है। अथर्ववेद के अनुसार-
शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु
जीवन के लिए वायु अति आवश्यक है। वेदों में वायु के महत्व का उल्लेख किया गया है। ऋग्वेद के अनुसार-
वायुर्ड वा प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्
वेदों में वायु का शुद्धता पर बल देते हुए कहा गया है कि जीवन के लिए शुद्ध एवं प्रदूषण रहित वायु अति आवश्यक है।
वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे
वेदों में वृक्षों की महत्ता पर भी प्रकाश डाला गया है। वृक्षों में देवताओं का वास माना जाता है।
मूलतो ब्रम्हरूपाय मधयतो विष्णुरूपिणें
अग्रत: शिवरूपाय वृक्षराजाए ते नम:
अर्थात वृक्ष के मूल में ब्रम्हा, मध्य में भग्वान विष्णु और शिरोभाग में शिव का वास होता है।
वेदों में वनस्पतियों से पूर्ण वनदेवी की पूजा की गई है. ऋग्वेद में कहा गया है-
आजनगन्धिं सुरभि बहवन्नामड्डषीवलाम्
प्राहं मृगाणां मातररमण्याभिशंसिषम्
अर्थात अब मैं वनदेवी की पूजा करता हूं, जो मधुर सुगंध परिपूर्ण है और सभी वनस्पतियों की माता है और भोजन का भंडार है।
निसंदेह, हमारी भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को बहुत महत्व दिया गया है, किन्तु आज प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। परिणाम स्वरूप पर्यावरण असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिससे प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं। पर्यावरण असंतुलन से बचने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उतना ही दोहन करे, जितनी उसे आवश्यकता है. ईशावस्योपनिषत् के अनुसार-
ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किच जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्वि नम्
वेदों में पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया गया है। यजुर्वेद के अनुसार-
पृथिवी मातर्मा हिंसी मा अहं त्वाम्
अर्थात मैं पृथ्वी सम्पदा को हानि न पहुंचाऊं
ऋग्वेद में समग्र पृथ्वी की स्वच्छता पर बल देते हुए कहा गया है-
पृथ्वीः पूः च उर्वी भव:
अर्थात समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे।
यदि हमारी पृथ्वी स्वच्छ रहेगी, तो हमारा जीवन भी सुखदायी होगा। जीवन के सम्यक विकास के लिए पर्यावरण का स्वच्छ रहना नितांत आवश्यक है।
Tuesday, June 2, 2026
21वीं सदी के आचार्य को तकनीक के साथ जीवन मूल्य भी अपनाने होंगे : डॉ. सौरभ मालवीय
हरदोई। जनपद के अल्लीपुर स्थित पं. बाबूराम त्रिवेदी सरस्वती शिशु मंदिर में नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय मंत्री एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. सौरभ मालवीय रहे।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों के स्वागत से हुआ। तत्पश्चात मुख्य अतिथियों ने माँ शारदे के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित एवं पुष्पार्चन कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया।
मंच संचालन मैगलगंज के प्रधानाचार्य उत्तम मिश्रा ने किया। जन शिक्षा समिति अवध प्रदेश के प्रदेश निरीक्षक मिथिलेश अवस्थी ने अतिथियों का परिचय एवं कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत की।
प्रो. मालवीय ने “भारतीय ज्ञान परम्परा” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” तथा “वसुधैव कुटुम्बकम्” भारत की सनातन चेतना के मूल सूत्र हैं। उन्होंने कहा कि भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भीतर भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की चेतना विद्यमान रहती है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका विवेक ही वास्तविक ज्ञान है।
उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति कर्तव्य, धर्म और वचन पालन की प्रेरणा देती है। श्रीराम का वनगमन, रावण वध तथा स्वर्णमयी लंका का त्याग भारतीय आदर्शों और नैतिक मूल्यों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भारत की आत्मा और राष्ट्रभाव का परिचायक है।
प्रो. मालवीय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश दिया।
द्वितीय सत्र में “21वीं सदी का आचार्य” विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक ने विश्व को एक सूत्र में जोड़ दिया है। आधुनिक प्रौद्योगिकी ने जीवन को सुविधाजनक और समृद्ध बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में केवल रोजगार प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि स्वयं को निरंतर अद्यतन बनाए रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के आचार्य को तकनीकी दक्षता के साथ-साथ संस्कार, नैतिकता और भारतीय जीवन मूल्यों को भी आत्मसात करना होगा। समयानुकूल ज्ञान और आधुनिक तकनीक से सुसज्जित शिक्षक ही भावी पीढ़ी का प्रभावी मार्गदर्शन कर सकता है।
इस अवसर पर जन शिक्षा समिति अवध प्रदेश के उपाध्यक्ष शीर्षेन्दुशील त्रिवेदी, विद्यालय के प्रबंधक, सीतापुर संभाग के रणवीर सिंह, श्रावस्ती संभाग के कैलाश वर्मा, साकेत संभाग के मिथिलेश सिंह सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं शिक्षाविद उपस्थित रहे।
टीवी पर लाइव
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी लगातार यह संदेश देते रहे हैं कि प्रदेश में अपराध और अपराधियों के प्रति सरकार की नीति "जीरो टॉलरेंस" की है। मुख्यमंत्री जी का कहना रहा है कि कानून हाथ में लेने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी और अपराधी जिस भाषा में कानून को समझते हैं, उसी भाषा में उन्हें जवाब दिया जाएगा।
Subscribe to:
Posts (Atom)
-
डॉ. सौरभ मालवीय ‘नारी’ इस शब्द में इतनी ऊर्जा है कि इसका उच्चारण ही मन-मस्तक को झंकृत कर देता है, इसके पर्यायी शब्द स्त्री, भामिनी, कान...
-
डॉ. सौरभ मालवीय किसी भी देश के लिए एक विधान की आवश्यकता होती है। देश के विधान को संविधान कहा जाता है। यह अधिनियमों का संग्रह है। भारत के संव...
-
डॉ. सौरभ मालवीय मनुष्य जिस तीव्र गति से उन्नति कर रहा है, उसी गति से उसके संबंध पीछे छूटते जा रहे हैं. भौतिक सुख-सुविधाओं की बढ़ती इच्छाओं क...




























